Sunday, January 23, 2011

उत्तर प्रदेश में घर बैठकर किया मनरेगा वंचितों का सर्वे


इसमें कोई संदेह नहीं कि मनरेगा योजना शानदार थी, पर पहले ही पायदान पर वंचित परिवारों को चिन्हित करने के सर्वे में गड़बड़ी हो गई। नतीजन उत्तर प्रदेश में परवान चढ़ने से पहले ही योजना दम तोड़ने लगी है। ग्राम्य विकास विभाग ने मनरेगा के तहत वंचित परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विशेष योजना बनाई थी। इस योजना के तहत ऐसे परिवारों का चिन्हांकन किया जाना था जो मनरेगा के तहत कार्य ही नहीं करते। चिन्हांकन पूरा होने के बाद इन लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराए जाने की योजना थी। ऐसे लोगों के चिन्हांकन का कार्य स्वयंसेवी संस्थाओं को शासन स्तर से दिया गया था, पर स्वयंसेवी संस्थाओं ने बंद कमरे में ही बैठकर सर्वे का कार्य पूरा कर लिया। सर्वे को कितनी गंभीरता से पूरा किया गया इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जिन परिवारों का सर्वे किए जाने की बात कही जा रही है उनमें ज्यादातर गांव में रहते ही नहीं। ऐसे लोगों का भी सर्वे किया गया जो सरकारी सेवाओं के साथ अन्य निजी संस्थाओं में कार्य कर रहे हैं। योजना में कुछ निश्चित जातियों का ही सर्वे कर रोजगार उपलब्ध कराया जाना था। पता तब चला जब स्वयंसेवी संस्था की ओर से उपलब्ध कराई गई वंचित परिवारों की सूची खंड विकास अधिकारियों को जॉबकार्ड जारी करने के लिए दी गई। स्वयंसेवी संस्था की ओर से जो सूची ग्रामीण विकास विभाग को दी गई है। उसमें 20956 ऐसे परिवारों का भी सर्वे किया गया जो कि संबंधित ग्राम पंचायतों में रहते ही नहीं। 939 ऐसे परिवारों का सर्वे किया गया जो कि जॉबकार्ड लेने से ही इंकार कर रहे है। 3262 परिवारों के नाम 2-2 बार दर्ज कर दिए गए। 174 नाबालिगों का सर्वे भी संस्था ने लाभ कमाने के चक्कर में कर डाला। लाखों का है खेल : दरअसल योजना के तहत वंचित परिवारों का चिन्हांकन करने के लिए स्वयंसेवी संस्था को धन भी उपलब्ध कराया जाना था। शासनादेश के मुताबिक प्रत्येक परिवार के सर्वे पर 6 रुपये स्वयंसेवी संस्था को दिया जाना है। जिले में 94 हजार परिवारों का सर्वे हुआ है, अर्थात 5 लाख 64 हजार रुपये स्वयंसेवी संस्था को दिए जाने हैं। वंचित परिवार को सौ दिन का रोजगार मिलने पर स्वयंसेवी संस्था को प्रति परिवार 120 रुपये मिलेंगे।


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