Thursday, May 5, 2011

अपनी प्लानिंग खुद गांवों को करने दें


गांंवों को मजबूत बनाए बिना हम देश को मजबूत नहीं बना सकेंगे। सबसे पहले तो हमें गांवों के विषय में यह धारणा बदलना होगी कि गांव अपनी जरूरतों और समस्याओं को लेकर खुद से प्लानिंग नहीं कर सकते। अभी तक गांवों की जरूरतों या कहें विकास को लेकर जो सारी प्लानिंग राज्यों और केंद्र की राजधानी में बनती रही है, उससे ही गांव विकास की दौड़ में पिछड़ते गए। मैं भी अपने गांव को आत्मनिर्भर और खुशहाल बना सका तो उसकी भी यही कहानी है कि गांवों के लोगों ने खुद से अपनी समस्याओं को पहचान की, उसका हल ढूंढने का पूरा खाका तैयार और अपनी जरूरतों के साधनों को खोजा। फिर चाहे वह पानी की समस्या हो, गंदे नाले के बहाव की या पर्यावरण जैसी कोई दूसरी समस्या। जब भी कहीं मुझ से गांवों के विकास का फामरूला पूछा जाता है तो मैं यही बताता हूं कि गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, वास्तव में महात्मा गांधी का भी यह दर्शन था। गांधी जी तो यहां तक कहा करते थे कि गांव ऐसे बनें कि उनको अपनी जरूरतों के लिए शहरों की तरफ कम ही ताकना पड़े। आज स्थिति यह है कि गांवों से आजीविका की तलाश में शहरों की ओर पलायन हो रहा है। नगर फूल कर महानगर होते जा रहे हैं, जबकि गांव बियावान हो गए हैं। मुझे यह सुनने को मिलता है कि खेती के लिए वहां मजदूर नहीं मिलते। यह दुर्दशा क्यों हो गई? इसलिए कि हमने गांवों के लिए भरण-पोषण का मुकम्मल इंतजाम नहीं किया। उन्हें जो चाहिए वह देने के बदले जो कार्यक्रम बनाए उसने भी सही परिणाम नहीं दिए। अब नतीजा सामने है। अब रही बात कि गांवों को आत्मनिर्भर कैसे बनाए जाए? मेरा स्पष्ट विचार है कि गांव तभी आत्मनिर्भर बन सकेंगे जब वे अपनी स्थानीय जरूरतों का पूरी प्लानिंग स्वयं करें। उन पर योजनाएं थोपी न जाएं। इस पर जोर इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि प्रत्येक गांव की अपनी अलग समस्या हो सकती है। मसलन, किसी गांव में पानी की समस्या हो सकती है तो किसी गांव में बिजली की समस्या हो सकती है। कहीं सड़क नहीं हो सकती और कहीं अस्पताल या फिर स्कूल खुलना रह गया होगा। कुछ गांव ऐसे भी हो सकते हैं जहां अस्पताल और स्कूल के भवन तो बन गए होंगे पर उनमें स्टॉफ नहीं मिला होगा। बिना स्टॉफ के अस्पताल भवन से तो किसी का इलाज हो नहीं सकता, इसलिए उस गांव के लिए तो अस्पताल का स्टॉफ ही सबसे बड़ी समस्या हो सकती है। अब सरकार जब इसकी प्लानिंग करती है तो जानकारी के अभाव में उस गांव की समस्या बिना हल हुए रह जाती है। सरकारी योजनाएं ज्यादातर यह सोचकर बनाई जाती है कि सभी गांवों की समस्याएं या मसले एक जैसे ही होंगे। मेरा अनुभव यह भी कहता है कि कोई एक गांव दूसरे गांव के लिए मॉडल नहीं हो सकता है, एक गांव के अच्छे कामों से दूसरा गांव कुछ सीख तो सकता है लेकिन जस का तस वैसा नहीं बन सकता। इसकी वजह पहले ही मैंने बताई है कि प्रत्येक गांव की परिस्थितियां और समस्याएं अलग-अलग तरह की हो सकती हैं। प्लानिंग के साथ-साथ मेरा कहना तो यह भी है कि हर काम को जन भागीदारी से पूरा किया जाना चाहिए। इससे काम जल्दी भी पूरा होता है और खुद का काम करके लोगों में सम्मान भाव भी जागता है। गांव की जरूरत के तमाम बांध गांव वालों ने जन भागीदारी से ही बनाए हैं। खुद प्लानिंग करने और जन भागीदारी रखने का परिणाम यह होगा कि फैसले सामूहिक आधार पर हो सकेंगे जिससे गड़बड़ी की आशंका ही खत्म हो जाएगी। लोग जवाबदेही से काम करना सीखेंगे। मैं इधर जिस लोकपाल के मसौदे पर काम कर रहा हूं उसके विषय में भी मैंने कह रखा है कि विधेयक के बतौर इसे संसद में पास कराने के लिए भेजने से पहले देश की सभी पंचायतों में वहां की स्थानीय भाषा में भेजा जाए। इसका एक ही मकसद है-सबकी भागादारी। हमने जन लोकपाल शब्द ही इसलिए दिया था कि ताकि सबको यह लगे कि यह जनता का बनाया लोकपाल है। इससे जन लोकपाल की व्यवस्था में वे अपनी भागीदारी भी महसूस करेंगे। (श्री अन्ना हजारे के विचार अजय तिवारी की बातचीत पर आधारित)


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