Friday, February 11, 2011

स्थानीय लोगों के हित में नहीं योजना


जैतापुर (महाराष्ट्र) में प्रस्तावित 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938 हेक्टेयर जमीन ली जानी है, जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन हमारे गांव मडवन की है। यह संयंत्र हमारे लिए षडयंत्र है। हमारे गांव के लोग बिल्कुल इसके लिए तैयार नहीं हैं। सरकार हमसे इस विषय पर बात करना चाहती है, लेकिन जब उसने फैसला कर लिया है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए मडवन की जमीन ही ली जानी है तो बातचीत का क्या लाभ? वैसे इस तरह के व्यवहार को तानाशाही कहा जा सकता है, बातचीत तो कदापि नहीं। इस परियोजना का जब गांव के लोगों ने विरोध किया तो गांव वालों को पुलिसिया ज्यादती का शिकार होना पड़ा। लगभग दो सौ लोगों पर विभिन्न धाराओं में मुकदमा चल रहा है। आधा दर्जन से अधिक लोगों को तड़ीपार घोषित किया जा चुका है। इरफान जिसकी इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी थी, पुलिस की गाड़ी के नीचे आने से उसकी मौत हुई। अब इन सारी बातों का हम क्या अर्थ निकालें? ऐसे बच्चों को पुलिस अपने साथ गांव से उठाकर ले गई जो स्कूल से लौट रहे थे। बच्चों ने पुलिस को बस का टिकट भी दिखाया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। गांव वालों का स्पष्ट मानना है कि सरकार चाहे तो हमारी हत्या कर दे, वह जमीन हमसे छीन ले लेकिन जीते जी हम यह जमीन उन्हें नहीं सौंप सकते हैं। मडवन परियोजना के विरोध में लगभग एक दर्जन पंचायतें अब तक भंग हो चुकी हैं। लोगों ने मिलकर तय किया है कि परियोजना की जमीन पर चौकसी में लगे पुलिस वालों को गांव के लोग किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। मडवन हमारे लिए क्यों जरूरी है और हम इस परियोजना को अपने गांव में क्यों नहीं चाहते, इसे लेकर हम लोगों ने सीमित संसाधनों में एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म भी बनवाई है। हमारा क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज अति संवेदनशील है। सरकार को चाहिए कि इस परियोजना को मालाबार के तट पर लेकर जाए। तमाम तरह की समितियों की रिपोर्ट आप देख लीजिए। इस जमीन को किसी भी प्रकार से परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए उपयुक्त नहीं माना जा रहा है। रत्नागिरी जिले के अलावा सिंधुदुर्ग और रायगढ़ में भी कई प्रदूषण फैलाने वाली परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है। हमें फिक्र है कि इन परियोजनाओं की वजह से इन जिलों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य, समुद्री जीव-जन्तु और जैव-विविधता पर बुरा असर पड़ेगा। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। यदि मडवन में यह संयंत्र बन गया तो यह सिर्फ हमारे गांव के जनजीवन को नहीं, बल्कि पूरे कोंकण के जनजीवन को प्रभावित करेगा। वर्ष 2003 में ही हमने पूर्व कंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु से इस संकट को लेकर बातचीत की थी। उस वक्त वह गांव में आकर बोल गए थे कि यह सिर्फ अफवाह है और ऐसी कोई परियोजना शुरू नहीं हो रही। लेकिन उस दिन के बाद वे कभी हमारे गांव में लौटकर नहीं आए। महाराष्ट्र में मराठी मानुष की राजनीति करने वाले भी इस मुद्दे पर आज दो कदम पीछे खड़े हो गए हैं जबकि इस मामले में शत प्रतिशत जमीन मराठी मानुषों की ही जा रही है। हमें कदम-कदम पर छला गया और धोखे में रखा गया है। तारापुर परियोजना के लिए बताया गया कि वहां सब अच्छा चल रहा है। मैं खुद उस गांव गया था। आज वहां की स्थिति बिल्कुल दयनीय है। सिरदर्द, घुटनों में दर्द जैसी समस्याओं के साथ गर्भपात की संख्या में आश्र्चयजनक वृद्धि हुई है। गांव में कमजोर और अस्वस्थ बच्चे पैदा हो रहे हैं। परियोजना से पहले इस गांव में मछली पकड़ने के लिए 48 लॉंच थे और अब सिर्फ दो ही रह गए हैं। मैं स्पष्ट शब्दों में कह देना चाहता हूं, क्षेत्रवासी जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजना बिल्कुल खिलाफ हैं।


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