यमुना एक्सप्रेस का विवाद हो या उड़ीसा में पॉस्को प्रोजेक्ट का या महाराष्ट्र में जैतापुर प्रोजेक्ट का, इन सब मामलों में सामान्य बात यह है कि परियोजनाओं के आरंभिक दौर में गांववासियों से व्यापक विमर्श नहीं किया गया। पश्चिम बंगाल में सिंगुर और नंदीग्राम में भड़की हिंसा की एक बड़ी वजह यही रही। देश में इस तरह के अनेक टकरावों की स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब कहा जा रहा है कि संतोषजनक भूमि अधिग्रहण कानून शीघ्र बनना चाहिए। पर जो पहले से अच्छे कानून बने पड़े हैं,उनके उचित क्रियान्वयन के बारे में क्यों नहीं सोचा जा रहा है? यदि पंचायत राज के कानूनों को ही सही भावना से लागू किया जाए तो ऐसे कई विवाद समय पर सुलझाने में मदद मिल सकती है। वर्ष 1993 में संविधान के 73 वें संशोधन ने देश में पंचायत राज व ग्रामीण विकेन्द्रीकरण को सशक्त किया पर इसके कई प्रावधानों को आज तक सही भावना से नहीं अपनाया गया है। विशेषकर ग्रामसभाओं को सशक्त नहीं किया गया। इस बारे में और भी बेहतर कानून 1996 में अनुसूचित जाति, जन-जातीय क्षेत्रों के लिए बनाया गया जिसमें ग्राम सभा को और मजबूती दी गई। ग्राम सभा को ऐसे कानूनी अधिकार देश भर में मिलने चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता है,मौजूदा कानून भी ग्राम सभा की असरदार भूमिका के लिए काफी हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि ग्राम सभा की मीटिंग की प्राय: खानापूर्ति ही की जाती है। उसकी जो वास्तविक भूमिका है कि गांव के सब महत्वपूर्ण मुद्दों की बड़ी व्यापक र्चचा हो, वह भूमिका पूरी नहीं हो पा रही है। होना तो यह चाहिए कि जहां भी भूमि अधिग्रहण जैसा कोई मामला हो, वहां यह प्रस्ताव विस्तार से इस अधिग्रहण से प्रभावित होने वाली गांव सभाओं को बताया जाए व इस विस्तृत व प्रामाणिक सूचना के आधार पर प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण पर गांव सभाओं में व्यापक र्चचा हो। गांव सभाओं को जो सूचना दी जाए उसमें यह भी बताया जाए कि किन कारणों से भूमि का अधिग्रहण हो रहा है? और यह बहुत जरूरी क्यों है? सरकार की अपनी घोषित नीति है कि उपजाऊ व सिंचित कृषि भूमि का अन्य कार्य के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। यदि इसके बावजूद अधिग्रहण हो रहा है तो गांव सभाओं को बताना होगा कि इसकी इतनी बड़ी जरूरत क्यों है? साथ ही गांववासियों को सरकार यह भी सूचित करना चाहिए कि अधिग्रहण करने की स्थिति में वह किसानों के अलावा भूमिहीन मजदूरों, बटाईदारों, दस्तकारों आदि की क्षतिपूर्ति कैसे करेंगे?ग्राम सभाओं में इस बारे में व्यापक र्चचा होनी चाहिए कि क्या भूमि अधिग्रहण की जो वजह बताई गई है वह जायज है। यदि यह जरूरी है तो भी क्या ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जिससे भूमि अधिग्रहण को न्यूनतम किया जा सकता है। अपनी विस्तृत स्थानीय जानकारी के आधार पर गांववासी कई बार बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी तरह क्षतिपूत्तर्ि के बारे में भी वे अपने सुझाव बेहतर ढंग से दे सकते हैं। इस प्रक्रिया का लाभ यह होगा कि सरकार को गांववासियों के विस्तृत विचार पहले से प्राप्त हो जाएंगे। कृषि भूमि को बचाने की क्या सम्भावनाएं हैं, क्या विकल्प हैं, इनकी भरपूर जानकारी भी सरकार को मिल जाएगी। इस तरह जो निर्णय गांववासियों के सुझावों को उच्च प्राथमिकता देते हुए लिए जाएंगे तो उम्मीद है कि उसमें टकराव व झगड़े की सम्भावना बहुत कम हो सकेगी। पर समस्या यह है कि या तो गांवसभाओं से विमर्श का कार्य ठीक से किया नहीं जाता है, यदि किया भी जाता है तो मूल निर्णय सरकार पहले से ले लेती है व विमर्श की प्रक्रिया महज खानापूत्तर्ि के लिए की जाती है। जैसे थोड़े से गिने-चुने व्यक्तियों को एकत्र कर स्वीकृति के हस्ताक्षर करवा लेना व इसे ग्राम सभा का सामूहिक निर्णय बता देना। कई बार तो ग्राम सभा के निर्णय को तोड़-मरोड़ कर भी प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह से तो पंचायत राज व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से लोगों का विश्वास टूट जाएगा। न्याय व शांति के व्यापक हित में ग्राम सभा की उचित, न्यायसंगत भूमिका को मजबूत करने की जरूरत है। यदि पंचायत राज ने सही भावना से कार्य किया तो पॉस्को से नोएडा तक अनेक बेहद तनावग्रस्त भूमि विवादों को शांतिपूर्ण व न्यायसंगत ढंग से सुलझाने में बहुत मदद मिलेगी।
Thursday, May 19, 2011
पंचायतों को शामिल करिए
यमुना एक्सप्रेस का विवाद हो या उड़ीसा में पॉस्को प्रोजेक्ट का या महाराष्ट्र में जैतापुर प्रोजेक्ट का, इन सब मामलों में सामान्य बात यह है कि परियोजनाओं के आरंभिक दौर में गांववासियों से व्यापक विमर्श नहीं किया गया। पश्चिम बंगाल में सिंगुर और नंदीग्राम में भड़की हिंसा की एक बड़ी वजह यही रही। देश में इस तरह के अनेक टकरावों की स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब कहा जा रहा है कि संतोषजनक भूमि अधिग्रहण कानून शीघ्र बनना चाहिए। पर जो पहले से अच्छे कानून बने पड़े हैं,उनके उचित क्रियान्वयन के बारे में क्यों नहीं सोचा जा रहा है? यदि पंचायत राज के कानूनों को ही सही भावना से लागू किया जाए तो ऐसे कई विवाद समय पर सुलझाने में मदद मिल सकती है। वर्ष 1993 में संविधान के 73 वें संशोधन ने देश में पंचायत राज व ग्रामीण विकेन्द्रीकरण को सशक्त किया पर इसके कई प्रावधानों को आज तक सही भावना से नहीं अपनाया गया है। विशेषकर ग्रामसभाओं को सशक्त नहीं किया गया। इस बारे में और भी बेहतर कानून 1996 में अनुसूचित जाति, जन-जातीय क्षेत्रों के लिए बनाया गया जिसमें ग्राम सभा को और मजबूती दी गई। ग्राम सभा को ऐसे कानूनी अधिकार देश भर में मिलने चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता है,मौजूदा कानून भी ग्राम सभा की असरदार भूमिका के लिए काफी हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि ग्राम सभा की मीटिंग की प्राय: खानापूर्ति ही की जाती है। उसकी जो वास्तविक भूमिका है कि गांव के सब महत्वपूर्ण मुद्दों की बड़ी व्यापक र्चचा हो, वह भूमिका पूरी नहीं हो पा रही है। होना तो यह चाहिए कि जहां भी भूमि अधिग्रहण जैसा कोई मामला हो, वहां यह प्रस्ताव विस्तार से इस अधिग्रहण से प्रभावित होने वाली गांव सभाओं को बताया जाए व इस विस्तृत व प्रामाणिक सूचना के आधार पर प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण पर गांव सभाओं में व्यापक र्चचा हो। गांव सभाओं को जो सूचना दी जाए उसमें यह भी बताया जाए कि किन कारणों से भूमि का अधिग्रहण हो रहा है? और यह बहुत जरूरी क्यों है? सरकार की अपनी घोषित नीति है कि उपजाऊ व सिंचित कृषि भूमि का अन्य कार्य के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। यदि इसके बावजूद अधिग्रहण हो रहा है तो गांव सभाओं को बताना होगा कि इसकी इतनी बड़ी जरूरत क्यों है? साथ ही गांववासियों को सरकार यह भी सूचित करना चाहिए कि अधिग्रहण करने की स्थिति में वह किसानों के अलावा भूमिहीन मजदूरों, बटाईदारों, दस्तकारों आदि की क्षतिपूर्ति कैसे करेंगे?ग्राम सभाओं में इस बारे में व्यापक र्चचा होनी चाहिए कि क्या भूमि अधिग्रहण की जो वजह बताई गई है वह जायज है। यदि यह जरूरी है तो भी क्या ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जिससे भूमि अधिग्रहण को न्यूनतम किया जा सकता है। अपनी विस्तृत स्थानीय जानकारी के आधार पर गांववासी कई बार बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी तरह क्षतिपूत्तर्ि के बारे में भी वे अपने सुझाव बेहतर ढंग से दे सकते हैं। इस प्रक्रिया का लाभ यह होगा कि सरकार को गांववासियों के विस्तृत विचार पहले से प्राप्त हो जाएंगे। कृषि भूमि को बचाने की क्या सम्भावनाएं हैं, क्या विकल्प हैं, इनकी भरपूर जानकारी भी सरकार को मिल जाएगी। इस तरह जो निर्णय गांववासियों के सुझावों को उच्च प्राथमिकता देते हुए लिए जाएंगे तो उम्मीद है कि उसमें टकराव व झगड़े की सम्भावना बहुत कम हो सकेगी। पर समस्या यह है कि या तो गांवसभाओं से विमर्श का कार्य ठीक से किया नहीं जाता है, यदि किया भी जाता है तो मूल निर्णय सरकार पहले से ले लेती है व विमर्श की प्रक्रिया महज खानापूत्तर्ि के लिए की जाती है। जैसे थोड़े से गिने-चुने व्यक्तियों को एकत्र कर स्वीकृति के हस्ताक्षर करवा लेना व इसे ग्राम सभा का सामूहिक निर्णय बता देना। कई बार तो ग्राम सभा के निर्णय को तोड़-मरोड़ कर भी प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह से तो पंचायत राज व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से लोगों का विश्वास टूट जाएगा। न्याय व शांति के व्यापक हित में ग्राम सभा की उचित, न्यायसंगत भूमिका को मजबूत करने की जरूरत है। यदि पंचायत राज ने सही भावना से कार्य किया तो पॉस्को से नोएडा तक अनेक बेहद तनावग्रस्त भूमि विवादों को शांतिपूर्ण व न्यायसंगत ढंग से सुलझाने में बहुत मदद मिलेगी।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment