देश का सर्वांगीण विकास, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों का विकास, एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। आजादी के बाद विकास के पश्चिमी नमूनों को आजमाते हुए बड़ी- बड़ी परियोजनाएं, बड़े शहर, बड़े कल-कारखाने, उच्च राजपथ, रेल, बैंक जैसे कई काम किए गए। इन मॉडलों को अपनाने के प्रति नजरिया यह था कि जिस प्रकार एक ऊंची टंकी से नलों द्वारा घर-घर में पानी पहुंचा दिया जाता है। ठीक वैसे ही विकास की गंगा की धारा राजधानियों या बड़े-बड़े शहरों से गांवों तक पहुंच जाएगी। यह विकास के विकेंद्रीकरण और सम्यकता-समता पर आधारित समाज बनाने की बात थी। इसके लिए गांधीजी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने वाली पंचायती राज पण्राली पर अमल की बात सोची गई। इसमें योजना से लेकर उन पर अमल तक की मुख्तारी स्थानीय लोगों के हाथ में सौंपना था ताकि वे क्रमश: विकास करते हुए गांवों और शहरों के जीवनस्तर, शैली और रोजगार में स्वयं सक्षम हो सकें। यह थी, पंचायती राज पण्राली की भूमिका। परंतु आजादी के बाद देश की ज्यादातर पंचायतों में स्व-राज की असली भूमिका निभाई ही नहीं गई या निभाने नहीं दी गई। कारणों की छानबीन करने पर कई बातें सामने उभरकर आती हैं। इनमें प्रमुख हैं जनसहभागिता का अभाव, जनस्वामित्व भाव का अभाव, योजना-परियोजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, योजना बनाने में स्थानीय लोगों की राय की अहमियत न देना, लेट-लतीफ अफसरशाही, राजनीतिक फायदा उठाने की मंशा और निहित स्वार्थ से प्रेरित प्रयास आदि। सन् 1992 में संसद ने संविधान के 73वें संशोधन द्वारा त्रिस्तरीय पंचायतीराज अधिनियम पास करके एक नई आशा जगाई और ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बंधित 29 कार्य ग्राम पंचायतों को सौंपे गए ताकि वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं बनाकर सामाजिक न्याय का ध्यान रखते हुए आर्थिक विकास के कार्य को आगे बढ़ा सकें। इस अधिनियम में अनुभव के आधार पर पंचायतों में कमजोर वगरे एवं महिलाओं की सहभागिता का विशेष प्रावधान किया गया और इन्हें स्थानीय स्वशासन की सशक्त एवं प्रभावी संस्था बनाने के लिए विशिष्ट व्यवस्थाएं की गई। जैसे; महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण, जिसे अब बहुत से राज्यों में बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है (इसकी शुरुआत का श्रेय बिहार को जाता है), अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, प्रत्येक पांच वर्ष पर अनिवार्य रूप से पंचायत चुनाव, राज्य स्तरीय चुनाव आयोग एवं वित्त आयोग आदि। यह अधिनियम 24 अप्रैल 1993 को लागू हो गया। फिर 74वां संविधान संशोधन आया जिसमें शहरी क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ जिला योजना समिति का भी प्रावधान किया गया, जो सम्पूर्ण जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए एकीकृत विकास योजना का स्वरूप उसी प्रकार तय करेगी जैसे पूरे देश के लिए योजना आयोग करता है। तदुपरांत सन् 1996 में पंचायतों का अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार का अधिनियम बना जिसमें स्थानीय आदिवासी पंचायतों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर विस्तृत अधिकार एवं उपयोग का प्रावधान बनाया गया। इन संशोधनों तथा तमाम प्रावधानों को सुनिश्चित किए जाने के लगभग सोलह वर्षो में जो अनुभव प्राप्त हुए हैं, वे उनकी मूल भावना के मुताबिक नहीं हैं। इसलिए उत्साहजनक तस्वीर पेश नहीं करते हैं। इसका मुख्य कारण गैर जवाबदेही, खुलेपन की कमी और दायित्वों तथा परियोजना के प्रति दूरदर्शिता या समझदारी की कमी के साथ-साथ बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टतंत्र भी है। इसकी बानगी पूर्व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर की एक लाइन के बयान में देखी जा सकती है। बिहार दौरे से लौटकर मणि ने कहा ‘‘पूरे भारत में पंचायती राज है परंतु बिहार में मुखिया राज है।
अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है। बिहार में यह कहावत चलन में है कि ‘उप’ माने ‘चुप’, ‘सदस्य’ माने ‘कुछ ना’ यानी जिस प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कायम करने की भावना पंचायती राज अधिनियम में है, वह मुखिया और सरपंचों के वर्चस्व के कारण एक व्यक्तिवादी व्यवस्था बनकर रह गई है। आज पंचायतें स्वशासन की स्थानीय इकाई के बजाय केंद्रीय और राज्य सरकारों के कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने वाली इकाई के रूप में कार्य कर रही हैं। मनरेगा जैसा कार्यक्रम जो पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ में है जिसमें राज्यों के पंचायती मंत्री भी दखल नहीं दे सकते, मुखिया और सरपंचों के साथ-साथ बीडीओ और जिलाधिकारियों के लिए एक धनवर्षा कार्यक्रम बन गया है। ग्राम पंचायत के मुखिया जिनके पास साइकिल हुआ करती थी, अब वे बोलेरो और मार्शल पर भ्रमण करते हैं लेकिन इसकी असली हकदार आम गरीब जनता को आधी-अधूरी ही उपलब्धि हुई है। थोड़ा फर्क अवश्य पड़ा है लेकिन प्रशासन और प्रधान ही अधिक मलाईदार हुए हैं। अधिकतर पंचायती राज व्यवस्था की यही वास्तविकता है। अगर मुखिया या सरपंचों के उनके कार्यकाल में हुई आय के स्रेतों की पूर्व की आय से मिलान कर लिया जाए तो अंतर आसमानी ही आएगा। क्या यह व्यवस्था ग्रामीण विकास का उचित और आवश्यक माध्यम हो सकती है? इसका सटीक उत्तर ढूंढ़ने के लिए हमें रालेगन सिद्धि चलना पड़ेगा। यह गांधीवादी और जन लोकपाल विधेयक के लिए देश-विदेश में ख्यात हो गए अन्ना हजारे का गांव है। रालेगन सिद्धि गांधी के ग्राम स्वराज के सपने का साकार रूप है। मेरा वहां आना- जाना लगा रहता है। इस कारण उसकी विकास यात्रा का मैं चश्मदीद रहा हूं। नई पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने से पूर्व रालेगन सिद्धि में अन्ना हजारे के नेतृत्व में सर्व महिला पंचायत का गठन किया गया था और गांव के विकास की योजनाएं बनती थीं बल्कि इनके औचित्य-अनौचित्य पर लोकतांत्रिक तरीके से खुलकर बहस होती थीं। अंत में बहुजन की राय को आम राय मानते हुए उनका क्रियान्वयन किया जाता था। परिणामस्वरूप आज इस गांव को वह सब कुछ और समयबद्ध तरीके से हासिल हो गया जो ग्रामीण जनजीवन के लिए जरूरी है। सच्चे अर्थो में यह गांधीजी के सपनों के अनुरूप एक भारतीय गांव है, जहां हर हाथ को काम, सभी को स्वास्थ्य-शिक्षा की सहुलियतों और पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है। इसके साथ-साथ स्वच्छता के प्रति व्यक्तिगत-सामूहिक स्तर पर जागरूकता तथा जवाबदेही दिखाई पड़ती है। इसके अलावा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आचरण करते हुए गांवों के लोगों में परस्पर शांति, सौहार्द और सद्भावना का माहौल है। यहां अन्ना ने छ: लाख से अधिक पौधरोपण के जरिये गांव की आबोहवा को नैसर्गिक स्वच्छता से परिपूर्ण कर दिया है। इस अपार सिद्धि या सफलता का राज, अन्ना हजारे द्वारा तैयार की गई गांधीवादी पृष्ठभूमि है, जिसमें समझाना-बुझाना, सत्य-अहिंसा का मार्ग अपनाना, विचार और कर्म को एकाकार करने के लिए साझे मंच को तैयार करना, नैतिक शुद्धिकरण, नि:स्वार्थ नेतृत्व आदि शामिल है। रालेगन सिद्धि की ग्राम सभा ने सबसे आधारभूत साझी समस्या-पानी की कमी-की पहचान की। इस पर तत्काल काम शुरू हो गया। इसी तरह, प्राथमिकता में दूसरे नम्बर की समस्या पर विचार किया गया। उसके निबटारे के लिए सभी उपायों पर व्यावहारिक तरीके से गौर किया है। इस प्रकार, यहां विकास का सिलसिला बनता गया। अन्ना ने लागत और बचत का सामाजीकरण यानी अन्त्योदय के सिद्धांत का पालन किया-कराया, प्रजातांत्रिक निर्णय प्रक्रिया का रिवाज बनाया, कठोरता से सामाजिक सुधार के लिए लोगों को रजामंद किया, आवश्यकता के अनुरूप सामाजिक-आर्थिक विकास की पहल की, सहकारी प्रबंधन व्यवस्था बनाई, महिलाओं के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया और विभिन्न ग्रामीण संस्थाओं का गठन किया। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कदम है ग्राम सभा में खुली र्चचा, निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही से फैसले का अनुपालन कराने की प्रथा बनाई गई। रालेगन सिद्धि के मॉडल पर इसी तरह के कुछ और आदर्श पंचायतों की तर्ज पर यदि देश की तमाम ग्राम पंचायतों को ग्रामीण विकास का वाहक बनना है तो सर्वप्रथम ग्राम सभाओं के तौर-तरीकों को लोकतांत्रिक बनाना होगा। परिणामकारी उदाहरणों के प्रति उत्साह दिखाना होगा। ग्राम सभा की बैठकों को सही ढंग से आयोजित कर नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली योजनाएं बनानी पड़ेंगी। नौकरशाहों के इशारे पर नहीं बल्कि गांवों की तात्कालिक-दीर्घकालिक जरूरतों के मुताबिक फैसले लेने के लिए लोकतांत्रिक पारदर्शिता के साथ साहस दिखाना होगा। पंचायतों को अपने में पूर्ण और समर्थ होना पड़ेगा। यह बिल्कुल आसान है अगर पंचायतें उन मूल लोकतांत्रिक भावनाओं को पकड़े हुए चले, तो उनमें साहस खुद ब खुद आ जाएगा। इसके साथ, जिला स्तर पर भी जिला योजना समिति का केवल गठन ही काफी नहीं बल्कि उसमें ऐसे विशेषज्ञों के दल का प्रबंध करना पड़ेगा जो इस विषय और कार्य को ठीक से समझते हों। साथ ही चुने गए प्रतिनिधियों को सही अर्थों में कार्यक्रम, कार्यकर्ता और साधन उपलब्ध कराए जाएं अन्यथा वे ग्राम विकास अधिकारी, विकास खण्ड अधिकारी एवं जिलाधिकारी के सामने हाथ जोड़कर बंदरबाट में उलझे रहेंगे और वही करते रहेंगे जिसकी आशंका डा. अम्बेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में व्यक्त की थी। इसके अतिरिक्त चुने गए प्रतिनिधियों की वापसी का अधिकार मतदाता के पास रहे जिसके बारे में लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने जीवन काल में आवाज उठाते रहे और आज अन्ना हजारे भी इसी बात को दोहरा रहे हैं तभी ग्राम पंचायतें ग्रामीण विकास का आधार एवं वाहक बन पाएंगी अन्यथा यह भ्रम ही बना रहेगा.
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