Monday, February 14, 2011

गांवों में बिजली पहुंचाने के काम में जमकर अंधेरगर्दी


झारखंड के सुदूरवर्ती गांवों में केंद्र सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत रोशनी पहुंचाने की जद्दोजहद अंधेरेगर्दी का शिकार हो गई। विस्तृत कार्य योजना (डीपीआर) देरी से बनाने के साथ ही गलत बना दी गई। इसके बाद मीटर खरीदने के नाम पर 20 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि बेकार में फूंक दी गई। नियंत्रक और महालेखा परीक्षण (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को फरवरी 2007 तक अधिसूचित करने का निर्देश दिया था लेकिन 32 माह विलंब से इसका अनुमोदन किया गया। बिजली बोर्ड ने 818 पुनर्विद्युतीकृत तथा 3,917 अविद्युतीकृत गांवों को शामिल करते हुए 4,735 गांवों का डीपीआर तैयार किया। पथ सर्वेक्षण में ठेकेदारों ने पाया कि 264 गांव पहले से ही विद्युतीकृत थे। 16 गांवों के ऊंचाई पर तथा सुदूर क्षेत्रों में स्थित होने के मामले पर विचार नहीं किया गया। 375 अविद्युतीकृत गांवों को डीपीआर में शामिल नहीं किया गया। यह भी पाया गया कि वास्तव में किए जाने वाले कायरें की मात्रा डीपीआर में चिन्हित मात्रा से अधिक थी। इंगित किया गया कि डीपीआर गलत था। इसके चलते योजना की राशि बढ़ने के साथ-साथ राजस्व-घाटा भी उठाना पड़ा। रिपोर्ट में कहा गया है कि लेखा परीक्षण में पाया गया है कि मीटर लगाने में 20.53 करोड़ का व्यर्थ व्यय हुआ। इसके अलावा 64,047 उपभोक्ताओं को एक से 28 माह तक बिलिंग नहीं की गई, जिससे कम से कम 1.30 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण के लिए यह महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी।


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