हजारों और लाखों में खेलने वाले व्यक्ति जब केंद्र सरकार द्वारा चलाई जाने वाली मनरेगा योजना का दामन थाम ले तो समाज के वास्तवित गरीब मजदूरों को इस योजना का लाभ कैसे मिल सकता है।
विदित हो कि इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा संचालित मनरेगा योजना पूरी तरह प्रभावी है जिसके अंतर्गत गरीब तबके के लोगों को 10 दिन का रोजगार उपलब्ध कराए जाने का प्राविधान है किन्तु विकास खण्ड बनीकोडर व विकास खण्ड दरियाबाद में इसका ठीक उल्टा हो रहा है। जो भूमिहीन व वास्तवित रूप से गरीब हैं तथा जिनके घरों में एक दिन के खाने तक ठीकाना नहीं है, लेकिन ग्राम प्रधानों की मनमानी के चलते इस योजना का अनुपालन उस तरह नहीं हो पा रहा है जिस तरह होना चाहिए। इस योजना के अंतर्गत जॉबकार्ड उन्हीं लोगों के बनाए जा रहे हैं जो आर्थिक रूप से सम्पन्न है तथा जिनके नाम हजारों रुपयों का बैंक बैलेन्स हैं पंचायती राज व्यवस्था की यह योजना, सबसे महत्व पूर्ण कड़ी है जिसके अंतर्गत गरीब तबके के लोगों का हित सुरक्षित हैं किन्तु यह व्यवस्था संबंधित ग्राम प्रधानों की महत्वाकांक्षी रवैए का पूरा माखौल उड़ाती नजर आ रही है। मनरेगा योजना के शुरूआती दौर में व्यवस्था कुछ ठीक ठाक चली किन्तु ज्यों ज्यों सरकार ने गांवों के विकास हेतु बेथाह पैसा उलचना शुरू किया त्यांे त्यों ग्राम प्रधानों व उनके सचिवों की नियत में खोट आती गई और मनरेगा की मजदूरी व सामग्री की भारी भरकम धनराशि प्रधान जी की निजी सम्पत्ति बन गई। सरकारी योजनाओं में प्रधान व पंचायत सचिवों ने लगाकर धन आहरित करना तथा शौचालयों का लाभ मिले बगैर ही ग्रामीणों के नाम धन निकाल कर अपनी जेबे भरना उनका मात्र एक पेशा बन गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जो तथ्य सामने उभर कर आए वे वास्तव में चौकाने वाले हैं। विकास खण्ड बनीकोडर व दरियाबाद की अधिकांश ग्राम पंचायतों में देखा गया है कि प्रधान जी ने निर्धारित मानकों की धज्जियां उड़ाते को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि ये लाभार्थी मजदूरों की श्रेणी में आते हैं। जिल हाथों ने कभी खुरपा तक नहीं पकड़ा वे तालाबों के किनारे फावड़ा पकड़े सहजता से देखे जा सकते हैं। हो भी क्यों न, क्योंकि उन्होंने प्रधान को चुनाव में पूरी ताकत से जिताया है। चुनावों में जो एहशान जनता ने प्रधान के साथ किया उन्हीं एहशानों को उतारना है। ऐसा नहीं है कि सरकारी अफसरों को इस बात की भनक नहीं है लेकिन सब कुछ जानने के बावजूद यह अधिकारी प्रधान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी हर कारगुजारी में सम्मलित रहते हैं।
विदित हो कि इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा संचालित मनरेगा योजना पूरी तरह प्रभावी है जिसके अंतर्गत गरीब तबके के लोगों को 10 दिन का रोजगार उपलब्ध कराए जाने का प्राविधान है किन्तु विकास खण्ड बनीकोडर व विकास खण्ड दरियाबाद में इसका ठीक उल्टा हो रहा है। जो भूमिहीन व वास्तवित रूप से गरीब हैं तथा जिनके घरों में एक दिन के खाने तक ठीकाना नहीं है, लेकिन ग्राम प्रधानों की मनमानी के चलते इस योजना का अनुपालन उस तरह नहीं हो पा रहा है जिस तरह होना चाहिए। इस योजना के अंतर्गत जॉबकार्ड उन्हीं लोगों के बनाए जा रहे हैं जो आर्थिक रूप से सम्पन्न है तथा जिनके नाम हजारों रुपयों का बैंक बैलेन्स हैं पंचायती राज व्यवस्था की यह योजना, सबसे महत्व पूर्ण कड़ी है जिसके अंतर्गत गरीब तबके के लोगों का हित सुरक्षित हैं किन्तु यह व्यवस्था संबंधित ग्राम प्रधानों की महत्वाकांक्षी रवैए का पूरा माखौल उड़ाती नजर आ रही है। मनरेगा योजना के शुरूआती दौर में व्यवस्था कुछ ठीक ठाक चली किन्तु ज्यों ज्यों सरकार ने गांवों के विकास हेतु बेथाह पैसा उलचना शुरू किया त्यांे त्यों ग्राम प्रधानों व उनके सचिवों की नियत में खोट आती गई और मनरेगा की मजदूरी व सामग्री की भारी भरकम धनराशि प्रधान जी की निजी सम्पत्ति बन गई। सरकारी योजनाओं में प्रधान व पंचायत सचिवों ने लगाकर धन आहरित करना तथा शौचालयों का लाभ मिले बगैर ही ग्रामीणों के नाम धन निकाल कर अपनी जेबे भरना उनका मात्र एक पेशा बन गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जो तथ्य सामने उभर कर आए वे वास्तव में चौकाने वाले हैं। विकास खण्ड बनीकोडर व दरियाबाद की अधिकांश ग्राम पंचायतों में देखा गया है कि प्रधान जी ने निर्धारित मानकों की धज्जियां उड़ाते को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि ये लाभार्थी मजदूरों की श्रेणी में आते हैं। जिल हाथों ने कभी खुरपा तक नहीं पकड़ा वे तालाबों के किनारे फावड़ा पकड़े सहजता से देखे जा सकते हैं। हो भी क्यों न, क्योंकि उन्होंने प्रधान को चुनाव में पूरी ताकत से जिताया है। चुनावों में जो एहशान जनता ने प्रधान के साथ किया उन्हीं एहशानों को उतारना है। ऐसा नहीं है कि सरकारी अफसरों को इस बात की भनक नहीं है लेकिन सब कुछ जानने के बावजूद यह अधिकारी प्रधान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी हर कारगुजारी में सम्मलित रहते हैं।
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