पंचायती राज भारत के युवा वर्ग की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन जाए इससे श्रेष्ठतम स्थिति इस देश के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। पर ऐसा होने के हालात कम से कम मौजूदा स्थिति में तो दिखा’ नहीं देते। अपनी रोजी-रोटी तथा सामान्य सुख की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भी युवा वर्ग पलायन करके शहरों की ओर भागता है और धीरे-धीरे गांव से वह दूर होता चला जाता है। अगर कोई युवा ‘नॉस्टेल्जिया’ में गांव लौटने की कोशिश भी करता है, तो उसे अंतत: निराशा हाथ लगती है। ऐसे न जाने कितनी संख्या में युवा गांव लौटे लेकिन उन्हें फिर शहरों की ओर रुख करना पड़ा। पंचायती राज की सफलता का ढिंढोरा पीटने वाली वर्तमान केंद्र व राज्य सरकारें तथा इनके सुर में ताल मिलाने वाले पाखंडी एनजीओ (गैर सरकारी संस्थाएं) कभी दारुण सच स्वीकार नहीं कर सकते। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि अगर पंचायती राज इतना ही सफल है तो युवा गांवों में क्यों नहीं टिक पाता? 1993 में पंचायती राज को संविधान का भाग बनाए जाने के बाद गांवों से शहरों की ओर पलायन, शहरों की बढ़ती आबादी व गांवों की घटती आबादी की गणना करें तो तस्वीर आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी।
गांव बने मजबूरी के पर्याय
वास्तव में प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर मैं प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूं कि पूरे देश में कोई भी एक युवक सहज रूप में गांव में अपना जीवन बिताना नहीं चाहता। गांव में वही रहता है जिसकी कोई मजबूरी हो। पंचायतीराज कानून लागू होने के 18 वर्षो बाद भी गांवों का मजबूरी का पर्याय बना रहना इसकी विफलता का प्रमाण नहीं तो और क्या है? हमारे देश में 15 से 35 वर्ष की आयु की आबादी करीब 65 प्रतिशत है। जाहिर है, पंचायती राज इतनी बड़ी आबादी की चाहतों को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करने वाला ही होना चाहिए। यह तभी सम्भव होता जब आजादी के बाद भारत की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए यहां की राजनीतिक, आर्थिक संरचना का पुनर्निर्माण किया जाता। हमारे नीतिनि र्माताओं ने ग्राम पंचायत पण्राली को समूची राजनीतिक पण्राली के अंग के रूप में स्वीकार किया। यह वैसे ही है जैसे अट्टालिका के अंदर एक झोपड़ी बनाकर उसे अपने आत्मसंयम एवं आदर्श का नमूना बताना। ग्राम पंचायत पूरी व्यवस्था है। गांधी जी ने भारत के लिए जिस ग्राम स्वराज का लक्ष्य निर्धारित किया, संसदीय लोकतंत्र व्यवहार में उसका विरोधी है। इसीलिए उन्होंने संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हुए इसे त्याज्य घोषित किया था। हां, परतंत्रता से स्वतंत्रता के संक्रमण के दौर तक के लिए इस संसदीय व्यवस्था के प्रति उनकी सहमति हो सकती थी। पंचायत व्यवस्था में शक्ति नीचे से ऊपर जानी थी, न कि ऊपर से नीचे।
शिक्षा से ही कटा मूलाधार
गांव ही व्यवस्था का केंद्र एवं स्रेत हो सकता है, गांधी सहित ज्यादातर मनीषी इस बात पर एकमत थे। भारत (केवल वर्तमान भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि स्वतंत्रतापूर्व) का मूलाधार ही गांव है। जो राजनीतिक और आर्थिक पण्राली हमने अंगीकार की है उसमें स्वभाविक रूप से गांवों के प्रति विकर्षण एवं शहरों की ओर आकर्षण, गांवों के क्षरण एवं शहरों के उन्नयन.. का दानवी चरित्र हावी रहा। आजादी के दो-ढाई दशकों तक तो फिर भी पुराने शिक्षकों एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि के नेताओं के कारण शिक्षा में गांव, खेती, ग्रामीण संसाधनों से जुड़ी हस्तकलाएं, कताई, बुनाई, सिंचाई, पशुपालन आदि विद्यमान थे, ग्रामीण पृष्ठभूमि के परम्परागत खेलों तक को वरीयता मिलती थी, लेकिन 1980 का दशक आते-आते यह तेजी से ओझल होने लगा और 1990 के दशक तक पाठ्यक्रमों और अन्य गतिविधियों से ये पहलू समाप्त होते चले गए।
युवा आकांक्षा को जानने की जरूरत
हम जिस युवा आकांक्षा की बात करते हैं वह है क्या? पिछले दस सालों की युवा चाहत सम्बंधी सव्रेक्षण उठा लीजिए, शहरों में एक अदद ठीक नौकरी, अच्छा घर, भोग के साधन..यही तो उनका आदर्श है। यानी अधिकतर युवाओें की चाहतों और गांवों के संदर्भ में चुम्बक के समान ध्रुव की स्थिति है। अगर गांवों की मूल कल्पना के अनुरूप हमारी राजनीतिक, आर्थिक और इसको पोषित करने वाली शिक्षा पण्राली विकसित की जाती तो युवाओं के संस्कार उसी अनुरूप विकसित होते और उनकी आकांक्षाएं भी गांव केंद्रित हो सकती थीं। गांधी जी ने 7 नवम्बर 1929 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा ‘‘हम एक ऊंची ग्राम सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे देश की विशालता, आबादी की विशालता और हमारी भूमि की स्थिति तथा आब ओ-हवा ने, मेरी राय में, मानो यह तय कर दिया है कि उसकी सभ्यता ग्राम सभ्यता ही होगी। उसके दोष तो मशहूर हैं, लेकिन उनमें कोई ऐसा नहीं है जिसका इलाज न हो सकता हो। इस सभ्यता को मिटा कर उसकी जगह दूसरी सभ्यता को जमाना मुझे तो अशक्य मालूम होता है। ...यह मानकर कि हम लोगों को मौजूदा ग्राम सभ्यता ही कायम रखना है और उसके माने हुए दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना है, मैं उन दोषों के इलाज सुझा सकता हूं। लेकिन इन इलाजों का उपयोग तभी हो सकता है जबकि देश का युवक वर्ग ग्राम जीवन को अपना ले। और अगर वे ऐसा करना चाहते हों, तो उन्हें अपने जीवन का तौर-तरीका बदलना चाहिए और अपनी छुट्टियों का हर एक दिन अपने कॉलेज या हाईस्कूल के आसपास के गांवों में बिताना चाहिए, और जो लोग अपनी शिक्षा पूरी कर चुके हों या जो शिक्षा ले ही न रहे हों, उन्हें गांवों में बसने का इरादा कर लेना चाहिए।’
निर्माण में मुख्य भूमिका युवाओं
की गांधी जी की बातों को गहराई से देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि वे ब्रिटिशकालीन शिक्षा व्यवस्था में युवकों के गांवों से बिल्कुल बिछुड़ जाने का तत्व देख चुके थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षित युवाओें के लिए गांवों में बसने का आदर्श दिया। विनोबा भावे ने तो वर्षो पहले गांवों को ‘गोबर’ की संज्ञा दे दी थी। जयप्रकाश नारायण ने भी गांवों के पतन को महसूस किया था। लेकिन सबका मानना था कि आपसी सहकार और प्रेम के तत्व गांवों में अब भी मौजूद हैं जिनको केंद्र बनाकर ही सच्चे भारत का पुनर्निर्माण किया जा सकता है। निर्माण में मुख्य भूमिका तो युवाओं की ही हो सकती है।
पर छूमंतर हुई पंचायती राज की परिकल्पना
लेकिन पंचायतराज उस कल्पना की ग्राम व्यवस्था नहीं है। यह ऐसी राज व्यवस्था का अंग है जो अधिक से अधिक धन संग्रह, उपभोग सामग्रियों की संग्रह क्षमता.. आदि का आदर्श समाज के मनोविज्ञान में स्थापित कर चुका है। हमारे नीति-निर्माता जिस युवक वर्ग का महिमामंडन करते हैं वे कौन हैं? अगर एक सिनेमा का कलाकार या खिलाड़ी युवाओं का आदर्श होगा तो फिर कोई युवा किसान बनकर कठोर-परिश्रमी जीवन जीने की प्रेरणा कहां से पा सकता है। इसलिए सरकार या आम समाज किसी भी सूरत में वर्तमान व्यवस्था (जिसे व्ययवस्था कहना ही ठीक नहीं) में गांवों के माध्यम से खासकर पढ़े-लिखे युवाओं की चाहतों को पूरा नहीं कर सकता। हां, इसके नाम पर अनेक कार्यक्रम चलाकर सरकारें पाखंड अवश्य कर रहीं हैं।
विकेंद्रीकरण से मिली ताकत का हस्र
विकेंद्रीकरण के नाम पर पंचायतों को जितनी ताकत मिली उसका हस्र वही हुआ जैसे उसके ऊपर के सत्ता केंद्रों का हुआ है। जिस तरह संसद एवं राज्य विधायिकाएं सत्ता, शक्ति, संसाधन के स्रेत बने उसी तरह पंचायती राज के पद भी। जो लोग प्ांचायती राज को जनाकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करने वाली वास्तविक जन इकाई मानते हुए महिमामंडन करते नहीं थकते, उन्हें करीब डेढ़ महीने तक चलने वाले बिहार पंचायत चुनाव की तस्वीरें अवश्य देखनी चाहिए थीं। यकीन मानिए, पंचायत चुनाव की तस्वीर देखकर ऐसे लोग अपना सिर पकड़कर बैठ जाएंगे।
धन मारने की शुरू हो गई होड़
लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में बाहुबल का प्रभाव अवश्य कम हुआ है, चुनाव आयोग की अभूतपूर्व सख्ती से धनबल से मतदाताओं को प्रभावित करने की प्रत्यक्ष कोशिशें भी कम हुई हैं, पर पंचायतीराज चुनाव इन सारी विकृतियों के प्रचंड अंगीकरण का साक्षात् अवतार बना हुआ है। धनबल और बाहुबल का वर्चस्व कोई भी देख सकता है। कुछ अपवाद अवश्य हैं, पर सच यही है कि पंचायत में एक मुखिया का चुनाव जीतने के लिए कई-कई लाख खर्च हो रहे हैं। प्रखंड प्रमुख के लिए तो बाजाब्ता बोलियां लगतीं हैं। डंडे, तलवार और गोलियां चलती हैं। पंचायतीराज की संस्थाओं के हाथों धन आ गए हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा इस बात की है कि कौन उसमें से कितना हिस्सा मार सकता है। ग्राम केंद्रित व्यवस्था का अर्थ, स्थानीय संसाधन और आवश्यकता के आधार पर परस्पर सहकार से विकसित स्वावलम्बी आत्मसंयमी समाज, यह जितना बुजुगरे के लिए है उतना ही युवाओं के लिए भी। वर्तमान पंचायतीराज की तो कल्पना में भी यह आदर्श नहीं है। वर्तमान पंचायती व्यवस्था से ऐसी उम्मीद करना टंकी में एसिड भरकर नीचे नल से शुद्ध पानी लेने की कल्पना है। यह व्यवस्था तो ऐसे प्रयोग तक को खा जाती है। जयप्रकाश नारायण ने बिहार के मुसहरी में सवरेदयी सहयोगियों के साथ ग्रामसभा का प्रयोग किया जिससे हथियार लेकर विद्रोह करने वाले युवा अहिंसा के रास्ते आए, लेकिन वर्तमान पंचायती राज उसे लील गया। वस्तुत: इसके लिए तो युवाओं कस्था को ग्राम केंद्रित बनाना होगा।
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