Thursday, February 10, 2011

साझी जमीन पर कब्जा किसका


संपत्तिशाली लोगों, वर्चस्वशाली उद्यमियों को माटी के मोल या अवैध ढंग से आवंटन आज हर जगह चर्चित मुद्दा है। जनहित के नाम पर जमीन का अधिग्रहण और उसे निजी बिल्डरों या कारपोरेट सम्राटों को सौंपने की अलिखित नीतियां विभिन्न सत्ताधारी सियासी पार्टियों की कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा बन गई हैं। इस संदर्भ में गुडगांव जिले के सिलोखेरा एवं सुखबली में जनहित के नाम पर 215 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर बाद में बिल्डरों को बेच दिया गया। इस पर एक जनहित याचिका के संदर्भ में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को आदेश दिया है कि छह माह के अंदर इन जमीनों पर निर्माण गिरा दिया जाए और जमीन वापस ले लें। इसे संयोग ही कहेंगे हैं कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के इस फैसले के समय हरियाणा के जींद जिले में जुलाना के दलितों के साथ हुई ज्यादती का प्रसंग भी उभरा। वंचितों एवं गरीबों की जमीनों को हथियाने का यह एक उदाहरण है। मालूम हो कि यहां पर निर्माणाधीन एक बस अड्डा अब एक पुराने खंडहर में तब्दील हो गया है जो कि दलितों की जमीन पर आवंटित हुआ था। इसके बदले उन्हें न तो जमीन मिली और न ही आज तक उसका मुआवजा मिला। ऐसा नहीं कि विगत ढाई दशक में पीडि़त समुदाय के लोगों ने-धानक एवं हरिजन बिरादरी के छह सौ से अधिक परिवारों ने अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए अलग-अलग नेताओं और अफसरों के दरवाजे नहीं खटखटाए। मगर हर जगह उनके हाथों में आश्वासनों का पुलिंदा ही पकड़ाया गया। कांग्रेस, इनेलो, लोकदल, भाजपा किसी ने भी चकबंदी के समय इन्हें आवंटित साढ़े चार एकड़ जमीन के बदले में उन्हें जमीन दिलाने की अथवा मुआवजा दिलाने की पहल नहीं की। पिछले दिनों राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के जुलाना दौरे के वक्त भुक्तभोगियों ने इस मामले को सामने रखा। अब यह देखना बाकी है कि इस मामले में कोई कार्रवाई संभव हो पाती है या नहीं। जनांदोलनों या मीडिया की सक्रियता के कारण आम लोगों द्वारा सूचना के अधिकार के इस्तेमाल के चलते महानगरों में भूमि अधिग्रहण में बरती जाने वाली अनियमितताओं के कुछ मामलों का खुलासा तो हो पाया है, लेकिन एक दूसरे तरीके से साझी जमीनों को हस्तगत करने का जो सिलसिला चल रहा है, उस पर बात भी नहीं हो पाती है। कोई व्यापक आंदोलन होना तो दूर की बात है। इस पृष्ठभूमि में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की मार्कण्डेय काटजू एवं ज्ञानसुधा मिश्रा की द्विसदस्यीय पीठ द्वारा दिए गए फैसले ने इस मसले को फिर एक बार केंद्र में ला दिया है। पंजाब के पटियाला जिले के रोहर जागीर ग्राम में तालाब के तौर पर नक्शे में दर्ज जमीन के अनधिकृत अधिग्रहण के खिलाफ दायर याचिका के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसले का दूरगामी महत्व इस बात में भी है कि न केवल अदालत ने उपरोक्त मामले में ग्रामसभा की जमीन के कब्जे और उस पर निर्माण को गलत साबित किया, बल्कि इस बहाने अलग-अलग स्तरों पर मौजूद स्वार्थी तत्वों द्वारा इन कब्जों को वैध बनाने की कोशिशों को भी गैर कानूनी बताया है। अदालत ने सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को इस आदेश की प्रति भेज कर उनसे अपने यहां की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। तीन मई को इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट फिर विचार करेगा। ग्रामीण इलाकों में जिसे ग्रामसभा, ग्राम पंचायत भूमि, शामलात देह (पंजाब आदि क्षेत्रों में) और मंडावेली व पोरमबोके जमीन (दक्षिण भारत में) कहा जाता है और जिसका इस्तेमाल विभिन्न सामुदायिक कामों के लिए होता है उसे पैसा, धनबल और राजनीतिक दबदबे के आधार पर कब्जा करने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। अक्सर ऐसे कब्जों को वैध घोषित करने के लिए पिछले दरवाजे से हथकंडे भी अपनाए जाते रहे हैं। इसका एक तरीका ग्राम समाज के जमीन पर इस अवैध कब्जे के लिए कब्जाधारी से जुर्माना वसूला जाना रहा है। उपरोक्त मामले में भी यही सिलसिला चला, यहां तक कि गांव के तालाब की जमीन पर कब्जा करने वाली पार्टी इतनी वर्चस्वशाली थी कि उसने चुनी हुई ग्राम पंचायत के सदस्यों का भी मुंह बंद कराने में सफलता हासिल की। इसके बाद गांव के कुछ लोगों ने उच्च अदालत में जाना तय किया, आज इसका नतीजा सबके सामने है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ग्राम सभा की जमीन पर गांव के निवासियों के साझे अधिकारों को राज्य के संपत्ति के अधिकार के नाम पर खारिज नहीं किया जा सकता। इसके लिए चिगुरुपति वेंकटा शुभयया बनाम पालाडुगे अंजयया मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उल्लेखनीय है। इसी तरह अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को आवंटन जैसे अपवादात्मक मसले को छोड़ दिया जाए तो किसी भी मामले में ग्राम सभा की जमीन का निजी हाथों में हस्तांतरण उचित नही माना जा सकता। कुछ जुर्माना लेकर रोहर जागीर के कब्जे को वैध कराने के लिए पंजाब के मुख्य सचिव द्वारा लिखे पत्र को भी अदालत ने गैर कानूनी घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं एमआई बिल्डर्स बनाम राधेश्याम साहू 1999 (6) एससीसी 464 केस का हवाला देते हुए उसने यह भी जोड़ा कि ऐसे अवैध कब्जों पर करोड़ों रुपये लगाकर किए गए निर्माण का तरीका भी इन भूखंडों को फिर से सामुदायिक हाथों में हस्तांतरण को जाने से रोक नहीं सकता। मालूम हो कि इस मामले में पार्टी ने भूखंड पर 100 करोड़ की लागत से शॉपिंग मॉल का भी निर्माण किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि मॉल को गिराकर पहले से वहां मौजूद पार्क का निर्माण किया जाए। एक और मामले में तालाब के नाम पर दर्ज जमीन पर अवैध निर्माण के अन्य मुकदमे (हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी, एआइआर 2001 एससी 3215) का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसी सामुदायिक जमीन को किसी भी सूरत में मकान निर्माण के लिए दिया नहीं जा सकता। ग्राम सभा की जमीनों को किस तरह निजी हाथों में सौंपा जाता है इसके लिए उत्तर प्रदेश में प्रयुक्त एक नायाब तरीके का भी अदालत ने विशेष उल्लेख करना जरूरी समझा। मालूम हो कि जमीन के एकत्रीकरण के लिए बने चकबंदी कानून में चकबंदी अधिकारियों की मिलीभगत से या नकली आदेशों के जरिए ऐसी स्थिति तैयार की जाती है कि लंबे दौर में राजस्व के मूल रिकार्डो के साथ तुलना करना असंभव ही हो जाता है। अपने आदेश के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि वह ग्राम सभा/ग्राम पंचायत/शामिलात देह जैसी साझी जमीनों पर अवैध कब्जे को समाप्त करने के लिए योजना बनाएं और इस बात को सुनिश्चित करें कि ऐसी साझा जमीनें ग्राम सभा को साझे इस्तेमाल के लिए फिर से दोबारा वापस लिया जा सके। अब इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार पांच मई, 2011 को इस मामले को लेकर विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिवों को रिपोर्ट पेश करनी है। अगर जगह-जगह जनता का दबाव बन सकता है तो राज्य सरकारों को भी इसके बारे में एक पारदर्शी रिपोर्ट पेश करनी होगी वरना वह आंकड़ों का एक ऐसा पुलिंदा अदालत के सामने पेश कर देंगे जो वास्तविकता से मेल नहीं खाते हों। क्या देश की जनपक्षीय ताकतें ऐसा दबाव बनाने के लिए तैयार होंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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