Sunday, January 16, 2011

स्वास्थ्य की दिशा में सराहनीय कदम

स्वास्थ्य मंत्रालय देश के तकरीबन सभी जिलों में मेडिकल स्कूल खोलने का मन बना रहा है। गांवों में डॉक्टरों की भारी कमी को पूरा करने और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की दिशा में यह कदम मील का पत्थर साबित हो सकता है। आज गांवों में डॉक्टरों की बेहद कमी है। इसके लिए कहीं न कहीं सरकार की नीतियां ही जिम्मेदार रही है। सरकारी डॉक्टर गांवों में सेवा देने के बजाए शहरों में ही काम करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। सरकार डॉक्टरों को गांव में भेजने के लिए कई बार कड़े नियमों का भी सहारा लेती है लेकिन तब वे गांव जाने के बजाए नौकरी छोड़ना ही बेहतर समझते हैं। नतीजतन सरकार को उनके आगे झुकना पड़ता है। गाम्रीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज देश के तकरीबन दो लाख से अधिक स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर डॉक्टर नदारद हैं। निजी क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टरों का पसंदीदा स्थान शहर ही होता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली स्वाभाविक है। अब देर से ही सही स्वास्थ्य मंत्रालय इस दिशा में कारगर कदम उठाने जा रहा है। मंत्रालय के निर्देश पर मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया द्वारा ग्रामीण डॉक्टरों के बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ केयर का पाठ्यक्रम भी निर्धारित कर लिया गया है। इसमें उन्हीं विषयों का समावेश किया गया है जिनसे ग्रामीणों की बीमारियों का कारगर इलाज किया जा सकता है। देश के तकरीबन सभी राज्य इस योजना पर अपनी सहमति भी जता चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय यह कार्य राज्यों के विविद्यालयों के सहयोग से पूरा करना चाहता है। स्वास्थ्य मंत्रालय की पहल पर राज्य सरकारों द्वारा जिला अस्पतालों की पहचान का कार्य भी शुरू कर दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की योजना है कि प्रत्येक जिले के मेडिकल स्कूलों से कम से कम दो दर्जन से लेकर चार दर्जन तक डॉक्टर प्रशिक्षित होकर निकलें। अगर यह योजना परवान चढ़ी तो देश के ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी नहीं रह जाएगी। इस तरह तकरीबन छ: लाख से अधिक गांवों को स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाएं मिलनी शुरू हो जाएगी। आज की तारीख में गांवों की 95 फीसद जनता स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर ही निर्भर है। इन नीम हकीम डॉक्टरों को मेडिकल शिक्षा का बिल्कु ल ज्ञान नहीं है। न तो इनके खिलाफ सरकार द्वारा कार्रवाई की जा रही है और न आम आदमी द्वारा ही इनका विरोध किया जाता है। इसका दुष्परिणाम रोगियों को भोगना पड़ रहा है। रोगों का निदान होना तो दूर, मरीजों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। लेकिन देखा जाए तो गांवों में इन झोलाछाप डॉक्टरों का कोई विकल्प भी नहीं है। प्रशिक्षित डॉक्टरों के अभाव में गांव के गरीबों की झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भरता उनकी मजबूरी बन चुकी है। सबसे भयावह स्थिति तो महिलाओं की है। आए दिन प्रसव के दौरान महिलाओं के मरने की खबरें सुर्खियां बनती हैं। उचित डॉक्टरी सलाह के अभाव में महिलाओं की छोटी-मोटी बीमारियां भी जानलेवा बन जाती हैं। लेकिन अब स्वास्थ्य मंत्रालय की पहल से एक साथ कई समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। जिला स्तर पर मेडिकल स्कूलों के खुलने से डॉक्टरों की कमी से तो निजात मिलेगी ही साथ ही झोलाछाप डॉक्टरों से भी मुक्ति मिल जाएगी। सबसे अच्छी बात यह है कि जिला स्तर पर खुलने जा रहे मेडिकल स्कूलों में सिर्फ उन्हीं छात्रों को एडमिशन मिलेगा जो गांव के होंगे। साथ ही पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद इन डॉक्टरों को पांच वर्ष तक गांवों के प्राथमिक चिकित्सा केंदों पर काम करना होगा। देखा जाए तो स्वास्थ्य मंत्रालय की इस नीति के कई फायदे देखने को मिल सकते हैं। मसलन गांव के उन गरीब होनहार छात्रों को, जिनका सपना डॉक्टर बनना होता है, वह पूरा होगा। उन्हें रोजगार के लिए भी दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। अक्सर देखा जाता है कि उचित इलाज के अभाव में गांव के लोगों को शहरों की ओर रुख करना पड़ता है। इससे न केवल उन पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। गांवों में डॉक्टरों की नियुक्ति स्वस्थ भारत के निर्माण में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है बशत्रे स्वास्थ्य मंत्रालय ईमानदारी से इसे अमलीजामा पहनाए।

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