Sunday, January 23, 2011

हिसाब के तकनीकी फेर में फंसेंगे मनरेगा मजदूर


भविष्य में मनरेगा की प्रगति तकनीकी संजाल में फंस सकती है। केंद्र सरकार भविष्य में उन्हीं राज्यों को अगली किस्तें जारी करेगी जिनका सूचना प्रबंधन तंत्र (एमआइएस) अपडेट होगा। यह तभी संभव है जब ग्राम पंचायत स्तर पर ऑनलाइन फीडिंग की व्यवस्था हो, जो कम से कम साल भर तक उत्तराखंड में संभव नहीं है। केंद्र से मनरेगा में पैसा नहीं मिलेगा तो जाहिर है कि मजदूरी भी नहीं मिलेगी। इसका सीधा असर मजदूर के पेट पर न पड़े इसलिए केंद्र सरकार एमआईएस व एमपीआर (मासिक प्रगति रिपोर्ट) के अंतर को फिलहाल नजर अंदाज कर रही है। दरअसल भारत सरकार ने यह गाइडलाइन बना दी है कि मनरेगा के तहत खर्च होने वाली राशि और सृजित मानव दिवस के एमपीआर व एमआईएस डाटा में असमानता नहीं होनी चाहिए। एमपीआर के सापेक्ष खर्च और सृजित मानव दिवसों का अंतर तभी खत्म किया जा सकता है, जब ग्राम पंचायत स्तर पर ऑनलाइन फीडिंग की व्यवस्था हो। अभी राज्य में मनरेगा के आंकड़े ब्लाक स्तर पर कंप्यूटर में तो फीड किये जा रहे हैं, लेकिन ऑनलाइन नहीं। ब्लाकों से ये कंप्यूटरीकृत आंकड़े जिला मुख्यालयों पर सीडी या पेन ड्राइव में भेजे जाते हैं, जहां से इन्हें ऑनलाइन फीड किया जाता है। हालांकि शासन ने अफसरों की नकेल कसने की कवायद छेड़ी है, लेकिन तकनीकी दिक्कतें रुकावट बन सकती हैं। अफसरों की सख्ती से कुछ जिलों से बेहतर नतीजे मिलने शुरू भी हुए हैं। उत्तराखंड में मनरेगा के तहत 19 जनवरी तक खर्च राशि का ब्योरा एमपीआर के सापेक्ष एमआईएस में 67.51 फीसदी ऑनलाइन फीड हुआ। वहीं, एमपीआर के सापेक्ष एमआइएस में 57.95 फीसदी फीड किये जा चुके हैं। उत्तराखंड में 19 जनवरी तक एमपीआर में 22529.22 लाख की राशि के सापेक्ष 15208.66 लाख रुपये के खर्च का ब्योरा ऑनलाइन है। हरिद्वार इस मामले में सबसे फिसड्डी है। यहां खर्च राशि का 39.44 फीसदी ब्योरा ही एमआइएस में है। सृजित मानव दिवस तो 23.12 फीसदी ही आनलाइन हैं। ऊधमसिंह नगर ने खर्च राशि का 90 और मानव दिवसों का 81 फीसदी से अधिक ब्यौरा दर्ज किया है। खर्च राशि के ब्योरे को 50 फीसदी से अधिक ऑनलाइन दर्ज करने में नैनीताल, चमोली, देहरादून जिले हैं। उत्तरकाशी, चंपावत, टिहरी, बागेश्वर, पौड़ी, 60 से 88 फीसदी तक ऑनलाइन कर चुके हैं।



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