Thursday, May 5, 2011

कैसे बनें सक्रिय और सहभागी पंचायतें


भारत में पंचायती व्यवस्था का इतिहास 5000 वषों का है। पंचायत शासन का सबसे प्राचीन वर्णन ऋगवेद में है जिसके अनुसार स्थानीय शासन के निर्णय आपसी र्चचा और सहयोग से लिए जाते थे। समय के साथ पंचायती व्यवस्था में कुछ बदलाव आए परंतु इसके मूल में सहभागिता और विकेंद्रीकरण ही रहा। इस व्यवस्था पर अंग्रेजों ने चोट किया। इससे भारत की सदियों की पुरानी अकेंद्रित व सहभागी प्रक्रिया का अंत हो गया। आजादी के उपरांत संविधान निर्माताओं ने गांवों में सहभागी शासन प्रक्रिया कायम करने के लिए प्रदेश की सरकारों को ग्राम पंचायतों के गठन के लिए बाध्य किया। परंतु इस प्रयास का कोई स्पष्ट प्रभाव और प्रमाण नहीं दिखा। फलस्वरूप, 1992 में केंद्र सरकार ने संविधान में संशोधन कर एक नया अध्याय जोड़ा जिसके द्वारा पंचायत राज व्यवस्था संविधान का हिस्सा बन गया। परंतु इस बार भी पंचायती व्यवस्था को मजबूत करने का जिम्मा प्रदेश की सरकारों पर ही छोड़ दिया गया। यदि 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती संस्थाओं के कार्य व शक्तियां अनुसूची 7 में सम्मिलित कर परिभाषित कर दिया जाता तो आज पंचायती शासन व्यवस्था की तस्वीर एक सशक्त, विकेंद्रित व नागरिकों के प्रति जवाबदेह शासन की होती। प्रभावी एवं उत्तरदायी शासन व्यवस्था वही हो सकती है, जहां शासन की सभी इकाइयों को उनकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी व अधिकार क्षेत्रों में बांटा गया हो तथा एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप की गुंजाइश न हो। वित्तीय संसाधनों के बंटवारे के लिए नियम हों। हमारी त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था में सिर्फ केंद्र एवं राज्यों के अधिकार क्षेत्र तय हैं परंतु पंचायतों को इससे परे रखा गया है।
आम सहभागिता नहीं
यही कारण है कि आज शासन प्रक्रिया में आम लोगों की सहभागिता नहीं है, लोकतांत्रिक मूल्यों में लगातार गिरावट का सिलसिला है। 1993 में नए पंचायती राज कानून को लागू होने के बाद से देश के अधिकांश प्रदेशों ने अपने- अपने प्रदेशों में 73 वें संविधान संशोधन के अनुरूप व्यवस्था कर लिया है। फलस्वरूप पिछले 15 वर्षो में तीन बार पंचायतों के चुनाव हो चुके हैं। आज हमारे देश में 24 लाख ग्राम पंचायतें, 6000 ब्लाक समितियां व 500 जिला परिषदें कार्यरत हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत 96 प्रतिशत गांव व उनकी 99 प्रतिशत आबादी को शासन में हिस्सेदारी का मौका देती है। संविधान के अनुसार पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों की स्वशासित सरकार है। किंतु संविधान में पंचायतों की आर्थिक शक्तियां राज्य सरकारों की मर्जी पर छोड़ दी गई हैं। राज्यों में वित्त आयोग का गठन तो होता है किंतु आयोग की सलाह से राज्य सरकारें बाध्य नहीं होतीं। आज त्रिस्तरीय पंचायतें सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की आखिरी कड़ी बनकर रह गई है। पंचायत प्रतिनिधियों को नीति निर्धारण में कहीं भी सम्मिलित नहीं किया गया है।
अधिकारियों की दखल खत्म करें
राज्यों के बजट में पंचायतों के लिए कोई मद नहीं होता है। छोटे से छोटे काम करने के लिए पंचायतों को सरकारी अधिकारियों की अनुमति लेनी पड़ती है जबकि पंचायती व्यवस्था में अंतिम निर्णय लेने की अपार शक्तियां सरकारी अधिकारियों के पास हैं परंतु राज्य सरकारों ने अब सूचना के अधिकार के कानून के अधीन जनकायरे की जवाबदेही सरकारी पदाधिकारियों के बजाय पंचायती प्रतिनिधियों को तय कर दी है। हमारे देश में सिर्फ पंचायती प्रतिनिधि ही ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जिनको प्रशासनिक अधिकारी बर्खास्त कर सकते हैं। सरकारी अधिकारियों को प्रदत्त असीम अधिकार पंचायती संस्थानों की स्वायत्तता पर बहुत बड़ा अंकुश है। आज के परिवेश में सामान्यत: सरकारी अधिकारी निजी हित व स्वार्थ के लिए राजनीतिक आकाओं व सत्तारूढ़ पार्टी के हितों के अनुसार कार्य करते हैं। इस स्थिति में उन पंचायती प्रतिनिधियों की स्थिति बड़ी ही दर्दनाक होती है, जो सत्तारूढ़ पार्टी, स्थानीय सांसद व विधायक के करीबी नहीं होते।
सशक्तिकरण के आवश्यक सुझाव
ऊपर वर्णित तथ्यों के आलोक में पंचायती संस्थाएं और उनके जनप्रतिनिधि पंचायती व्यवस्था के प्रति निराश होते दिख रहे हैं। अत: इस बात की आवश्यकता है कि पंचायती व्यवस्था को सुसंगठित एवं सशक्त बनाने हेतु आवश्यक कानूनी परिवर्तन और संशोधन किया जाए। सुझाव में, अपने नीचे दिए गए बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है :- 1. ग्राम सभा को सक्रिय तथा अतिरिक्त शक्तियां प्रदान करना ग्राम सभा स्थानीय शासन की मूल वैधानिक इकाई है। ग्राम सभा की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार अनिवार्यत: होनी चाहिए। इसकी कानूनी जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की हो। बैठक नियमित नहीं बुलाए जाने पर ग्राम प्रधान को हटाने का प्रावधान भी जोड़ा जा सकता है। ग्राम सभा के प्रस्तावों पर पंचायती संस्थाओं को त्वरित कार्रवाई के लिए बाध्य करना होगा। त्रिस्तरीय पंचायत ग्राम सभा द्वारा निर्देशित, संचालित व नियंत्रित होना चाहिए। ग्राम सभा को कार्य-योजनाओं को बनाने, प्रस्तावित करने, वित्तीय मंजूरी देने संतोषजनक कार्य पूर्णता-प्रमाणपत्र जारी करने और सार्वजनिक कामों के सामाजिक अंकेक्षण का संपूर्ण अधिकार होना चाहिए। ग्राम सभा की निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए अनुशंसा करने का भी अधिकार होना चाहिए।
2. कार्य के सम्बन्ध में केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तर्ज पर पंचायती संस्थाओं और राज्य सरकार के बीच में भी कार्य अधिकार क्षेत्र का विभाजन आवश्यक है। पंचायती संस्थाओं में कार्य अधिकार क्षेत्र में राज्य सरकार को नीति-निर्धारण तक ही सीमित रहना चाहिए। राज्य सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र संविधान की 11वीं अनुसूची में अनुसूची के 29 विषय पंचायती राज संस्थाओं को वैधानिक रूप से सौंप देना चाहिए। इसके अतिरिक्त निधि, कार्मिक व कार्य भी वैधानिक रूप से स्थानांतरित करना आवश्यक होगा। त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्थाओं में तीनों पंचायत संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर स्थानीय सरकार हैं। इसलिए तीनों का दर्जा समानांतर होना चाहिए।
3. पंचायती संस्थाओं की आर्थिक स्वायत्तता पंचायती संस्थाएं विकेंद्रित सत्ता की मूल इकाई है। अत: राज्य के बजट में इनका विशेष प्रावधान आवश्यक है। (क) अबद्ध निधि यूनाइटेडफेड- यह राज्य सरकार द्वारा एकत्र किए गए कुल राजस्व का 50 प्रतिशत हो जिससे स्थानीय सरकार विकास व कल्याण का कार्यक्रम बना सके। (ख) विकास और कल्याण कार्यों स्कीमों में लोन या ग्रांट की कुल राशि राज्य सरकार द्वारा सीधे पंचायती संस्थाओं को दी जाए। (ग) वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार केंद्र सरकार पंचायती संस्थाओं को वित्तीय संसाधन मुहैया करे। (घ) केंद्रीय कार्यक्रमों का पैसा सीधे पंचायतों को मिले। पंचायती संस्थाओं की आर्थिक जवाबदेही के लिए एक अलग संस्था का निर्माण किया जाए। यह संस्था राज्य के मुख्य लेखाकार की तर्ज पर हो सकती है। पंचायती संस्थानों के वित्तीय अंकेक्षण की जिम्मेदारी ‘मुख्य लेखाकार स्थानीय सरकार’ की होगी।
4. पंचायती संस्थाओं के लिए कमर्चारियों की अलग श्रेणी बनाई जानी चाहिए। हर एक स्तर पर कार्यालय की व्यवस्था होनी चाहिए। जिला योजना कमेटी को संविधान के अनुसार अर्थपूर्ण बनाना होगा जिससे वह जिले के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सके। ऐसे कई आवश्यक सुधारों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए पंचायती राज व्यवस्था को और सशक्त किए जाने की आवश्यकता है। गांधी की सपनों की पंचायत व्यवस्था को मूर्त रूप देने में अभी लम्बी दूरी तय करनी है। गांधी जी चाहते थे कि भारत में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना हो। इसलिए उन्होंने कहा था,सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए 20 व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जा सकता। उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा।


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