Thursday, May 5, 2011

ग्राम कचहरी और पंचायत की बारहखरी


क्या 73वें संशोधन में पंचायत के लिए दिए जाने वाले कार्य (फंक्शन), निधि (फंड), और कर्मी (फंक्शनरीज) की व्यवस्था इस पूरे ढांचे को मुकम्मल बनाने के लिए काफी हैं? क्या पंचायत स्तर पर अलग सेवा संवर्ग की स्थापना की मांग ही इसका इलाज है? क्या गांव की योजना गांव में बनाने का वादा पूरा हो जाएगा, ऐसे अनेक अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनके जवाब दिए बिना हम इस मुद्दे पर किसी ईमानदार पहल को संभव होता नहीं देख सकते।
जम्मू-कश्मीर और बिहार सहित देश के कई हिस्सों में पंचायत चुनाव का दौर पिछले कुछ दिनों से जारी है। लोकतांत्रिक राजनीति और सत्ता के केंद्रित ढांचे में स्थानीय स्तर के इन चुनावों में स्थानीय को छोड़ मीडिया और बाकी लोगों की दिलचस्पी अगर न के बराबर है तो यह दोष उस नजरिए का हो सकता है, जो संगठित और केंद्रित सत्ता को ही ताकतवर और कारगर मानते हैं। बहरहाल, लोकतंत्र की बहस और उसकी लंबी यात्रा के लिए यह कम बड़ी उपलब्धि भी नहीं कि वह मैगना-कार्टा से चलकर अब्राहम लिंकन की परिभाषिक व्याख्या के साथ दुनिया के ज्यादातर हिस्से पर अपनाया जा चुका है। विश्व के शोधकर्मियों को भारत का प्रजातंत्र बरबस आकर्षित करता है क्योंकि यहां प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र के बजाय प्रतिभागिता का लोकतंत्र है। प्रतिनिधित्व का लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए तो है पर जनता द्वारा नहीं। इसमें जनप्रतिनिधि शासन करते हैं। पंचायत में जनता द्वारा शासन चलाने का प्रावधान है। प्रतिभागिता या सहभागिता के लोकतंत्र को लेकर बहस आज भारत सहित पूरी दुनिया में तेज हुई है। 1998 में क्रुक और बैन्योर द्वारा किए गए विश्व बैंक के एक आकलन के मुताबिक, 75 में से 12 विकासशील देश जिनकी आबादी 5 मिलियन से ज्यादा है, वहां सत्ता के प्रतिनिधायन/ हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। परिवर्तन के कई ऐसे कारण हैं, जिनको जानने-समझने की दरकार है। एक तो विचार के परिवर्तन की बात है, जो सत्ता में उस भागीदार को महत्त्व देता है, जिसकी भागीदारी अभी सबसे कम है। दूसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि हम स्थानीय शासन से उम्मीद कर सकते हैं कि वह समाज में वंचितों और दलितों को विकास की मुख्यधारा में लाकर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य को संभव बनाए क्योंकि पिरामिडीय शासन संरचना में एक का बोझ सौ पर आने का खतरा है। गांधी की भाषा में यह जल तरंग की तरह एक से शुरू होकर विश्व मानवता तक पहुंचे। पर विडम्बना है कि प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र को यदि मतदाता नहीं मिलते तो सहभागिता के लोकतंत्र को कायदे के उम्मीदवार नसीब नहीं हैं।
गांधी का ग्राम स्वराज
गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी। पर देश की सफलतम पंचायतें भी जो काम आज कर रही हैं, क्या देश की पंचायत की परंपरा वही है? क्या गांधी ने ऐसी ही पंचायत राज की कल्पना और वकालत की थी ? बहुत कम ही लोग जानते हैं कि 1832 में लार्ड मेट्काफ की ग्राम गणराज्य (विलेज रिपब्लिक) वाली रिपोर्ट से घबड़ाए ब्रितानी हुकूमत ने सस्ते में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पंचायतों को पुनर्जीवित किया था। गांवों को संप्रभु बनाने का उसका मकसद नहीं था।1880 के लार्ड रिपन और उनके अनुयायियों की पंचायत की सोच ‘पेड़ के नीचे एक चबूतरे पर बैठी एक जमात’ से ज्यादा नहीं थी। पर गांधी की पंचायत का सोच केंद्र या राज्य सरकार की एक कड़ी के रूप में गांव स्तर पर एक कम खर्चीला प्रशासनिक इकाई खड़ा करने से कुछ ज्यादा था। पंचायतों के लिए प्रस्तावित पंचायत सरकार भवन के बजाय शायद गांधी की सोच ‘पंचायत सामाजिक सरोकार’ की थी न कि पंचायत सरकार की तभी तो उन्होंने कहा था, ‘अगर हिंदुस्तान के हर गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ तो मैं अपनी इस तस्वीर की सचाई साबित कर सकूंगा जिसमें सबसे पहले और सबसे आखिरी दोनों बराबर होगा या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा ना आखिरी।’
पहली पंचायती राज नागौर में
देश में 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में जब प्रथम पंचायत का जन्म हुआ था। तभी इसके उद्घाटनकर्ता पंडित नेहरूने पंचायत की सफलता के बारे में संशय जताया था। जयप्रकाश नारायण ने तो साफ शब्दों में कहा था, ‘सत्ता का हस्तांतरण वास्तविक होना चाहिए, दिखावटी नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि बाहर से पंचायती राज का ढांचा तैयार कर दिया जाए और तत्व उसमें कुछ न हों। यह आत्मा के बिना शरीर जैसा होगा।’ वैसे पिछले कुछ दशकों में पंचायत को लेकर जो कुछ प्रयोग देश में हुए हैं, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। 1975 में देश की मुख्यधारा से जुड़ने के बाद सिक्किम ने 33 के बजाय महिलाओं को न सिर्फ 40 फीसद आरक्षण दिया बल्कि ग्रामसभा में उनकी 25 फीसद उपस्थिति भी सुनिश्चित की। जानकारों के मुताबिक वहां एसडीएफ की मजबूती का यह एक बड़ा कारण है। पं. बंगाल में इसकी मजबूती ने दलीय प्रतिद्वंद्विता का रूप ले लिया, जिसके नासूरी नतीजे कई स्तरों पर दिख रहे हैं। बिहार ने महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया।
कहीं छूट गई ग्राम कचहरी
पर गांधी के असहयोग आंदोलन को कोर्ट के बहिष्कार का हथियार भी पूर्वाचल की जिस ‘पंचैती’ से मिला; आजादी के बाद वह ग्राम कचहरी कहीं छूट गई। पंचायतों को सरकार के तीसरे स्तंभ के रूप में तो देखा गया पर उसमें ‘पंचैती’ वाली भूमिका नजरअंदाज हो गई। बिहार में ग्राम कचहरी 1978 तक जीवित रही। बिहार पंचायत राज अधिनियम 1993 में भी इसका प्रावधान तो था पर 2001 में हुए चुनाव में ग्राम कचहरी के लिए चुनाव हो नहीं पाया। 2006 के बिहार पंचायती राज अधिनियम में न्याय मित्र और न्याय सचिव की परिकल्पना से इसे और भी परिष्कृत करने का प्रयास किया गया। यहां बताना जरूरीहै कि गांव की पंचैती सिर्फ आपसी वैमनस्य समाप्त नहीं करती है बल्कि देश की आर्थिक समृद्धि के लिए स्वस्थ माहौल और स्वस्थ मानसिक कार्यदिवस भी उपलब्ध कराती है। आज भी हमारे रोजर्मे की जिंदगी में ऐसी घटना होती है, जब कोई तीसरा व्यक्ति बिना किसी निहित स्वार्थ के बीच-बचाव कर देता है और दोनों पक्ष इसे सहजता से मान भी लेते हैं। कल्पना करें कि रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-मोटे हर कलह यदि कोर्ट-कचहरी तक जाने लगे, तो हमारी न्याय व्यवस्था की क्या स्थिति होगी? सिर्फ बिहार के हाईकोर्ट में लगभग 3. 5लाख और अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग 2 करोड़ मामले लंबित हैं। यदि ग्राम कचहरी ठीक से काम करने लगे और औसतन एक मामला प्रतिमाह की दर से उसे कोर्ट तक पहुंचने से रोक पाए तो लगभग एक लाख मामले के बोझ से राज्य की न्यायपालिका को मुक्त किया जा सकता है। कोर्ट में लगने वाले अनुत्पादक कार्य दिवस को यदि मूल्याधारित कर देखें तो यह राशि कहीं न कहीं सकारात्मक रूप में समाज और राष्ट्र निर्माण में काम आएगी। शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर केंद्र सरकार ने भी ग्राम न्यायालय की परिकल्पना पर काम करना शुरू कर दिया है। पंचायत की मजबूती के लिए जरूरी है कि उसके दर्शन और सोच को लेकर स्पष्टता हो। यदि इसे सस्ती प्रशासनिक इकाई के रूप में ही देखना है तो कम से कम गांधी और जयप्रकाश के नाम को इससे अलग कर दिया जाए और इसे प्राचीन भारत की गौरव की चासनी में लपेटकर परोसने से बाज आया जाए। आज भी विश्व के कई विश्वविद्यालय में शोधकर्मी भारत के इस अद्भुत प्रशासनिक इकाई को समझना चाहते हैं, जिसे गणराज्य कहा जाता था। क्या 73वें संशोधन में पंचायत के लिए दिए जाने वाले कार्य (फंक्शन), निधि (फंड), और कर्मी (फंक्शनरीज) की व्यवस्था इस पूरे ढांचे को मुकम्मल बनाने के लिए काफी हैं? क्या पंचायत स्तर पर अलग सेवा संवर्ग की स्थापना की मांग ही इसका इलाज है? क्या गांव की योजना गांव में बनाने का वादा पूरा हो जाएगा, ऐसे अनेक अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनके जवाब दिए बिना हम इस मुद्दे पर किसी ईमानदार पहल को संभव होता नहीं देख सकते। अगर हम और हमारी सरकार के लिए यह सब दूर की कौड़ी ही है तो क्यों न पंचायत को सरकार की तीसरी कड़ी मात्र मानकर उसे देश, परंपरा और अतीत के बोझ से मुक्ति दे दी जाए।

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