न्यायसंगत आपदा प्रबंधन का मूल सिद्धांत है कि आपदाग्रस्त लोगों को न केवल तत्कालीन सहायता न दी जाए, बल्कि दीर्घकालीन सहायता भी सुनिश्चित की जाए, जिससे वे सामान्य जीवन की ओर लौट सकें। इस सिद्धांत की व्यापक स्वीकृति के बावजूद अक्सर आपदा प्रभावित लोग शीघ्र ही भुला दिए जाते हैं, जिससे उन्हें एक ओर बहुत दुख-दर्द सहना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर कर्जग्रस्त होकर वे ऐसे आर्थिक संकट में फंस जाते हैं, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश भी एक अत्यधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र रहा है और पिछले वर्ष यहां के अनेक गांवों में बाढ़ की मार काफी अधिक रही। विशेषकर गोंडा जिले जैसे उन क्षेत्रों में, जहां तटबंध टूटने से अधिक तबाही हुई। दिसंबर के अंतिम दिनों में यहां के अनेक गांवों में यह लेखक गया तो पता चला कि बाढ़ के तीन-चार महीने बीत जाने पर भी अधिकांश लोग दीर्घकालीन सहायता से वंचित हैं। आपदा राहत कोष संबंधी सरकार द्वारा तय मानदंडों के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक फसल की क्षति होने पर प्रति हेक्टेयर दो हजार (असिंचित) से 4000 रुपये (सिंचित) के हिसाब से छोटे और सीमांत किसानों को सहायता दी जाएगी। साल भर खड़ी रहने वाली फसल या गन्ने के लिए यह सहायता राशि 6,000 रुपये प्रति हेक्टेयर होगी। अन्य किसानों को 1 से 2 हेक्टेयर तक इस दर से सहायता देने का प्रावधान है। गोंडा जिले के रदौली ग्राम पंचायत क्षेत्र के प्रधान सुरेंद्र कुमार तिवारी ने बताया कि उनके यहां के लगभग सभी परिवारों की कृषि 80 से 100 प्रतिशत तक बाढ़ से तबाह हुई, लेकिन उन्हें कुछ भी सहायता या क्षतिपूर्ति कृषि के संदर्भ में नहीं मिली है। इस पंचायत के मजरा टपरा के अनेक किसानों से बातचीत करने पर यही पता चला कि खेती संबंधी कोई सहायता नहीं मिली है। महारमपुर मजरे (गोपसराय पंचायत, जिला गोंडा) के किसानों ने बताया कि 70 से 100 प्रतिशत क्षति होने पर भी कुछ भी सहायता नहीं मिली है। इन किसानों ने बताया कि बीज तक न होने के कारण और आर्थिक आधार टूट जाने के कारण वे रबी की फसल बोने में बहुत कठिनाई महसूस कर रहे हैं। आपदा राहत कोष के सरकारी मानदंडों के अनुसार पक्के आवास के पूरी तरह नष्ट होने पर 35,000 रुपये की सहायता, गंभीर क्षति पर 5,000 रुपये और मामूली क्षति पर 1,500 रुपये की सहायता का प्रावधान है। इसी तरह कच्चे घर के पूरी तरह नष्ट होने पर 10,000 रुपये, गंभीर क्षति होने पर 2,500 रुपये और कुछ क्षति होने पर 1,500 रुपये की सहायता का प्रावधान है। झोपड़ी नष्ट या क्षतिग्रस्त होने पर 2,000 रुपये की सहायता का प्रावधान है, लेकिन महारमपुर में हमने जब ऐसे अनेक परिवारों से बातचीत की, जिनकी झोपड़ी या आवास गिर गए हैं या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं तो पता चला कि इनमें से किसी को भी सरकारी सहायता नहीं मिली है। रदौली के ग्राम प्रधान सुरेंद्र तिवारी ने बताया कि उनकी पंचायत में कुल 12 परिवारों को आवास संबंधी 1,500 रुपये की श्रेणी की सहायता मिली है। उन्होंने बताया कि बहुत से परिवारों को जिन्हें यह सहायता मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली है। हमने स्वयं ऐसे कितने ही परिवारों से बातचीत की, जिनके आवास नष्ट हुए या क्षतिग्रस्त हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई सहायता नहीं मिली है। गोरखपुर जिले के टोला महुवासर के ग्रामवासियों ने बताया कि इस बार बाढ़ की अत्यधिक मार के कारण खरीफ की मात्र 10 प्रतिशत फसल ही मुश्किल से बची, लेकिन एक भी परिवार को राहत नहीं मिली। गिरी हुई झोपडि़यों-आवासों के लिए भी किसी क्षतिपूर्ति का इंतजाम नहीं हुआ। पिछले दो-तीन सालों में भी क्षतिपूर्ति सरकार से नहीं मिली थी, लेकिन इस बार अधिक नुकसान होने के कारण यह उम्मीद थी कि सरकार इसकी क्षतिपूर्ति करेगी। महुवासर के किसानों की कृषि की जो भी बेहतर ऊपरी क्षेत्र की जमीन थी, उसका नवोदय स्कूल बनाने के नाम पर बहुत कम मुआवजा देकर अधिग्रहण कर लिया गया था। यहां के निर्धन परिवारों को रोजगार का वादा किया गया था, लेकिन उन्हें कोई रोजगार नहीं मिला। यहां के लोगों ने बताया कि हम नदी और तटबंध के बीच पिस रहे हंै। तटबंध के दूसरी ओर जो भी अच्छी जमीन थी, वह छिन गई है। यह जमीन छिनने पर हमें ऐसा लगा, जैसे किसी का सिर कट जाए। यहां के लोगों ने कहा कि इस अन्याय का विरोध उन्होंने बहुत किया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस कारण उनकी आजीविका की क्षमता बहुत कम हो गई है। सरकार द्वारा कोई राहत न देने पर उनकी स्थिति बहुत विकट हो गई है। इसी जिले के मखनहां पुरवा के लोगों ने बताया कि इस वर्ष की बाढ़ ने खेती की बहुत क्षति की और अनेक लोगों के आवास भी गिर गए, लेकिन अभी तक किसी को भी सरकार की ओर से कोई क्षतिपूर्ति या सहायता नहीं मिली है। गांववासियों ने बताया कि कहीं से कर्ज लेकर तो कहीं से प्लास्टिक की चादर लेकर किसी तरह सिर ढकने का इंतजाम उन्होंने किया है, लेकिन शीतलहर से बचाव कठिन है। यहां तक कि कुछ साल पहले मखनहां टोले के साथ लगे धुसवां टोले का तो अस्तित्व ही विनाशकारी बाढ़ से मिट गया। तटबंध टूटने से यह टोला पुरी तरह ध्वस्त हो गया और फिर नए सिरे से बस न सका। यहां रहने वाले लगभग 25 परिवार इधर-उधर बिखर गए। जब यह टोला ध्वस्त हुआ, उस समय भी बस नाम मात्र की ही सहायता दी गई थी। इस तरह स्पष्ट है कि इस गांव में पहले ही बहुत तबाही झेल चुके परिवार रहते हंै और जब उन तक बाढ़ राहत नहीं पहंुचती है तो उनके लिए भूख और शीतलहर से बचना और कठिन हो जाता है। गोरखपुर के ही बंजरहा इलाके लोगों से जब पिछले पांच-छह सालों के बाढ़ राहत के अनुभव के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि केवल एक वर्ष ही सरकार से बहुत मामूली-सी सहायता मिली थी। इस वर्ष यहां बाढ़ से अधिक क्षति होने पर भी कुछ भी सहायता नहीं मिली। यहां के लोगों ने बताया कि तटबंध और नदी के बीच में उनका गांव पिस गया है व तटबंध बनने के बाद उनकी खेती और पशुपालन आधारित आजीविका पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ा है। ऐसी स्थिति में बाढ़ की क्षतिपूर्ति न होने पर निर्धन परिवार शीघ्र ही संकट ग्रस्त हो जाते हैं। यदि इस तरह की निर्धन ग्रामीण बस्तियों में बाढ़ राहत कार्य की ऐसी ही उपेक्षा होती रही तो अभाव, भूख, कर्ज की समस्याएं बढे़ंगी और शीतलहर के दिनों में भूख और कुपोषण की मार और क्रूर रूप ले सकती है। लिहाजा, प्रशासन को राहत और सहायता पहुंचाने में अब और देर नहीं करनी चाहिए। पहले ही बहुत देर हो चुकी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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