Saturday, January 15, 2011

भुखमरी-लाचारी का पर्याय है नहरी गांव

देश-दुनिया तेजी से बदल रही है, लेकिन मध्यप्रदेश की सीमा से सटे बांदा जिले के नरैनी ब्लाक का नहरी गांव तनिक भी नहीं बदला है। चार हजार की आबादी वाला यह गांव 2005 से 2007 के बीच भूख से मौतों के कारण सुर्खियों में आया था। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी भी इस गांव की गरीबी को देखने आए थे, लेकिन आज भी इस गांव के लोग जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त है। गांव के एक तरफ पहाड़ सीना ताने खड़ा है, दूसरी तरफ उबड़ खाबड़ बंजर जमीन है,जिसमें कुछ भी पैदावार नहीं होता। दलित व कुम्हारों की इस बस्ती में न तो महामाया योजना दिखती है और न ही इंदिरा आवास। गरीब, भुखमरी और लाचारी का पर्याय सिर्फ नहरी ही नहीं है। दर्जनों ऐसे गांव हैं,जहां के लोग भूखमरी से बचने के लिए शहरों की ओर पलायन कर गये हैं। नहरी से दस किमी. दूर पंचमपुर की तो नब्बे फीसदी आबादी गांव से पलायन कर चुकी है। बांदा जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर इस गांव में पहुंचना अब भी बेहद ही कष्ट कारक है। सड़क बनी तो है, लेकिन जगह-जगह से टूटी हुई है। ग्रामीणों से पूछने पर पता चला कि ग्राम प्रधान लाला राम 60-70 मजदूरों को लेकर मनरेगा के तहत खेत समतलीकरण का काम करा रहे हैं। लाला राम उन गिने चुने ग्राम प्रधानों में है जो खुद भी जाब कार्ड धारक हैं और मनरेगा में मजदूरी करते हैं। 100 रुपये की मजूरी कर लेने के बाद वे पंचायत का काम देखते हैं। लाला राम के चाचा भागवत प्रसाद की 2007 में भूख से मौत हो गई थी, तब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी यहां आये थे। ग्रामीणों ने राहुल से सभी परिवारों को लाल कार्ड दिलवाने की गुहार लगाई थी, जो आज तक पूरी नहीं हो सकी। गांव के अंदर आरसीसी की कौन कहे, खडंजा सड़क भी नहीं है। अधिकांश मकान मिट्टी के बने हैं, जिसमें बिना सिर झुकाये अंदर घुसा भी नहीं जा सकता। छोटे से कमरे में दो-तीन भाईयों का परिवार रहता है। मवेशी भी साथ ही रहते हैं। घर में हवा या रोशनी जाने का सवाल नहीं। शौचालय का तो प्रश्न ही नहीं उठता। लाला राम बताते हैं कि ठेकेदार आते है। बस में भरकर बंधुआ मजदूर बनाकर ग्वालियर, इलाहाबाद और अन्य शहरों में ईट भट्ठे पर मजदूरी कराने के लिए ले जाते हैं। गांव से चार पांच सौ लोग अभी भी बाहर कमाने गये हुए हैं। जो बचे है उनको मनरेगा में काम देकर रोजी रोटी का इंतजाम कर रहे हैं। गांव के दस बारह लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है जबकि अधिकतर लोग इसकी बाट जोह रहे हैं। 94 परिवार लाल कार्डधारी है। करीब इतने ही सफेद कार्डधारी। गांव के प्राइमरी स्कूल में छह माह से हेडमास्टर नहीं है। मिडिल स्कूल में एक महिला शिक्षिका है, जो हफ्ते में एक दो दिन आती है। शिक्षा मित्रों के भरोसे काम चल रहा है। गांव बाले बताते हैं ऐसी पढ़ाई से तो हम अपने बच्चों को चपरासी भी नहीं बना सकते।

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