Friday, February 25, 2011

ग्रामीण विकास के खर्च में कंजूसी न बरते सरकार


इबार के बजट में विकास पर जोर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन जिस देश की दो तिहाई से अधिक आबादी खेती पर निर्भर हो और गांवों में निवास करती हो, वहां ग्रामीण विकास पर अधिक जोर दिए बिना समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। पता नहीं यह चीज हमारे देश के अधिकांश नीति निर्धारकों के पल्ले क्यों नहीं पड़ती। इधर के कई बजटों में ग्रामीण विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। आज बढ़ती महंगाई और खेती की बदहाल होती स्थिति ग्रामीण विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा खड़ी कर रही है। इसे नियंत्रित करना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है। बजट में अनिवार्यत: इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। गौर करने वाली बात है कि आर्थिक उदारीकरण के बीस साल आम लोगों को अपेक्षित रूप में लाभ नहीं दिला सके हैं और विकास की प्रक्रिया एकांगी होती जा रही है। गरीबी और आर्थिक असमानता घटने के बजाय बढ़ी है। देश में अभी तक सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का सही आंकड़ा प्रस्तुत नहीं कर पा रही है। यह दुखदायी है कि सरकार देश को गरीबों की सही संख्या के बारे में गुमराह करती रही है। सरकार इधर सकारात्मक तौर पर दूसरे दौर के सुधार की बात कर रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि पहले दौर से हमने क्या सबक हासिल किए हैं। जाहिर है सुधार प्रक्रियाओं को धरातल पर उतारने के पहले जब तक सरकार जमीनी सचाइयों से रूबरू नहीं होती और पूर्व की गलतियों से सबक नहीं लेती, सुधार की संभावना नहीं के बराबर है। हमें सबसे अधिक ध्यान मनरेगा पर देना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास को संबल देने के लिए इस योजना की शुरुआत की गई थी लेकिन इसका अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुआ। 2010 में इस मद में 41 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए गए जिसका करीब 55 फीसद हिस्सा ही दिसम्बर तक खर्च हो पाया। इस योजना में मार्च तक करीब 19 हजार करोड़ रुपए खर्च करने हैं जो संभव नहीं दिखता। आखिर राशि खर्च करने में कोताही क्यों हो रही है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि हमारे यहां इस मद की जरूरत करोड़ों लोगों को है। मेरा मानना है कि बजट में इस मद में और अधिक राशि आवंटित करने की जरूरत है। खबर यह है कि इस मद के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय 60 हजार करोड़ की मांग कर रहा है जबकि योजना आयोग ने मंत्रालय की सभी योजनाओं का कुल बजट 72 हजार करोड़ तय कर दिया है। इसमें मनरेगा ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री सड़क योजना और इंदिरा आवास योजना भी शामिल है। जाहिर है मनरेगा के लिए 60 हजार करोड़ की मांग पूरी नहीं होनी है जबकि इसके लाभार्थियों की संख्या किसी भी अन्य योजना के लाभार्थियों से अधिक है। आज करीब 410 लाख लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। फिर केवल राशि आवंटन की जरूरत ही नहीं बल्कि योजनाओं पर भ्रष्टाचार का दानव असर न डाले, यह भी देखना होगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने चंद दिनों पहले ही स्वीकार किया है कि सरकार जो पैसा खर्च करती है, उसका केवल 16 फीसद हिस्सा ही प्रयोग में आता है। बजट में सरकार को सिंचाई व्यवस्था में सुधार लाने पर भी ध्यान देना होगा। ग्रामीण इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर राशि भी खर्च करनी होगी। सड़कें और आधारभूत संरचना का विकास देश की उच्च विकास दर के लिए जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का अवसर बढ़ाने के लिए लघु उद्योगों का विकास और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में भी सुधार करना होगा। सरकार को याद रखना चाहिए कि हम शहरी नहीं, ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले देश हैं, इसलिए बजट में ग्रामीण विकास के लिए राशि आवंटित करने में कंजूसी दिखाना नकारात्मक होगा।

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