स्थानीय स्वशासन, अत्यंत ही कर्णप्रिय शब्द है, जिन्हें सुनते ही ऐसा लगता है कि गांधी जी की ग्राम स्वराज की अवधारणा अपने पूरे मूर्त रूप में सामने आ कर खड़ी हो गई हो। सैद्धांतिक रूप से यह बात ठीक भी है क्योंकि वास्तव में किसी भी शासन-प्रशासन का उद्देश्य अपनी पूर्णता में तभी सफल माना जाएगा जब जनता की भागीदारी हो और पूरी मजबूती से हो। बहुत लम्बे समय तक ग्रामीण इलाकों में एसपी रहने और इस स्थानीय प्रशासन को बहुत नजदीकी से देखने के कारण मैं यह बात पूरे भरोसे से कह सकता हूं कि आज के स्थानीय प्रशासन के तौर-तरीके स्वशासन की मूल आकांक्षाओं व परिकल्पनाओं से बिलकुल ही विपरीत हैं। क्या गांधी जी ने या उनके किसी ही अनुयायी ने यह कल्पना की थी कि ग्राम स्वराज का मतलब दारू और मुर्गा होगा? चुनाव का मतलब एक हज़ार रु पये प्रति वोट होगा? क्या उनकी यह चाहत थी कि चुनाव के पूर्व घर-घर में साड़ियां और कपड़े बांटे जाएंगे? गांधी या उनके अनुयायियों को यह अनुमान भी था कि चुनावों के दौरान पूरे गांव को जाति, धर्म, समुदाय और इसी तरह के आधारों पर कई खेमों में बांट दिया जाएगा, जिनके बीच बातचीत तो बंद हो ही जाएगी, आपसी वैमनस्य इस कदर तीखा हो जाएगा कि हत्या और मारपीट एक आम बात हो जाएगी? यह ठीक है कि अंग्रेजी कहावत कहती है-‘एवेरी थिंग इज फेयर इन लव एंड वार’ (युद्ध और शांति में हर तरीके आजमाना जायज़ है) पर क्या स्थानीय स्वशासन से जुड़े चुनाव इस प्रकार के युद्ध (या महायुद्ध कह लीजिए) हैं? मैं अपने अनुभवों से जानता हूं कि जब भी ग्राम सभा, ब्लाक, जिला पंचायत और नगरपालिका आदि के चुनाव घोषित होते हैं तो जिले के डीएम और एसपी की कैसी मनोदशा हो जाती है। न सिर्फ पूरे जिले में एक अजीब सी सरगर्मी फैल जाती है बल्कि नफरत सब ओर खुद-ब-खुद फैल जाया करती है। जैसे ही चुनाव खत्म हुए, दो बातें एक साथ होने लगती हैं। एक तरफ तो व्यक्ति आधारित पार्टीबंदी हो गई और वोट देने और नहीं देने को ले कर बदला लेने की साजिशें शुरू हो गई और दूसरी तरफ उस पद से होने वाले लाभों को ले कर खेल शुरू हो गया। उसमें भी दो तरह की स्पष्ट प्रतिक्रियाएं देखने को मिल जाती हैं। पहला तो यह कि विजेता समूह इन पदों से मिलने वाले हर तरह के लाभ को बूंद-बूंद निचोड़ लेने में लग जाता है। चाहे उसमें भूमि के आवंटन का अधिकार हो, इंदिरा आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं से मिलने वाले प्रतिशत हों या किसी आपदा राहत धन राशि में अपना हिस्सा हो या वृद्धावस्था और विधवा पेंशन जैसे बेहद जरूरी और कमजोर लोगों से जुड़ी योजनाओं में नाम भेजने की कीमत। इसके अलावा अब मनरेगा के आने के बाद से तो पूछना ही क्या? इसके ठीक विपरीत पराजित समूहों का बस एक ही काम होता है। विजयी पक्ष के हर कार्य का आंख मूंद कर विरोध करना। उन्हें अपमानित करने की कोशिश करना और इस फेर में लगे रहना कि कैसे इन लोगों के कामों में स्थानीय स्तर से ले कर शासन तक में कोई जांच खुलवा दी जाए ताकि वे उसी में उलझ कर रह जाएं। यह प्रवृत्ति इतनी बहुतायत में मिल जाएगी कि कई बार तो यह लगने लगता है कि स्थानीय स्वशासन को लागू कर देश के नेतृत्वकत्र्ताओं ने कोई बड़ी भूल की हो। इसके कई अपवाद हैं पर दुर्भाग्य यही है कि अपवादों की संख्या कम है। मेरे अनुभव सार्वभौम नहीं हैं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार तथा झारखंड राज्यों के स्थानिक अनुभव हैं। मुझे अति प्रसन्नता होगी यह जान कर कि शेष राज्यों की ग्राम पंचायतों की ऐसी स्थितियां नहीं हैं और वहां ग्राम स्वराज अपने पूरे निखार पर है। पर मेरा मन जाने क्यों यह कहता है कि हालात सभी जगह कमोबेश एक से ही होंगे। यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि स्थानीय स्वशासन अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल हो सके और देश के विकास में अपेक्षित योगदान देने का कार्य कर सके तो हमें इस सत्यता को स्वीकार करते हुए इनसे निकलने का हर संभव प्रयास करना ही होगा। ग्राम स्वराज की बड़ी-बड़ी उम्मीदों को पूरा करने का रास्ता वास्तविकता के प्रति आंख मूंद लेना नहीं बल्कि सच का सामना करते हुए उसका गहन, तथ्यपरक और वास्तविक आकलन करना और तदनुसार भविष्य के लिए कार्ययोजना बनाना ही होगा।
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