Thursday, May 5, 2011

विरोधाभासों से घिरा बेमन का विकेंद्रीकरण


पंचायती राज संस्थाओं के बारे में यह आम धारणा है कि वे विकास के किसी भी जनपक्षीय ढांचे की सोच को आगे रखने या बहुसंख्यक ग्रामीण जनता की विकास सम्बंधी आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने में अक्षम सिद्ध हुई हैं। यह व्यवस्था सत्ता की अविकास की राजनीति को ही संरक्षण देने का काम कर रही है। मैं समझता हूं कि वास्तविकता मिलीजुली है। कुछ कार्यक्रमों में और कई स्थानों पर पंचायत की भूमिका विकास के संदर्भ में अच्छी रही है तो कई स्थानों पर वह काफी कमजोर भी। ग्रामीण विकास के कई कार्यक्रमों जैसे कि मनरेगा, पीने के पानी और सड़क की व्यवस्था में नतीजे कुछ बेहतर हैं। अगर राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और कुछ हद तक बिहार में एक बेहतर स्थिति दिखाई देती है पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और बंगाल की स्थिति संतोषजनक नहीं है। झारखंड में अभी-अभी चुनाव हुए हैं, इसलिए उसकी बात करना सही नहीं होगा। जिन कार्यक्रमों में सबसे अधिक दिक्कत आ रही है; उनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम आदि प्रमुख हैं। ये दिक्कतें इसलिए हो रही हैं कि इनके कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में तालमेल नहीं हो पा रहा। राज्यों में कई जगह पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के कार्यालय साथ-साथ चल रहे हैं। इससे तालमेल में परेशानी आती है। आशा जैसे कार्यक्रमों में काफी पैसा खर्च करने के बाद भी इसीलिए अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। आज उनकी हालत भी कमोबेश सर्व शिक्षा अभियान जैसी हो गई है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी काफी मुश्किल परिस्थितियां हैं। जहां प्रशासन कार्यवाहक की भूमिका निभा रहा है, केवल वही पंचायतों को भी काम करने का मौका मिल पाता है।
विकल्प के दो आयाम
पंचायती राज संस्थाओं को जब हम ग्रामीण इलाकों के पिछड़ेपन और बेकारी की समस्या को दूर करने के एक बेहतर विकल्प के तौर पर देखने की कोशिश करते हैं तो इसके दो अलग- अलग आयाम हमारे सामने आते हैं। अगर हम पूर्वी उत्तर प्रदेश या बुंदेलखंड जैसे इलाकों के पिछड़ेपन के संदर्भ में ऐसा सोचते हैं तो यह समझ लेना चाहिए कि यह पंचायतों के बूते से बाहर की बात है। इन इलाकों को पिछड़ेपन की समस्या से निजात दिलाने के राजकीय और राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत है। विकेंद्रीकरण का मुद्दा काफी जटिल है। यह अब भी ठीक ढंग से नहीं हुआ है। किन्हीं योजनाओं में पंचायतों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे क्रियान्वयन की भूमिका निभाएं जैसे कि मनरेगा आदि में। पर वास्तविकता यह है कि नक्शा पास कराने और भत्ता मिलने में ही महीनों लग जाते हैं। केवल विकेंद्रीकरण कर दिया जाए और क्षमता न बढ़ाई जाए तो कोई भी बदलाव नहीं लाया जा सकता। कई पंचायतों में निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। आशाकर्मी आते हैं या नहीं, यह देखना या जांचना पंचायतों के लिये कैसे सम्भव है? आंगनवाड़ी जैसी संस्थाओं को चलाने के लिए पंचायतें सक्षम हो सकती थीं पर उनसे यह काम ठीक ढंग से नहीं लिया जा रहा। शिक्षक नहीं चाहते कि उनकी निगरानी, ट्रांसफर या पोस्टिंग आदि में पंचायतों की कोई भूमिका हो।
त्रिस्तरीय व्यवस्था से दुविधा
इस तरह हम पाते हैं कि स्थानीय स्तर पर भी सरकारी, पंचायती और प्राइवेट की एक त्रिस्तरीय व्यवस्था बन गई है। ग्रामीण मध्यवर्ग पहले ही अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने भेज रहा था और जो गरीब बच्चे हैं, उन्हें शिक्षाकर्मी के हवाले कर दिया गया है। ये विरोधाभास बताते हैं कि ईमानदारी से विकेंद्रीकरण का काम किया ही नहीं गया है। कई राज्यों में अभी नियमावली भी लागू नहीं हुई थी पर फॉरेस्ट राइट्स एक्ट लागू कर दिया गया। अब अगर राज्यों में लोग इस कानून के विरोध में खड़े होते हैं तो सरकार को गोलियां चलवाने के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। कॉमन प्रॉपर्टी फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के अंतर्गत आ ही नहीं पा रही है। आईसीडीएस, आशा जैसे कार्यक्रमों के विकेंद्रीकरण में अगर कोई चीज आड़े आ रही है तो वह सरकारी ढीलापन ही है।
कोष खरचने में पारदर्शिता
पंचायत कोष में जो पैसे आते हैं और जो उसके कार्यकलाप हैं उसके विस्तार को देखते हुए निर्णय प्रक्रिया और अमल के काम में पारदर्शिता लाने तथा भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए कई लोग किसी सक्षम कानून के अभाव की बात करते हैं। मेरे विचार से देश में कानूनों की कोई कमी नहीं है। 200 करोड़ हजम कर जाने के बाद उनकी वसूली के लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है। पंचायतों में एक विकृति आ गई है। संविधान के अंतर्गत सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास में उनकी भूमिका तय की गई थी। राज्य सरकारों ने पंचायतों को इंस्टीट्यूशनल क्षमता दी ही नहीं। कुछेक जगहों पर कम्प्यूटर तो लगा दिए पर बिजली नहीं दी। कहीं बिजली भी दे दी तो कम्प्यूटर चलाने का प्रशिक्षण नहीं दिया। 11वें, 12वें और 13वें वित्त आयोग ने पैसे भी आवंटित किए, नीति भी बनाई पर काम नहीं हुआ। डीआरडी में एक करोड़ रुपया हर साल हर पंचायत को क्षमता-वृद्धि के लिए दिया जा रहा है पर उसका 8-10 प्रतिशत भी खर्च नहीं होता। क्षमता कैसे बढ़ेगी? संविधान में इसे स्थानीय निकाय नाम दिया गया है पर एक निकाय के लिए ऑफिस, स्टाफ, फर्नीचर जैसी चीजों की भी जरूरत पड़ती है। आज सरपंच पूरी पंचायत को अपने झोले में डाले घूमता रहता है। व्यवस्था न होने से जॉब कार्ड तक उसके झोले में ही रखा होता है।
निकायों को पहचान मिले
इतना पैसा आवंटित करने के बाद इन निकायों को एक पहचान देना इतना मुश्किल नहीं है। अगर चाहत होती तो काफी कुछ किया जा सकता था। इसलिए इनकी जवाबदेही तय करने के लिए किसी नए कानून की जरूरत नहीं है। कानून तो बने हुए हैं कि साल में चार बार मीटिंग होनी चाहिए पर कितनी मीटिंग हो पाती हैं? वे देखते हैं कि संसद-विधानसभाओं की नकल करने लगे हैं। इसलिए अगर पंचायत की मीटिंग नहीं हुई तो क्या हुआ। इधर के वर्षो में पंचायत चुनावों में भी उन्हीं अपेक्षाओं को लागू किए जाने की मांग उठी है जैसी संसद या विधानसभा के सदस्यों के चुनाव के सम्बंध में की जाती है पर मेरे विचार से इन दोनों चुनावों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। सबसे बड़ा अंतर तो यही है कि पंचायत चुनावों में जो उम्मीदवार खड़े होते हैं, उन्हें लगभग सभी मतदाता व्यक्तिगत तौर पर पहचानते हैं। दिक्कत यह है कि अपने समाज में उम्मीदवार के ऊपर जाति और राजनीति से सम्बंधित अपेक्षाएं लाद दी जाती हैं। यों भी चुनाव की प्रक्रियाएं ऐसी हो गई हैं कि उसमें कोई सही व्यक्ति चुन कर आ जाए, यह मुमकिन नहीं लगता।
ज्यादा परिवर्तन महिला प्रतिनिधित्व में
पंचायती राज के इस मौजूदा स्वरूप में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन महिलाओं के नेतृत्व के स्तर पर ही देखने को मिलता है। इसमें जो दलित प्रतिनिधित्व स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं दीखता। इधर, पंचायत चुनाव में पढ़े-लिखे नौजवानों की दिलचस्पी की वजह गांव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या पिछले 20 वर्षों में बढ़ी है। नई पीढ़ी के लोग गांवों का विकास करने या कुछ बदलाव लाने का संकल्प लेकर आ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में आर्थिक विकास हुआ है, वहां यह प्रवृत्ति ज्यादा है। कई जगहों पर अब यह बात होती है कि पंचायतों में काफी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। इसलिए उम्मीदवार पढ़ा-लिखा हो तो वह कुछ काम कर पाएगा। आदिवासी क्षेत्रों में युवा चूंकि सरकार और प्रशासन से इतने ऊब चुके हैं कि अब उन्हें बंदूक उठाने की जरूरत लगती है। इसलिए वहां की स्थिति कुछ भिन्न है। आज जब योजना आयोग 12वीं योजना पर काम कर रहा है, तो उसे इस बात पर ज्यादा ध्यान दिलाने की जरूरत है कि पंचायतों को अधिक सक्षम और समर्थ बनाने की दिशा में किस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए। 12वीं योजना में इस बिन्दु पर अलग से काम करने की जरूरत है। (राजेश टण्डन से राजेश चन्द्र की बातचीत पर आधारित)


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