गांव को गांधी जितना बेहतर समझते थे, उतना और कोई नहीं
आजादी की लड़ाई के समय से ही ग्रामीण जीवन के प्रति हमारे यहां दो दृष्टिकोण रहे हैं। कुछ लोग उसका महिमा मंडन करने में लगे रहे हैं, क्योंकि उन्हें गांव की जिंदगी सरल और वहां के लोग निश्छल लगे हैं। साहित्य और पत्रकारिता में यह महिमामंडन आज भी कमोबेश जारी है। दूसरी और वे लोग हैं, जो ग्रामीण जीवन को जहालत और अंधविश्वासों से भरा बतलाते रहे हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर को ही लें। उन्होंने कहा था कि गांव स्थानीयता के गर्त, अज्ञानता, संकुचित मानसिकता और सांप्रदायिकता की मांद के सिवा क्या है?
ग्रामीण जीवन की असलियत की पकड़ जितनी महात्मा गांधी को थी, उतनी शायद ही किसी भारतीय नेता की रही। यह पकड़ उनको 1917 के अपने चंपारण सत्याग्रह के दौरान प्राप्त हुई। वह चंपारण जाने से पहले कोलकाता गए थे, जहां वह एक बड़े कानूनविद् और कांग्रेसी नेता भूपेंद्रनाथ बसु के मेहमान थे। बसु साहब के ठाठ-बाट देखकर वह चकित रह गए थे। बसु साहब की मित्रता इंग्लैंड के समाजवादी चिंतक वेब (सिडनी और बियाट्रिस) दंपति से थी और वह भारत को आजाद करा समाजवाद की दिशा में ले जाना चाहते थे। फिर भी वह जूते और कपड़े पहनने के लिए सेवकों पर निर्भर थे। भूपेंद्रनाथ बसु के प्रति सम्मान होने के बावजूद गांधी जी इस नतीजे पर पहुंचे कि ऐसे लोग देश को आजाद नहीं करा सकते।
फिर वह राजकुमार शुक्ल के साथ चंपारण आए। दिसंबर, 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन से लेकर कानपुर और कोलकाता में शुक्ल जी को जानने-समझने का मौका गांधी जी को मिला। उन्होंने पाया कि अर्द्धशिक्षित और गरीब होने के बावजूद शुक्ल निश्छल और दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। अगर ऐसे लोगों को दिशा दी जाए, तो भारत जरूर आजाद होगा। गांधी जी ने यह भी पाया कि किसानों के पास सब कुछ है, मगर सही दिशा देने वाला नेतृत्व नहीं है। उनके चंपारण पहुंचते ही जो जन उभर आया, उससे उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि अगर किसानों को जहालत, अंधविश्वास और अशिक्षा से मुक्त किया जाए, उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के कार्यक्रम चलाए जाएं तथा स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान प्रदान किए जाएं, तो वे अंधेरी कोठरी से बाहर आकर आजादी की लड़ाई को उसके लक्ष्य तक पहुंचाएंगे। इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने जिले में आश्रमों की स्थापना की। भितिहरवा आश्रम आज भी अवशेष के रूप में है।
उन्होंने एक गांव में प्रवास के दौरान पाया कि एक महिला मैले-कुचैले कपड़ों में है और रोज स्नान नहीं करती। कस्तूरबा के जरिये उन्होंने उससे पूछवाया कि ऐसा क्यों है, तब महिला ने उत्तर दिया कि उसके पास एक ही साड़ी है। वह साफ कपड़े पहनना और रोज नहाना चाहती है, पर यह तभी संभव है, जब उसके पास कम से कम एक जोड़ी कपड़े हों। इसके बाद गांधी जी को एहसास हुआ कि भारत में दो दुनिया है, एक बसु साहब की, दूसरी इस महिला की और इस महिला की दुनिया में ही अधिकतर भारतीय रहते हैं, जिन्हें संगठित कर नई दृष्टि देने पर ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को हटाया जा सकता है।
गांधी जी का यद्यपि ब्रिटिश अफसरों ने प्रत्यक्षत: विरोध किया, फिर भी अपनी गोपनीय रिपोर्टों में उन्होंने उनकी प्रशंसा की। मसलन, बेतिया के एसडीओ डब्ल्यू एच लिविस ने गांधी जी को पूर्व और पश्चिम का अप्रतिम मिश्रण कहा। अगर उन पर सिर्फ पूर्व का असर होता, तो वह साधना में लग जाते। यह पश्चिम का ही असर था कि उन्होंने खुद को समाज और आम जन से जोड़ा। बेतिया राज के मैनेजर जेटी विट्टी ने तिरहुत के कमिश्नर को लिखा, गांधी एक विलक्षण और निडर व्यक्ति हैं। उन्हें शहीद बनाया जा सकता है, मगर दबाया नहीं जा सकता।
गांधी जी के चिंतन और दृष्टिकोण से दूर जाने के परिणाम स्पष्ट दिख रहे हैं। गांवों में किसानों की जगह खेतिहर आ गए हैं, जो बाजार की शक्तियों और संकेतों के आधार पर उत्पादन संबंधी निर्णय लेते हैं। गांवों में जमाने से आ रही पारस्परिकता आज समाप्त प्राय है। अब सरल माल उत्पादन के बदले पूंजीवादी माल उत्पादन आ गया है। खेतिहर अपना उत्पादन बाजार में बेचकर अधिकाधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। उत्पादन लागत कम करने के प्रयास में ट्रैक्टर, ट्रेलर, थ्रेसर, पंपिंग सेट खरीदकर या किराये पर लेकर काम चलाया जा रहा है। बैल, गाय और बैलगाड़ी का अस्तित्व गांवों से समाप्त होता जा रहा है। लोग बड़ी कंपनियों को दूधबेचने के लिए भैंस पाल रहे हैं। कहार, तेली, लुहार, बढ़ई, आराकश, नाई, धोबी आदि पूरी तरह या आंशिक रूप से बेरोजगार हो गए हैं। छोटे और सीमांत खेतिहरों को कांट्रेक्ट फार्मिंग करने वाली कंपनियों ने हड़पना शुरू कर दिया। मौजूदा मंदी से राहत पाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गांवों को अपना बाजार बनाने का प्रयास जोरदार कर दिया है। वाल स्ट्रीट जर्नल में इस विषय को लेकर छपी एक रिपोर्ट उत्तर बिहार के बेनीपुर गांव की है, जो प्रसिद्ध साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता रामवृक्ष बेनीपुरी की जन्मभूमि होने के बावजूद अत्यंत पिछड़ा हुआ है। आज गांधी जी के विपरीत राजनीतिक दल जाति, धर्म और आर्थिक विभेदों को बढ़ावा देकर सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में लगे हैं। गांव में जमीन को लेकर संघर्ष और अपराध बढ़ रहे हैं। इस भयावह स्थिति से निकलने का रास्ता तभी प्राप्त हो सकता है, जब स्थिति का समग्र रूप से विश्लेषण कर समझा जाए। गांवों और नगरों-महानगरों की दुनिया के बीच अलगाव गहराता जा रहा है।
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गांवों और शहरों के बीच बढ़ती दूरी को पाटकर ही मौजूदा विसंगतियों को दूर किया जा सकता है।
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