Sunday, January 23, 2011

उत्तराखंड के अफसर मनरेगा को लेकर झेल रहे फजीहत


केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में अफसरों के गले की फांस बन गई है। जिले, ब्लाक और विकास खंडों में तैनात अधिकारी योजना के तकनीकी पेंच में ऐसे उलझें हैं कि हर समीक्षा बैठक में उनकी किरकिरी होना तय है। अफसरों की फजीहत केंद्र से मिले पैसे को तुरंत न खर्च कर पाने की व्यवहारिक दिक्कतों की वजह से हो रहा है। उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले में मनरेगा की जमीनी हकीकत चाहे जो हो, इसके तानेबाने ने अफसरों की किरकिरी करा डाली है। समीक्षा बैठकों में इसकी धीमी प्रगति के वजह से कई अफसरों पर गाज गिरी है, लेकिन कुछ मामलों में मनरेगा के कार्य और धन आवंटन के तरीकों और व्यवहार में हो रहे काम को देखें तो अफसर बेचारे नजर आते हैं? केंद्र से आवंटित धन को खर्च न कर पाने के चलते जिला कृषि एवं मृदा संरक्षण अधिकारी सहित तीन का वेतन रोकने का आदेश जारी किया गया। लगा कि इन अफसरों की वजह से जिले में योजना का लक्ष्य पूरा नही हो पा रहा लेकिन विभाग को मिले धन और कराये गये कायरें की तुलना करने पर एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। सितंबर महीने में विभिन्न कार्य कराने के लिए आदेश मिले लेकिन नवंबर में भूमि संरक्षण कार्यालय को धन की पहली किस्त मिली, जिसके तहत मटकोटा क्षेत्र में अतिरिक्त जल निकासी का काम होना था। नवंबर महीने में ही सितारगंज क्षेत्र के कल्याणपुर में तालाब की सफाई और बंधे लगाने के लिए 5 लाख 6 हजार रुपये मिले जिनसे काम शुरू हुआ। इसी तरह दिसंबर में सिसौना, नानकमत्ता व विजया में कट्टा पिचींग, तालाब की सफाई व नाला सफाई का काम होना था। इनमें से एक पूरा भी हो गया। अभी जनवरी महीने में रुद्रपुर के बगवाड़ा, नारायणपुर, बेडि़या और दरऊं में मनरेगा के तहत काम कराने के लिए विभाग को 18 लाख 38 हजार 900 रुपये मिले जिसमें से 15 लाख रुपये वापस मांग लिए गये। इसी तरह 10 जनवरी को मिले 12 लाख रुपयों में से 10 लाख रुपये वापस मांग लिए गये। हद तो यह भी कि नवंबर में विभाग को एक ऐसे काम की जिम्मेदार दे दी गई जिसके लिए ग्राम प्रधान को ब्लाक से भी पैसा मिला था। ऐसे मे धन कहां खर्च करें अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा। इसको लेकर तकनीकी दिक्कतें भी कम नहीं हैं। अधिकारियों की माने तो गांवों में जाबकार्ड धारक लोग पहले से ही दूसरी योजना मे लगे हों तो श्रम उपलब्ध न हो पाना योजना की प्रगति का सबसे बड़ा रोड़ा है। इसके अलावां मिले काम का मौके पर आकलन और मजदूरों के नियोजन मे वक्त लगता ही है। इस योजना का ताप झेल चुके कई हाकिमों को लगता है कि जमीनी सच्चाई की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है।

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