मजदूरों को गांवों में ही उचित मजदूरी दिलाने की योजना-मनरेगा की चर्चा हर किसी की जुबान पर है। मजदूरों के हित में तैयार इस योजना से अगर गरीबों का भला होता दिखता, तो इसकी आलोचना जनविरोधी और सामंतवादी कही जाती। मगर बात ऐसी है नहीं। बेशक इस योजना की कागजी तसवीर गुलाबी दिख रही है। वोट बैंक की दृष्टि से और जनपक्षधरता साबित करने के लिए ऐसी योजनाएं कुछ हद तक कारगर दिखती हैं। तभी तो मनरेगा का बजट और मजदूरी, दोनों बढ़ाई जा रही हैं। तो क्या मान लिया जाए कि गांवों में विकास हो रहा है?
इस योजना से गांवों में संरचनात्मक परिवर्तन उतना नहीं हो रहा, जितना बताया जाता है। निठल्ले पुरुषों में शराब पीने, ताश खेलने या प्रधान के दरवाजे पर बैठकर जी-हुजूरी करने की आदतें बदतस्तूर बनी हुई हैं। गांवों में क्या काम हो रहा है और जो हो रहा है, उससे गांवों का कितना भला होने जा रहा है, मनरेगा के लक्ष्य में यह मुद्दा नहीं है। मनरेगा का उद्देश्य है-ज्यादा से ज्यादा धनराशि खर्च कर देना। लेकिन तमाम लूट-खसोट और बंदरबांट के बावजूद बजट खर्च नहीं हो पा रहा। एक जिलाधिकारी अपने मातहतों को यह कहते सुने गए कि चाहे घास छिलवाओ, पर मनरेगा का पैसा हर हाल में खर्च होना चाहिए। इस योजना में यह सवाल नहीं उठाया जा रहा कि कराए जानेवाले कार्य की उपयोगिता क्या हो। सचाई यही है कि मनरेगा गांवों का विकास कम और खैरात बांटने का काम ज्यादा कर रहा है। सवाल यह है कि विगत एक-दो वर्षों में जिन लाखों तालाबों की खुदाई दिखाई गई है, उनसे भूजल स्तर बढ़ा है या तालाबों से सिंचित भूमि का रकबा बढ़ा है।
गांवों के विकास के लिए चलाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं खैरात बांटू हैं। खैरात की कमाई से गांवों को दूरगामी लाभ मिलना होता तो ‘मिड-डे मील’ ‘कन्या-धन,’ ‘पुष्टाहार योजनाओं’ या ‘साइकिल वितरण’ से तकदीर बदल गई होती। दरअसल मनरेगा जैसी योजनाएं आम आदमी को भ्रष्ट बना रही हैं। व्यवस्था जानती है कि जब आम आदमी भ्रष्टाचार का दाना-पानी ग्रहण करने लगेगा, तो वह लूटतंत्र के खिलाफ खड़ा नहीं होगा और व्यवस्था के लिए उपयुक्त होगा।
पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से जवाहर रोजगार योजना को लाकर गांवों को बदलने के जो सपने देखे गए थे और प्रधान के हाथों में विकास की तमाम योजनाओं को सौंप लूट के हिस्से को अफसरों से प्रधानों तक पहुंचा कर गांव की समरसता, भाईचारा और सुख-चैन को जिस तरह लील लिया गया था, उसकी हकीकत सबके सामने है।
हाल में एक संसदीय समिति ने फसल के मौसम में मनरेगा के तहत काम नहीं देने की सिफारिश की है। समिति का आकलन है कि इसके चलते खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते। समिति ने मनरेगा के तहत सृजित परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को ‘घटिया, गैर टिकाऊ और गैर उत्पादक’ बताया है। उसका मानना है कि सरकार ने रोजगार देने की उत्सुकता में इसके तहत सृजित परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को नजर अंदाज किया है।
ग्राम सभाओं की अधिकांश जमीनों को पट्टों पर दे देने के कारण कच्चे कार्यों की गुंजाइश कम बची है। ले-देकर चकरोडों की भराई और तालाबों की खुदाई का काम ही दिखाई दे रहा है। गांवों के तालाबों पर ताकतवर लोगों का कब्जा है। ताकतवर लोग दलितों या भूमिहीनों के नाम पर तालाबों का पट्टा लेकर मछली व्यवसाय करते हैं। ऐसे में तालाबों को गहरा करने का लाभ न तो गांवों को मिलने वाला है और न गरीबों को। रोजगार सृजित करने की मजबूरी में एक ही तालाब को बार-बार खोदा जा रहा है या खोदने का उपक्रम किया जा रहा है।
बेहतर होता कि गांवों में लघु उद्योगों को स्थापित कर मजदूरों को काम दिया जाता या सस्ते खाद, पानी, बीज, बिजली उपलब्ध करा कर कृषि उत्पाद बढ़ाने, उनका लाभप्रद मूल्य दिलाने की योजना बनाई जाती। इससे देश और मजदूर, दोनों का भला होता। बिना काम के भुगतान तो खैरात बांटने जैसी बात है। बिना यह देखे कि कार्य की जरूरत है या नहीं, मनरेगा का पैसा खर्च करने की पाबंदी सरकारी धन का दुरुपयोग ही है और एक अकर्मण्य समाज की नींव रख रही है। अगर गांव के मजदूरों ने भी खेती-किसानी से मुंह मोड़ लिया या खैरात तथा अनुदान से जीने का रास्ता चुन लिया, तो गांव की संरचना और देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। कहीं यही वैश्वीकरण की नीति तो नहीं?
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