पंजाब में साल भर में आबादी वाले 51 गांव और दो दर्जन कस्बे गायब हो गए! ये गांव-कस्बे कहां गए, इनमें रहने वाले बाशिंदे कहां पलायन कर गए, इसके बारे में सरकार को भी शायद कुछ नहीं पता है। पंजाब सरकार की वर्ष 2011 की डायरी में यह सनसनीखेज आंकड़ा दर्ज है। इसके अलावा भी तमाम ऐसे आंकड़े दर्ज हैं, जिन्हें देखकर हर कोई असमंजस में पड़ जाएगा। पंजाब सरकार की 2010 की डायरी में आबादी वाले गांवों की संख्या 12329, जबकि 2011 की डायरी में यह संख्या 12278 रह गई। इसी तरह कस्बों की संख्या भी 167 के मुकाबले 2011 में 143 हो गई है। एक खास बात यह भी कि सालभर में राज्य में नया ट्रैक्टर या टिल्लर खरीदा-बेचा नहीं गया। पिछले साल भी इनकी संख्या 4.25 लाख थी और इस साल की डायरी में यह आंकड़ा इतना ही है। डायरी तैयार करने वाले अधिकारियों की गंभीरता साक्षरता दर के आंकड़ों में भारी गिरावट से साफ नजर आती है। 2010 की डायरी में जहां 75.63 फीसदी पुरुषों और 63.55 फीसदी महिलाओं को साक्षर बताया गया था, वहीं साल 2011 की डायरी में इनको क्रमश: 53.63 और 46.7 फीसदी साक्षर दिखाया गया है। यानी यह गिरावट 20 प्रतिशत तक है। साक्षरता कालम में महिलाओं व पुरुषों की संख्या पंजाब की 2001 की जनगणना के मुताबिक पूरी जनसंख्या दर्ज है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी गिरावट देखने को मिली। 2010 की डायरी में प्रदेश में 1449 एलोपैथिक डिस्पेंसरियां बताई गई हैं, जबकि नई डायरी में 1414 दर्शाई गई। ऐसा ही है ट्यूबवेल कनेक्शन का आंकड़ा। बीते साल की डायरी में अंकित है कि राज्यभर में 12.82 लाख ट्यूबवेल थे, जबकि नई डायरी में इनको 13.70 लाख ट्यूबवेल बताया गया। यानी सालभर में 88 हजार ट्यूबवेल बढ़े। वर्ष 2011 की डायरी के पन्ना नंबर 10 पर साफ लिखा है कि सालभर में किसानों को 76 हजार नए ट्यूबवेल कनेक्शन जारी किए गए।
Sunday, January 30, 2011
पंजाब में 51 गांव एवं दो दर्जन कस्बे गायब!
पंजाब में साल भर में आबादी वाले 51 गांव और दो दर्जन कस्बे गायब हो गए! ये गांव-कस्बे कहां गए, इनमें रहने वाले बाशिंदे कहां पलायन कर गए, इसके बारे में सरकार को भी शायद कुछ नहीं पता है। पंजाब सरकार की वर्ष 2011 की डायरी में यह सनसनीखेज आंकड़ा दर्ज है। इसके अलावा भी तमाम ऐसे आंकड़े दर्ज हैं, जिन्हें देखकर हर कोई असमंजस में पड़ जाएगा। पंजाब सरकार की 2010 की डायरी में आबादी वाले गांवों की संख्या 12329, जबकि 2011 की डायरी में यह संख्या 12278 रह गई। इसी तरह कस्बों की संख्या भी 167 के मुकाबले 2011 में 143 हो गई है। एक खास बात यह भी कि सालभर में राज्य में नया ट्रैक्टर या टिल्लर खरीदा-बेचा नहीं गया। पिछले साल भी इनकी संख्या 4.25 लाख थी और इस साल की डायरी में यह आंकड़ा इतना ही है। डायरी तैयार करने वाले अधिकारियों की गंभीरता साक्षरता दर के आंकड़ों में भारी गिरावट से साफ नजर आती है। 2010 की डायरी में जहां 75.63 फीसदी पुरुषों और 63.55 फीसदी महिलाओं को साक्षर बताया गया था, वहीं साल 2011 की डायरी में इनको क्रमश: 53.63 और 46.7 फीसदी साक्षर दिखाया गया है। यानी यह गिरावट 20 प्रतिशत तक है। साक्षरता कालम में महिलाओं व पुरुषों की संख्या पंजाब की 2001 की जनगणना के मुताबिक पूरी जनसंख्या दर्ज है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी गिरावट देखने को मिली। 2010 की डायरी में प्रदेश में 1449 एलोपैथिक डिस्पेंसरियां बताई गई हैं, जबकि नई डायरी में 1414 दर्शाई गई। ऐसा ही है ट्यूबवेल कनेक्शन का आंकड़ा। बीते साल की डायरी में अंकित है कि राज्यभर में 12.82 लाख ट्यूबवेल थे, जबकि नई डायरी में इनको 13.70 लाख ट्यूबवेल बताया गया। यानी सालभर में 88 हजार ट्यूबवेल बढ़े। वर्ष 2011 की डायरी के पन्ना नंबर 10 पर साफ लिखा है कि सालभर में किसानों को 76 हजार नए ट्यूबवेल कनेक्शन जारी किए गए।
Sunday, January 23, 2011
उत्तराखंड के अफसर मनरेगा को लेकर झेल रहे फजीहत
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में अफसरों के गले की फांस बन गई है। जिले, ब्लाक और विकास खंडों में तैनात अधिकारी योजना के तकनीकी पेंच में ऐसे उलझें हैं कि हर समीक्षा बैठक में उनकी किरकिरी होना तय है। अफसरों की फजीहत केंद्र से मिले पैसे को तुरंत न खर्च कर पाने की व्यवहारिक दिक्कतों की वजह से हो रहा है। उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले में मनरेगा की जमीनी हकीकत चाहे जो हो, इसके तानेबाने ने अफसरों की किरकिरी करा डाली है। समीक्षा बैठकों में इसकी धीमी प्रगति के वजह से कई अफसरों पर गाज गिरी है, लेकिन कुछ मामलों में मनरेगा के कार्य और धन आवंटन के तरीकों और व्यवहार में हो रहे काम को देखें तो अफसर बेचारे नजर आते हैं? केंद्र से आवंटित धन को खर्च न कर पाने के चलते जिला कृषि एवं मृदा संरक्षण अधिकारी सहित तीन का वेतन रोकने का आदेश जारी किया गया। लगा कि इन अफसरों की वजह से जिले में योजना का लक्ष्य पूरा नही हो पा रहा लेकिन विभाग को मिले धन और कराये गये कायरें की तुलना करने पर एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। सितंबर महीने में विभिन्न कार्य कराने के लिए आदेश मिले लेकिन नवंबर में भूमि संरक्षण कार्यालय को धन की पहली किस्त मिली, जिसके तहत मटकोटा क्षेत्र में अतिरिक्त जल निकासी का काम होना था। नवंबर महीने में ही सितारगंज क्षेत्र के कल्याणपुर में तालाब की सफाई और बंधे लगाने के लिए 5 लाख 6 हजार रुपये मिले जिनसे काम शुरू हुआ। इसी तरह दिसंबर में सिसौना, नानकमत्ता व विजया में कट्टा पिचींग, तालाब की सफाई व नाला सफाई का काम होना था। इनमें से एक पूरा भी हो गया। अभी जनवरी महीने में रुद्रपुर के बगवाड़ा, नारायणपुर, बेडि़या और दरऊं में मनरेगा के तहत काम कराने के लिए विभाग को 18 लाख 38 हजार 900 रुपये मिले जिसमें से 15 लाख रुपये वापस मांग लिए गये। इसी तरह 10 जनवरी को मिले 12 लाख रुपयों में से 10 लाख रुपये वापस मांग लिए गये। हद तो यह भी कि नवंबर में विभाग को एक ऐसे काम की जिम्मेदार दे दी गई जिसके लिए ग्राम प्रधान को ब्लाक से भी पैसा मिला था। ऐसे मे धन कहां खर्च करें अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा। इसको लेकर तकनीकी दिक्कतें भी कम नहीं हैं। अधिकारियों की माने तो गांवों में जाबकार्ड धारक लोग पहले से ही दूसरी योजना मे लगे हों तो श्रम उपलब्ध न हो पाना योजना की प्रगति का सबसे बड़ा रोड़ा है। इसके अलावां मिले काम का मौके पर आकलन और मजदूरों के नियोजन मे वक्त लगता ही है। इस योजना का ताप झेल चुके कई हाकिमों को लगता है कि जमीनी सच्चाई की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है।
गांव भी जुड़ेंगे लोकल ट्रांसपोर्ट से
स्पेशल पर्पज ऑफ व्हीकल (एसपीवी) योजना को परवान चढ़ाने के लिए रोडवेज सक्रिय हो गया है। योजना के तहत सेक्टरों के साथ गांवों को भी पूरी तरह लोकल ट्रांसपोर्ट से जोड़ने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। शहर में नए सिरे से रूट निर्धारण के लिए आरडब्ल्यूए से संपर्क साधा जा रहा है, वहीं गांवों में रोडवेज की टीम खुद सर्वे कर रही है।
पिछले आठ महीनों में शहर के कई सेक्टरों को लोकल ट्रांसपोर्ट से जोड़ा जा चुका है। इसके लिए रोडवेज ने शहर के आरडब्ल्यूए संगठन का सहयोग लिया था। प्राधिकरण और रोडवेज की तरफ से शुरू होने वाली एसपीवी योजना को सफल बनाने के लिए रोडवेज ने एक बार फिर आरडब्ल्यूए पर भरोसा जताया है। रोडवेज अधिकारी बेहतर रूटों और आम जनता की सुविधा को समझने के लिए आरडब्ल्यूए से संपर्क साध रहा है। सेक्टरों में रूटों का सुझाव मांगा जा रहा है, वहीं सेक्टरों से लगे हुए गांव और शहरी क्षेत्र से अलग-थलग पड़े ग्रामीण क्षेत्रों को भी इस योजना के तहत लोकल ट्रांसपोर्ट से जोड़ने की कवायद तेज कर दी गई है।
रोडवेज निगम की तरफ से गठित सर्वे टीम ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वे कर रही हैं। निगम की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा गांवों को लोकल ट्रांसपोर्ट से जोड़ा जाए। आरएम पी.आर. बेलवारियर ने बताया कि शहर में लोकल ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने के लिए पहले से प्रयास किए जा रहे थे। एसपीवी योजना से स्थितियों में और भी सुधार आएगा। इस योजना में कितने व्हीकल जोड़े जाएंगे, यह सारी जरूरतों की जानकारी लेने के बाद ही तय होगा। शहर में सेक्टरों और गांवों दोनों को सिटी बस सेवा से जोड़ना प्राथमिकता रहेगी।
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