पंचायतों को अधिकार देने की बात तो बहुत समय से की जा रही है अगर ऐसा नहीं हो रहा तो मुश्किल कहां आ रही है? आपके सवाल के जवाब में मेरा सवाल है कि अगर राज्य अधिकार नहीं छोड़ना चाहते तो केंद्र सरकार क्या कर सकती है? पंचायतराज व्यवस्था राज्यों से सम्बंधित विषय है। इसलिए केंद्र सरकार केवल उनसे इसके अनुपालन के लिए आग्रह ही कर सकती है। पर ऐसा भी नहीं है कि सभी राज्य पंचायतों को अधिकार देने में आनाकानी करते हैं। हालांकि पंचायत संस्था के प्रति उपेक्षा का भाव ज्यादातर हिंदी भाषी राज्यों में ही ज्यादा है। राजस्थान में स्थितियां बदल रही हैं। वहां पंचायतों को अधिकार देने के लिए सरकार ने बाकायदा आदेश निकाला है। हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश भी पंचायतों को अधिकार देने में दरियादिली दिखाएं। महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक से भी दूसरे राज्य सीख सकते हैं कि पंचायतों को अधिकार देने से राज्य सरकारों को कोई नुकसान नहीं हुआ बल्कि विकास का बोझ ही उसके कंधे से कुछ कम हुआ है। तो इस तथ्य की ओर हिंदी भाषी राज्यों का ध्यान जाना चाहिए। पंचायतों को अधिकार तो बहुत से देने हैं लेकिन क्या कम अधिकार देने से काम नहीं चल सकता? हां चल सकता है। यही रास्ता केंद्र सरकार ने राज्यों को सुझाया है और कहा है कि फिलहाल पांच अधिकार देकर राज्य इसकी शुरूआत करें। इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सामाजिक न्याय और महिला विकास जैसे विभाग पंचायतों के हवाले करने की बात की गई है। इन विभागों को देने का मतलब यह होगा कि इन विभागों को अमला और धन सब कुछ पंचायतों के पास होगा। स्कूल में शिक्षक और अस्पताल में नर्स व डाक्टर पंचायत के अधीन ही काम करेंगे। अगर शिक्षक स्कूल में और डाक्टर अस्पताल में नियमित नहीं आएंगे तो उनके खिलाफ पंचायत को कार्रवाई का भी पूरा अधिकार होगा। इस व्यवस्था से राज्य सरकार का काम हल्का होगा वहीं पंचायतों को भी कालबद्ध तरीके से अधिकार सम्पन्न बनाने में मदद मिलेगी। वे प्रशासनिक अनुभवों से लाभ उठाएंगे। राज्यों के बजाय गांव का धन सीधे पंचायतों को भेजने के मसले पर काफी समय से बहस चल रही है, उसके विषय में सरकार क्या सोचती है? ऐसी बात होती जरूर रही है लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं होगा। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में राज्यों की जो स्थिति है, उसके मुताबिक केंद्र को राज्यों के जरिए ही धन नीचे तक भेजना चाहिए। केंद्र सरकार फिलहाल राज्यों की इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं करना करना चाहती। देखा गया है कि गांव के विकास का धन राज्य सरकारें दूसरे कामों में लगा देती हैं ऐसी स्थिति में क्या सीधे धन भेजना उचित नहीं रहेगा? पहले इस तरह की बहुत शिकायतें रहती थीं। यह स्थिति इस वजह से भी थी कि राज्यों की माली हालत बहुत खराब रहा करती थी। अब राज्य कम से कम गांव विकास के धन को दूसरे काम में तो नहीं ही लगाते हैं, हां, यह जरूर हो जाता है कि गांव के विकास का धन कई बार नीचे तक देरी से अवश्य पहुंचता है। इसके बहुत से कारण हैं लेकिन इन्हें भी दुरुस्त किया जा रहा है। सीधे धन नहीं लेकिन इसकी तो सरकार भी बात कर रही है कि केंद्रीय योजनाओं में ऊपर से ही पंचायतों की भागीदारी तय कर दी जाए? हां, 12 वीं योजना में पंचायतों की भूमिका बढ़ाने की बात की जा रही है। इसी क्रम में सर्व शिक्षा अभियान और ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रमों का बजट देते वक्त गाइड लाइन में ही पंचायतों के जरिए ही इन कार्यक्रमों को चलाना सुनिश्चित करने जैसी बात सुझाई गई है। पूर्वोत्तर के लिए क्या किया जा रहा है जो पंचायतीराज के वजाय अपनी ग्राम विकास परिषद को ही महत्त्व देते हैं? मिजोरम पंचायती राज को अपनाने के लिए तैयार हो गया है। मेघालय,नगालैंड को समझाने के प्रयास जारी हैं। (पंचायती राज मंत्रालय के सचिव एएनपी सिन्हा से अजय तिवारी की बातचीत)
Thursday, May 5, 2011
फिलहाल शिक्षा और स्वास्थ्य भी पंचायतों को मिल जाए तो काफी है
पंचायतों को अधिकार देने की बात तो बहुत समय से की जा रही है अगर ऐसा नहीं हो रहा तो मुश्किल कहां आ रही है? आपके सवाल के जवाब में मेरा सवाल है कि अगर राज्य अधिकार नहीं छोड़ना चाहते तो केंद्र सरकार क्या कर सकती है? पंचायतराज व्यवस्था राज्यों से सम्बंधित विषय है। इसलिए केंद्र सरकार केवल उनसे इसके अनुपालन के लिए आग्रह ही कर सकती है। पर ऐसा भी नहीं है कि सभी राज्य पंचायतों को अधिकार देने में आनाकानी करते हैं। हालांकि पंचायत संस्था के प्रति उपेक्षा का भाव ज्यादातर हिंदी भाषी राज्यों में ही ज्यादा है। राजस्थान में स्थितियां बदल रही हैं। वहां पंचायतों को अधिकार देने के लिए सरकार ने बाकायदा आदेश निकाला है। हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश भी पंचायतों को अधिकार देने में दरियादिली दिखाएं। महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक से भी दूसरे राज्य सीख सकते हैं कि पंचायतों को अधिकार देने से राज्य सरकारों को कोई नुकसान नहीं हुआ बल्कि विकास का बोझ ही उसके कंधे से कुछ कम हुआ है। तो इस तथ्य की ओर हिंदी भाषी राज्यों का ध्यान जाना चाहिए। पंचायतों को अधिकार तो बहुत से देने हैं लेकिन क्या कम अधिकार देने से काम नहीं चल सकता? हां चल सकता है। यही रास्ता केंद्र सरकार ने राज्यों को सुझाया है और कहा है कि फिलहाल पांच अधिकार देकर राज्य इसकी शुरूआत करें। इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सामाजिक न्याय और महिला विकास जैसे विभाग पंचायतों के हवाले करने की बात की गई है। इन विभागों को देने का मतलब यह होगा कि इन विभागों को अमला और धन सब कुछ पंचायतों के पास होगा। स्कूल में शिक्षक और अस्पताल में नर्स व डाक्टर पंचायत के अधीन ही काम करेंगे। अगर शिक्षक स्कूल में और डाक्टर अस्पताल में नियमित नहीं आएंगे तो उनके खिलाफ पंचायत को कार्रवाई का भी पूरा अधिकार होगा। इस व्यवस्था से राज्य सरकार का काम हल्का होगा वहीं पंचायतों को भी कालबद्ध तरीके से अधिकार सम्पन्न बनाने में मदद मिलेगी। वे प्रशासनिक अनुभवों से लाभ उठाएंगे। राज्यों के बजाय गांव का धन सीधे पंचायतों को भेजने के मसले पर काफी समय से बहस चल रही है, उसके विषय में सरकार क्या सोचती है? ऐसी बात होती जरूर रही है लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं होगा। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में राज्यों की जो स्थिति है, उसके मुताबिक केंद्र को राज्यों के जरिए ही धन नीचे तक भेजना चाहिए। केंद्र सरकार फिलहाल राज्यों की इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं करना करना चाहती। देखा गया है कि गांव के विकास का धन राज्य सरकारें दूसरे कामों में लगा देती हैं ऐसी स्थिति में क्या सीधे धन भेजना उचित नहीं रहेगा? पहले इस तरह की बहुत शिकायतें रहती थीं। यह स्थिति इस वजह से भी थी कि राज्यों की माली हालत बहुत खराब रहा करती थी। अब राज्य कम से कम गांव विकास के धन को दूसरे काम में तो नहीं ही लगाते हैं, हां, यह जरूर हो जाता है कि गांव के विकास का धन कई बार नीचे तक देरी से अवश्य पहुंचता है। इसके बहुत से कारण हैं लेकिन इन्हें भी दुरुस्त किया जा रहा है। सीधे धन नहीं लेकिन इसकी तो सरकार भी बात कर रही है कि केंद्रीय योजनाओं में ऊपर से ही पंचायतों की भागीदारी तय कर दी जाए? हां, 12 वीं योजना में पंचायतों की भूमिका बढ़ाने की बात की जा रही है। इसी क्रम में सर्व शिक्षा अभियान और ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रमों का बजट देते वक्त गाइड लाइन में ही पंचायतों के जरिए ही इन कार्यक्रमों को चलाना सुनिश्चित करने जैसी बात सुझाई गई है। पूर्वोत्तर के लिए क्या किया जा रहा है जो पंचायतीराज के वजाय अपनी ग्राम विकास परिषद को ही महत्त्व देते हैं? मिजोरम पंचायती राज को अपनाने के लिए तैयार हो गया है। मेघालय,नगालैंड को समझाने के प्रयास जारी हैं। (पंचायती राज मंत्रालय के सचिव एएनपी सिन्हा से अजय तिवारी की बातचीत)
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