Sunday, May 22, 2011

150 साल बाद दिल्ली का गांव देखेगा विकास


काला पानी की तरह जिंदगी गुजार रहे दिल्ली के बदरपुर खादर गांव की किस्मत खुल गई है। गांव में अब वह सबकुछ होने जा रहा है, जो एक विकसित कस्बे में होता है। बच्चे स्कूल जाएंगे और बीमार होने पर लोगों का इलाज भी होगा, वह भी गांव में। दैनिक जागरण की खबर पर सरकारी मशीनरी जागी और आनन फानन में तैयार कर लिए गांव के विकास की पूरी तस्वीर। इसके लिए सरकार ने चार बीघा जमीन आवंटित कर दी है। शिक्षा विभाग को जिम्मेदारी दी गई है और डीएसआइडीसी को बिल्डिंग बनारी है। बिल्डिंग में समय लगेगा, इसलिए प्राथमिक स्कूल इसी सत्र से टेंट लगाकर शुरू हो जाएंगे। स्वास्थ्य सेवा के लिए स्थायी डिस्पेंसरी खुलेगी। डिस्पेंसरी के लिए सरकार ने दिल्ली नगर निगम को चिट्ठी भी लिख दी है। स्थायी व्यवस्था होने तक गांव में सचल डिस्पेंसरी वैन इसी महीने से शुरू होगी। इसमें तीन दिन दिल्ली सरकार की एवं तीन दिन एमसीडी की वैन सेहत की जांच के लिए जाएगी। स्वच्छ पेयजल के लिए दो मिनी बोरवेल लगाए जाएंगे। इसके अलावा लोगों को एक छत के नीचे लाने के लिए दो बीघे में सामुदायिक भवन/पंचायत घर बनेगा। इसमें तीन बड़े हाल होंगे, जो सार्वजनिक होंगे। इसी में डाक्टर बैठेंगे और फिलहाल डिस्पेंसरी चलेगी। गौरतलब है कि दैनिक जागरण ने 8 मई 2011 को इस मामले को प्रमुखता से उठाया था। दिल्ली सरकार के उत्तर पूर्वी जिला के उपायुक्त जीएल मीणा के मुताबिक स्कूल की बिल्डिंग छोड़ बाकी सभी प्रोजेक्ट मार्च 2012 तक तैयार हो जाएंगे। मुख्य सड़क से गांव को जोड़ती लिंक सड़क को पक्का बनाया जा रहा है। सभी प्रोजेक्ट पूरा हो जाने के बाद इस गांव की तस्वीर पूरी तरह से बदल जाएगी। लोगों को इसका सीधे लाभ मिलेगा।


Thursday, May 19, 2011

पंचायतों को शामिल करिए


यमुना एक्सप्रेस का विवाद हो या उड़ीसा में पॉस्को प्रोजेक्ट का या महाराष्ट्र में जैतापुर प्रोजेक्ट का, इन सब मामलों में सामान्य बात यह है कि परियोजनाओं के आरंभिक दौर में गांववासियों से व्यापक विमर्श नहीं किया गया। पश्चिम बंगाल में सिंगुर और नंदीग्राम में भड़की हिंसा की एक बड़ी वजह यही रही। देश में इस तरह के अनेक टकरावों की स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब कहा जा रहा है कि संतोषजनक भूमि अधिग्रहण कानून शीघ्र बनना चाहिए। पर जो पहले से अच्छे कानून बने पड़े हैं,उनके उचित क्रियान्वयन के बारे में क्यों नहीं सोचा जा रहा है? यदि पंचायत राज के कानूनों को ही सही भावना से लागू किया जाए तो ऐसे कई विवाद समय पर सुलझाने में मदद मिल सकती है। वर्ष 1993 में संविधान के 73 वें संशोधन ने देश में पंचायत राज व ग्रामीण विकेन्द्रीकरण को सशक्त किया पर इसके कई प्रावधानों को आज तक सही भावना से नहीं अपनाया गया है। विशेषकर ग्रामसभाओं को सशक्त नहीं किया गया। इस बारे में और भी बेहतर कानून 1996 में अनुसूचित जाति, जन-जातीय क्षेत्रों के लिए बनाया गया जिसमें ग्राम सभा को और मजबूती दी गई। ग्राम सभा को ऐसे कानूनी अधिकार देश भर में मिलने चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता है,मौजूदा कानून भी ग्राम सभा की असरदार भूमिका के लिए काफी हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि ग्राम सभा की मीटिंग की प्राय: खानापूर्ति ही की जाती है। उसकी जो वास्तविक भूमिका है कि गांव के सब महत्वपूर्ण मुद्दों की बड़ी व्यापक र्चचा हो, वह भूमिका पूरी नहीं हो पा रही है। होना तो यह चाहिए कि जहां भी भूमि अधिग्रहण जैसा कोई मामला हो, वहां यह प्रस्ताव विस्तार से इस अधिग्रहण से प्रभावित होने वाली गांव सभाओं को बताया जाए व इस विस्तृत व प्रामाणिक सूचना के आधार पर प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण पर गांव सभाओं में व्यापक र्चचा हो। गांव सभाओं को जो सूचना दी जाए उसमें यह भी बताया जाए कि किन कारणों से भूमि का अधिग्रहण हो रहा है? और यह बहुत जरूरी क्यों है? सरकार की अपनी घोषित नीति है कि उपजाऊ व सिंचित कृषि भूमि का अन्य कार्य के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। यदि इसके बावजूद अधिग्रहण हो रहा है तो गांव सभाओं को बताना होगा कि इसकी इतनी बड़ी जरूरत क्यों है? साथ ही गांववासियों को सरकार यह भी सूचित करना चाहिए कि अधिग्रहण करने की स्थिति में वह किसानों के अलावा भूमिहीन मजदूरों, बटाईदारों, दस्तकारों आदि की क्षतिपूर्ति कैसे करेंगे?ग्राम सभाओं में इस बारे में व्यापक र्चचा होनी चाहिए कि क्या भूमि अधिग्रहण की जो वजह बताई गई है वह जायज है। यदि यह जरूरी है तो भी क्या ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जिससे भूमि अधिग्रहण को न्यूनतम किया जा सकता है। अपनी विस्तृत स्थानीय जानकारी के आधार पर गांववासी कई बार बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी तरह क्षतिपूत्तर्ि के बारे में भी वे अपने सुझाव बेहतर ढंग से दे सकते हैं। इस प्रक्रिया का लाभ यह होगा कि सरकार को गांववासियों के विस्तृत विचार पहले से प्राप्त हो जाएंगे। कृषि भूमि को बचाने की क्या सम्भावनाएं हैं, क्या विकल्प हैं, इनकी भरपूर जानकारी भी सरकार को मिल जाएगी। इस तरह जो निर्णय गांववासियों के सुझावों को उच्च प्राथमिकता देते हुए लिए जाएंगे तो उम्मीद है कि उसमें टकराव व झगड़े की सम्भावना बहुत कम हो सकेगी। पर समस्या यह है कि या तो गांवसभाओं से विमर्श का कार्य ठीक से किया नहीं जाता है, यदि किया भी जाता है तो मूल निर्णय सरकार पहले से ले लेती है व विमर्श की प्रक्रिया महज खानापूत्तर्ि के लिए की जाती है। जैसे थोड़े से गिने-चुने व्यक्तियों को एकत्र कर स्वीकृति के हस्ताक्षर करवा लेना व इसे ग्राम सभा का सामूहिक निर्णय बता देना। कई बार तो ग्राम सभा के निर्णय को तोड़-मरोड़ कर भी प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह से तो पंचायत राज व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से लोगों का विश्वास टूट जाएगा। न्याय व शांति के व्यापक हित में ग्राम सभा की उचित, न्यायसंगत भूमिका को मजबूत करने की जरूरत है। यदि पंचायत राज ने सही भावना से कार्य किया तो पॉस्को से नोएडा तक अनेक बेहद तनावग्रस्त भूमि विवादों को शांतिपूर्ण व न्यायसंगत ढंग से सुलझाने में बहुत मदद मिलेगी।

Thursday, May 5, 2011

मनरेगा के नीतिगत अर्थ-प्रत्यर्थ


इस वर्ष भारत में ग्रामीण मजदूरों के लिए चल रही योजना ‘मनरेगा’ के पांच वर्ष पूरे हो गये। निश्चित तौर पर यह योजना भारत के मजदूरों की स्थिति बदलने में अहम भूमिका अदा कर सकती है लेकिन इसके लिए जरूरी है इसका सही क्रियान्वयन। हालांकि भारतीय शासन व्यवस्था के मौजूदा परिवेश में इसके सही क्रियान्वयन के बारे में सोचना अपने को धोखा देने जैसा है। बहरहाल, इस योजना के दो बड़े लाभ हुए। पहला, इसने मजदूरों का पलायन रोका तथा दूसरा उनको घर में रहते हुए भरण-पोषण के अवसर मुहैया कराये। लेकिन इसने कुछ अहम सवाल भी पैदा किये हैं। मसलन कार्यरत मजदूरों और उनकी अगली पीढ़ी का भविष्य क्या होगा? क्या सौ दिन के रोजगार से उनके परिवार का भरण-पोषण हो जाएगा? क्या सत्ताधारी वर्ग इसके लिए अपनी पीठ थपथपा सकता है? इस तरह के अनेक सवाल सरकार की नीतियों को लेकर उठाये जा रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) नामक योजना की शुरुआत 2006 में हुई थी। इसमें 879 करोड़ मजदूरों को रोजगार दिया गया है जिसमें 47 प्रतिशत महिलाएं हैं। इसके तहत 28 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा 24 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोगों को अवसर मिला है। 2006-07 में इस योजना को भारत के 200 जिलों में लागू किया गया। 2007-08 में यह संख्या बढ़कर 330 हो गयी। 1 अप्रैल 2008 को इसे देश के सभी जिलों में लागू कर दिया गया। बाद में योजना में ‘काम के बदले अनाज’ और ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को भी इसमें शामिल कर लिया गया। 2 अक्टूबर 2009 को योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया गया। दरअसल सरकार की नीतियां जिस तरह की हैं, वह तत्काल प्रभाव के लिए तो सही हैं लेकिन इसे स्थायी नहीं बनाना चाहिए और न ही इसका जैसा विज्ञापन हो रहा है, वैसा होना चाहिए। विज्ञापन जब तक सूचनात्मक होते हैं, तब तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही स्थायी होते हैं, उन्हें राजनीतिक हथियार का रूप प्राप्त होता है और उनका नीतिगत उद्देश्य समाप्त हो जाता है। यह कहना जितना गलत है उतना ही हास्यास्पद भी कि मनरेगा की अवधारणा गलत है या उसकी उपयोगिता गलत है। इसमें यदि कुछ गलत है तो इसका क्रियान्वयन। फिलहाल इसमें जो अनियिमतताएं आयी हैं, उन्हें तत्काल दूर नहीं किया गया तो गरीबों का पेट भरने की वजाय नौकरशाह अवश्य मोटे हो जाएंगे। इसे भारतीय नौकरशाहों की कुदृष्टि से सुरक्षित बचाने की जरूरत है। और अगर बच गया तो इसमें सन्देह नहीं है कि यह वर्तमान सरकार की सवरेत्तम नीतियों में से एक होगा। लेकिन समस्या यही है कि भारत में नीतियां तो बना दी जाती हैं पर उनका उचित क्रियान्वयन टेढ़ी खीर होता है। उन नीतियों का कितना हिस्सा हकीकत में लागू हो पाता है, इससे सब वाकिफ हैं। आज कोई भी मार्क्‍स आकर मजदूरों के प्रतिरोध को नहीं जगा सकते। ऐसे में नीति निर्धारक तबके को ही उनकी आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। असल में इस योजना में जिन बाधाओं का सामना मजदूर वर्ग को करना पड़ रहा है, वह इसकी विफलता के लिए काफी है। जॉब कार्ड बनवाने से लेकर काम पाने तक जिस प्रकार वे ग्राम प्रधानों का चक्कर लगाते हैं, उसे देखकर योजना की सफलता-विफलता का आभास हो सकता है। दूसरी ओर बड़ी समस्या न्यूनतम काम पाने के बाद की है। जरूरी नहीं कि सौ दिन बाद भी काम मिले। यदि मिल गया तो ठीक नहीं तो सौ दिन काम के बाद फिर बेकारी। यही नहीं, सौ दिन के काम के पैसे से तीन सौ पैंसठ दिन का काम चल जाना भी असंभव है। लेकिन बाकी दिनों गांवो में और क्या काम हो सकता है पर सौ दिन के काम का लालच उन्हें रोके रखता है लिहाजा, उनकी स्थिति खराब होना लाजमी है। हालांकि इसका भी तोड़ मजदूर वर्ग ने निकाला है। जैसे यदि एक घर में चार सदस्य हैं तो चारों को काम पर लगाया जाए जिससे एक आदमी को हमेशा काम मिलता रहे। यह कुछ हद तक तो सही है लेकिन इससे आने वाली पीढ़ी असुरक्षित हो जाएगी और उसका भविष्य सिर्फ मनरेगा पर निर्भर हो जाएगा। क्योंकि इसमें जिन लोगों को काम पर लगाया जाता है उनमें एक बड़ा हिस्सा उन छात्रों का है जो पढ़ाई छोड़ काम में लग जाते हैं। ऐसे में उनका जीवन मजदूरी के लिए अभिशप्त हो जाता है। इसलिए इस पर एक बार पुन: विचार करने की जरूरत है। बढ़ती जनसंख्या देश की सबसे बड़ी समस्या है। जो मनरेगा के स्थायी होने की स्थिति उसके मार्ग की बड़ी बाधा बन सकती है। एक परिवार में जितने अधिक सदस्य होंगे, परिवार की आमदनी का जरिया उतना ही अधिक होगा सो जनसंख्या पर दबाव बढ़ेगा। एक महत्वपूर्ण मामला शिक्षा से भी जुड़ा है। मनरेगा से लाभ पाने वाले ज्यादातर मजदूर अपने बच्चों को पढ़ाने के बजाए समय के साथ उन्हें अपनी तरह कामगार बना देना चाहेंगे। इस तरह की समस्याओं के मद्देनजर अब अधिक आवश्यकता है कि इस योजना के साथ-साथ कोई नयी योजना लायी जाय जो इन समस्याओं को मिटाने में मदद करे।


विरोधाभासों से घिरा बेमन का विकेंद्रीकरण


पंचायती राज संस्थाओं के बारे में यह आम धारणा है कि वे विकास के किसी भी जनपक्षीय ढांचे की सोच को आगे रखने या बहुसंख्यक ग्रामीण जनता की विकास सम्बंधी आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने में अक्षम सिद्ध हुई हैं। यह व्यवस्था सत्ता की अविकास की राजनीति को ही संरक्षण देने का काम कर रही है। मैं समझता हूं कि वास्तविकता मिलीजुली है। कुछ कार्यक्रमों में और कई स्थानों पर पंचायत की भूमिका विकास के संदर्भ में अच्छी रही है तो कई स्थानों पर वह काफी कमजोर भी। ग्रामीण विकास के कई कार्यक्रमों जैसे कि मनरेगा, पीने के पानी और सड़क की व्यवस्था में नतीजे कुछ बेहतर हैं। अगर राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और कुछ हद तक बिहार में एक बेहतर स्थिति दिखाई देती है पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और बंगाल की स्थिति संतोषजनक नहीं है। झारखंड में अभी-अभी चुनाव हुए हैं, इसलिए उसकी बात करना सही नहीं होगा। जिन कार्यक्रमों में सबसे अधिक दिक्कत आ रही है; उनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम आदि प्रमुख हैं। ये दिक्कतें इसलिए हो रही हैं कि इनके कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में तालमेल नहीं हो पा रहा। राज्यों में कई जगह पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के कार्यालय साथ-साथ चल रहे हैं। इससे तालमेल में परेशानी आती है। आशा जैसे कार्यक्रमों में काफी पैसा खर्च करने के बाद भी इसीलिए अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। आज उनकी हालत भी कमोबेश सर्व शिक्षा अभियान जैसी हो गई है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी काफी मुश्किल परिस्थितियां हैं। जहां प्रशासन कार्यवाहक की भूमिका निभा रहा है, केवल वही पंचायतों को भी काम करने का मौका मिल पाता है।
विकल्प के दो आयाम
पंचायती राज संस्थाओं को जब हम ग्रामीण इलाकों के पिछड़ेपन और बेकारी की समस्या को दूर करने के एक बेहतर विकल्प के तौर पर देखने की कोशिश करते हैं तो इसके दो अलग- अलग आयाम हमारे सामने आते हैं। अगर हम पूर्वी उत्तर प्रदेश या बुंदेलखंड जैसे इलाकों के पिछड़ेपन के संदर्भ में ऐसा सोचते हैं तो यह समझ लेना चाहिए कि यह पंचायतों के बूते से बाहर की बात है। इन इलाकों को पिछड़ेपन की समस्या से निजात दिलाने के राजकीय और राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत है। विकेंद्रीकरण का मुद्दा काफी जटिल है। यह अब भी ठीक ढंग से नहीं हुआ है। किन्हीं योजनाओं में पंचायतों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे क्रियान्वयन की भूमिका निभाएं जैसे कि मनरेगा आदि में। पर वास्तविकता यह है कि नक्शा पास कराने और भत्ता मिलने में ही महीनों लग जाते हैं। केवल विकेंद्रीकरण कर दिया जाए और क्षमता न बढ़ाई जाए तो कोई भी बदलाव नहीं लाया जा सकता। कई पंचायतों में निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। आशाकर्मी आते हैं या नहीं, यह देखना या जांचना पंचायतों के लिये कैसे सम्भव है? आंगनवाड़ी जैसी संस्थाओं को चलाने के लिए पंचायतें सक्षम हो सकती थीं पर उनसे यह काम ठीक ढंग से नहीं लिया जा रहा। शिक्षक नहीं चाहते कि उनकी निगरानी, ट्रांसफर या पोस्टिंग आदि में पंचायतों की कोई भूमिका हो।
त्रिस्तरीय व्यवस्था से दुविधा
इस तरह हम पाते हैं कि स्थानीय स्तर पर भी सरकारी, पंचायती और प्राइवेट की एक त्रिस्तरीय व्यवस्था बन गई है। ग्रामीण मध्यवर्ग पहले ही अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने भेज रहा था और जो गरीब बच्चे हैं, उन्हें शिक्षाकर्मी के हवाले कर दिया गया है। ये विरोधाभास बताते हैं कि ईमानदारी से विकेंद्रीकरण का काम किया ही नहीं गया है। कई राज्यों में अभी नियमावली भी लागू नहीं हुई थी पर फॉरेस्ट राइट्स एक्ट लागू कर दिया गया। अब अगर राज्यों में लोग इस कानून के विरोध में खड़े होते हैं तो सरकार को गोलियां चलवाने के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। कॉमन प्रॉपर्टी फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के अंतर्गत आ ही नहीं पा रही है। आईसीडीएस, आशा जैसे कार्यक्रमों के विकेंद्रीकरण में अगर कोई चीज आड़े आ रही है तो वह सरकारी ढीलापन ही है।
कोष खरचने में पारदर्शिता
पंचायत कोष में जो पैसे आते हैं और जो उसके कार्यकलाप हैं उसके विस्तार को देखते हुए निर्णय प्रक्रिया और अमल के काम में पारदर्शिता लाने तथा भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए कई लोग किसी सक्षम कानून के अभाव की बात करते हैं। मेरे विचार से देश में कानूनों की कोई कमी नहीं है। 200 करोड़ हजम कर जाने के बाद उनकी वसूली के लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है। पंचायतों में एक विकृति आ गई है। संविधान के अंतर्गत सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास में उनकी भूमिका तय की गई थी। राज्य सरकारों ने पंचायतों को इंस्टीट्यूशनल क्षमता दी ही नहीं। कुछेक जगहों पर कम्प्यूटर तो लगा दिए पर बिजली नहीं दी। कहीं बिजली भी दे दी तो कम्प्यूटर चलाने का प्रशिक्षण नहीं दिया। 11वें, 12वें और 13वें वित्त आयोग ने पैसे भी आवंटित किए, नीति भी बनाई पर काम नहीं हुआ। डीआरडी में एक करोड़ रुपया हर साल हर पंचायत को क्षमता-वृद्धि के लिए दिया जा रहा है पर उसका 8-10 प्रतिशत भी खर्च नहीं होता। क्षमता कैसे बढ़ेगी? संविधान में इसे स्थानीय निकाय नाम दिया गया है पर एक निकाय के लिए ऑफिस, स्टाफ, फर्नीचर जैसी चीजों की भी जरूरत पड़ती है। आज सरपंच पूरी पंचायत को अपने झोले में डाले घूमता रहता है। व्यवस्था न होने से जॉब कार्ड तक उसके झोले में ही रखा होता है।
निकायों को पहचान मिले
इतना पैसा आवंटित करने के बाद इन निकायों को एक पहचान देना इतना मुश्किल नहीं है। अगर चाहत होती तो काफी कुछ किया जा सकता था। इसलिए इनकी जवाबदेही तय करने के लिए किसी नए कानून की जरूरत नहीं है। कानून तो बने हुए हैं कि साल में चार बार मीटिंग होनी चाहिए पर कितनी मीटिंग हो पाती हैं? वे देखते हैं कि संसद-विधानसभाओं की नकल करने लगे हैं। इसलिए अगर पंचायत की मीटिंग नहीं हुई तो क्या हुआ। इधर के वर्षो में पंचायत चुनावों में भी उन्हीं अपेक्षाओं को लागू किए जाने की मांग उठी है जैसी संसद या विधानसभा के सदस्यों के चुनाव के सम्बंध में की जाती है पर मेरे विचार से इन दोनों चुनावों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। सबसे बड़ा अंतर तो यही है कि पंचायत चुनावों में जो उम्मीदवार खड़े होते हैं, उन्हें लगभग सभी मतदाता व्यक्तिगत तौर पर पहचानते हैं। दिक्कत यह है कि अपने समाज में उम्मीदवार के ऊपर जाति और राजनीति से सम्बंधित अपेक्षाएं लाद दी जाती हैं। यों भी चुनाव की प्रक्रियाएं ऐसी हो गई हैं कि उसमें कोई सही व्यक्ति चुन कर आ जाए, यह मुमकिन नहीं लगता।
ज्यादा परिवर्तन महिला प्रतिनिधित्व में
पंचायती राज के इस मौजूदा स्वरूप में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन महिलाओं के नेतृत्व के स्तर पर ही देखने को मिलता है। इसमें जो दलित प्रतिनिधित्व स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं दीखता। इधर, पंचायत चुनाव में पढ़े-लिखे नौजवानों की दिलचस्पी की वजह गांव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या पिछले 20 वर्षों में बढ़ी है। नई पीढ़ी के लोग गांवों का विकास करने या कुछ बदलाव लाने का संकल्प लेकर आ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में आर्थिक विकास हुआ है, वहां यह प्रवृत्ति ज्यादा है। कई जगहों पर अब यह बात होती है कि पंचायतों में काफी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। इसलिए उम्मीदवार पढ़ा-लिखा हो तो वह कुछ काम कर पाएगा। आदिवासी क्षेत्रों में युवा चूंकि सरकार और प्रशासन से इतने ऊब चुके हैं कि अब उन्हें बंदूक उठाने की जरूरत लगती है। इसलिए वहां की स्थिति कुछ भिन्न है। आज जब योजना आयोग 12वीं योजना पर काम कर रहा है, तो उसे इस बात पर ज्यादा ध्यान दिलाने की जरूरत है कि पंचायतों को अधिक सक्षम और समर्थ बनाने की दिशा में किस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए। 12वीं योजना में इस बिन्दु पर अलग से काम करने की जरूरत है। (राजेश टण्डन से राजेश चन्द्र की बातचीत पर आधारित)


कैसे बनें सक्रिय और सहभागी पंचायतें


भारत में पंचायती व्यवस्था का इतिहास 5000 वषों का है। पंचायत शासन का सबसे प्राचीन वर्णन ऋगवेद में है जिसके अनुसार स्थानीय शासन के निर्णय आपसी र्चचा और सहयोग से लिए जाते थे। समय के साथ पंचायती व्यवस्था में कुछ बदलाव आए परंतु इसके मूल में सहभागिता और विकेंद्रीकरण ही रहा। इस व्यवस्था पर अंग्रेजों ने चोट किया। इससे भारत की सदियों की पुरानी अकेंद्रित व सहभागी प्रक्रिया का अंत हो गया। आजादी के उपरांत संविधान निर्माताओं ने गांवों में सहभागी शासन प्रक्रिया कायम करने के लिए प्रदेश की सरकारों को ग्राम पंचायतों के गठन के लिए बाध्य किया। परंतु इस प्रयास का कोई स्पष्ट प्रभाव और प्रमाण नहीं दिखा। फलस्वरूप, 1992 में केंद्र सरकार ने संविधान में संशोधन कर एक नया अध्याय जोड़ा जिसके द्वारा पंचायत राज व्यवस्था संविधान का हिस्सा बन गया। परंतु इस बार भी पंचायती व्यवस्था को मजबूत करने का जिम्मा प्रदेश की सरकारों पर ही छोड़ दिया गया। यदि 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती संस्थाओं के कार्य व शक्तियां अनुसूची 7 में सम्मिलित कर परिभाषित कर दिया जाता तो आज पंचायती शासन व्यवस्था की तस्वीर एक सशक्त, विकेंद्रित व नागरिकों के प्रति जवाबदेह शासन की होती। प्रभावी एवं उत्तरदायी शासन व्यवस्था वही हो सकती है, जहां शासन की सभी इकाइयों को उनकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी व अधिकार क्षेत्रों में बांटा गया हो तथा एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप की गुंजाइश न हो। वित्तीय संसाधनों के बंटवारे के लिए नियम हों। हमारी त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था में सिर्फ केंद्र एवं राज्यों के अधिकार क्षेत्र तय हैं परंतु पंचायतों को इससे परे रखा गया है।
आम सहभागिता नहीं
यही कारण है कि आज शासन प्रक्रिया में आम लोगों की सहभागिता नहीं है, लोकतांत्रिक मूल्यों में लगातार गिरावट का सिलसिला है। 1993 में नए पंचायती राज कानून को लागू होने के बाद से देश के अधिकांश प्रदेशों ने अपने- अपने प्रदेशों में 73 वें संविधान संशोधन के अनुरूप व्यवस्था कर लिया है। फलस्वरूप पिछले 15 वर्षो में तीन बार पंचायतों के चुनाव हो चुके हैं। आज हमारे देश में 24 लाख ग्राम पंचायतें, 6000 ब्लाक समितियां व 500 जिला परिषदें कार्यरत हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत 96 प्रतिशत गांव व उनकी 99 प्रतिशत आबादी को शासन में हिस्सेदारी का मौका देती है। संविधान के अनुसार पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों की स्वशासित सरकार है। किंतु संविधान में पंचायतों की आर्थिक शक्तियां राज्य सरकारों की मर्जी पर छोड़ दी गई हैं। राज्यों में वित्त आयोग का गठन तो होता है किंतु आयोग की सलाह से राज्य सरकारें बाध्य नहीं होतीं। आज त्रिस्तरीय पंचायतें सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की आखिरी कड़ी बनकर रह गई है। पंचायत प्रतिनिधियों को नीति निर्धारण में कहीं भी सम्मिलित नहीं किया गया है।
अधिकारियों की दखल खत्म करें
राज्यों के बजट में पंचायतों के लिए कोई मद नहीं होता है। छोटे से छोटे काम करने के लिए पंचायतों को सरकारी अधिकारियों की अनुमति लेनी पड़ती है जबकि पंचायती व्यवस्था में अंतिम निर्णय लेने की अपार शक्तियां सरकारी अधिकारियों के पास हैं परंतु राज्य सरकारों ने अब सूचना के अधिकार के कानून के अधीन जनकायरे की जवाबदेही सरकारी पदाधिकारियों के बजाय पंचायती प्रतिनिधियों को तय कर दी है। हमारे देश में सिर्फ पंचायती प्रतिनिधि ही ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जिनको प्रशासनिक अधिकारी बर्खास्त कर सकते हैं। सरकारी अधिकारियों को प्रदत्त असीम अधिकार पंचायती संस्थानों की स्वायत्तता पर बहुत बड़ा अंकुश है। आज के परिवेश में सामान्यत: सरकारी अधिकारी निजी हित व स्वार्थ के लिए राजनीतिक आकाओं व सत्तारूढ़ पार्टी के हितों के अनुसार कार्य करते हैं। इस स्थिति में उन पंचायती प्रतिनिधियों की स्थिति बड़ी ही दर्दनाक होती है, जो सत्तारूढ़ पार्टी, स्थानीय सांसद व विधायक के करीबी नहीं होते।
सशक्तिकरण के आवश्यक सुझाव
ऊपर वर्णित तथ्यों के आलोक में पंचायती संस्थाएं और उनके जनप्रतिनिधि पंचायती व्यवस्था के प्रति निराश होते दिख रहे हैं। अत: इस बात की आवश्यकता है कि पंचायती व्यवस्था को सुसंगठित एवं सशक्त बनाने हेतु आवश्यक कानूनी परिवर्तन और संशोधन किया जाए। सुझाव में, अपने नीचे दिए गए बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है :- 1. ग्राम सभा को सक्रिय तथा अतिरिक्त शक्तियां प्रदान करना ग्राम सभा स्थानीय शासन की मूल वैधानिक इकाई है। ग्राम सभा की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार अनिवार्यत: होनी चाहिए। इसकी कानूनी जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की हो। बैठक नियमित नहीं बुलाए जाने पर ग्राम प्रधान को हटाने का प्रावधान भी जोड़ा जा सकता है। ग्राम सभा के प्रस्तावों पर पंचायती संस्थाओं को त्वरित कार्रवाई के लिए बाध्य करना होगा। त्रिस्तरीय पंचायत ग्राम सभा द्वारा निर्देशित, संचालित व नियंत्रित होना चाहिए। ग्राम सभा को कार्य-योजनाओं को बनाने, प्रस्तावित करने, वित्तीय मंजूरी देने संतोषजनक कार्य पूर्णता-प्रमाणपत्र जारी करने और सार्वजनिक कामों के सामाजिक अंकेक्षण का संपूर्ण अधिकार होना चाहिए। ग्राम सभा की निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए अनुशंसा करने का भी अधिकार होना चाहिए।
2. कार्य के सम्बन्ध में केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तर्ज पर पंचायती संस्थाओं और राज्य सरकार के बीच में भी कार्य अधिकार क्षेत्र का विभाजन आवश्यक है। पंचायती संस्थाओं में कार्य अधिकार क्षेत्र में राज्य सरकार को नीति-निर्धारण तक ही सीमित रहना चाहिए। राज्य सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र संविधान की 11वीं अनुसूची में अनुसूची के 29 विषय पंचायती राज संस्थाओं को वैधानिक रूप से सौंप देना चाहिए। इसके अतिरिक्त निधि, कार्मिक व कार्य भी वैधानिक रूप से स्थानांतरित करना आवश्यक होगा। त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्थाओं में तीनों पंचायत संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर स्थानीय सरकार हैं। इसलिए तीनों का दर्जा समानांतर होना चाहिए।
3. पंचायती संस्थाओं की आर्थिक स्वायत्तता पंचायती संस्थाएं विकेंद्रित सत्ता की मूल इकाई है। अत: राज्य के बजट में इनका विशेष प्रावधान आवश्यक है। (क) अबद्ध निधि यूनाइटेडफेड- यह राज्य सरकार द्वारा एकत्र किए गए कुल राजस्व का 50 प्रतिशत हो जिससे स्थानीय सरकार विकास व कल्याण का कार्यक्रम बना सके। (ख) विकास और कल्याण कार्यों स्कीमों में लोन या ग्रांट की कुल राशि राज्य सरकार द्वारा सीधे पंचायती संस्थाओं को दी जाए। (ग) वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार केंद्र सरकार पंचायती संस्थाओं को वित्तीय संसाधन मुहैया करे। (घ) केंद्रीय कार्यक्रमों का पैसा सीधे पंचायतों को मिले। पंचायती संस्थाओं की आर्थिक जवाबदेही के लिए एक अलग संस्था का निर्माण किया जाए। यह संस्था राज्य के मुख्य लेखाकार की तर्ज पर हो सकती है। पंचायती संस्थानों के वित्तीय अंकेक्षण की जिम्मेदारी ‘मुख्य लेखाकार स्थानीय सरकार’ की होगी।
4. पंचायती संस्थाओं के लिए कमर्चारियों की अलग श्रेणी बनाई जानी चाहिए। हर एक स्तर पर कार्यालय की व्यवस्था होनी चाहिए। जिला योजना कमेटी को संविधान के अनुसार अर्थपूर्ण बनाना होगा जिससे वह जिले के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सके। ऐसे कई आवश्यक सुधारों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए पंचायती राज व्यवस्था को और सशक्त किए जाने की आवश्यकता है। गांधी की सपनों की पंचायत व्यवस्था को मूर्त रूप देने में अभी लम्बी दूरी तय करनी है। गांधी जी चाहते थे कि भारत में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना हो। इसलिए उन्होंने कहा था,सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए 20 व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जा सकता। उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा।


टंकी में एसिड तो नल में कहां से आएगा शुद्ध जल


पंचायती राज भारत के युवा वर्ग की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन जाए इससे श्रेष्ठतम स्थिति इस देश के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। पर ऐसा होने के हालात कम से कम मौजूदा स्थिति में तो दिखा’ नहीं देते। अपनी रोजी-रोटी तथा सामान्य सुख की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भी युवा वर्ग पलायन करके शहरों की ओर भागता है और धीरे-धीरे गांव से वह दूर होता चला जाता है। अगर कोई युवा ‘नॉस्टेल्जिया’ में गांव लौटने की कोशिश भी करता है, तो उसे अंतत: निराशा हाथ लगती है। ऐसे न जाने कितनी संख्या में युवा गांव लौटे लेकिन उन्हें फिर शहरों की ओर रुख करना पड़ा। पंचायती राज की सफलता का ढिंढोरा पीटने वाली वर्तमान केंद्र व राज्य सरकारें तथा इनके सुर में ताल मिलाने वाले पाखंडी एनजीओ (गैर सरकारी संस्थाएं) कभी दारुण सच स्वीकार नहीं कर सकते। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि अगर पंचायती राज इतना ही सफल है तो युवा गांवों में क्यों नहीं टिक पाता? 1993 में पंचायती राज को संविधान का भाग बनाए जाने के बाद गांवों से शहरों की ओर पलायन, शहरों की बढ़ती आबादी व गांवों की घटती आबादी की गणना करें तो तस्वीर आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी।
गांव बने मजबूरी के पर्याय
वास्तव में प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर मैं प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूं कि पूरे देश में कोई भी एक युवक सहज रूप में गांव में अपना जीवन बिताना नहीं चाहता। गांव में वही रहता है जिसकी कोई मजबूरी हो। पंचायतीराज कानून लागू होने के 18 वर्षो बाद भी गांवों का मजबूरी का पर्याय बना रहना इसकी विफलता का प्रमाण नहीं तो और क्या है? हमारे देश में 15 से 35 वर्ष की आयु की आबादी करीब 65 प्रतिशत है। जाहिर है, पंचायती राज इतनी बड़ी आबादी की चाहतों को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करने वाला ही होना चाहिए। यह तभी सम्भव होता जब आजादी के बाद भारत की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए यहां की राजनीतिक, आर्थिक संरचना का पुनर्निर्माण किया जाता। हमारे नीतिनि र्माताओं ने ग्राम पंचायत पण्राली को समूची राजनीतिक पण्राली के अंग के रूप में स्वीकार किया। यह वैसे ही है जैसे अट्टालिका के अंदर एक झोपड़ी बनाकर उसे अपने आत्मसंयम एवं आदर्श का नमूना बताना। ग्राम पंचायत पूरी व्यवस्था है। गांधी जी ने भारत के लिए जिस ग्राम स्वराज का लक्ष्य निर्धारित किया, संसदीय लोकतंत्र व्यवहार में उसका विरोधी है। इसीलिए उन्होंने संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हुए इसे त्याज्य घोषित किया था। हां, परतंत्रता से स्वतंत्रता के संक्रमण के दौर तक के लिए इस संसदीय व्यवस्था के प्रति उनकी सहमति हो सकती थी। पंचायत व्यवस्था में शक्ति नीचे से ऊपर जानी थी, न कि ऊपर से नीचे।
शिक्षा से ही कटा मूलाधार
गांव ही व्यवस्था का केंद्र एवं स्रेत हो सकता है, गांधी सहित ज्यादातर मनीषी इस बात पर एकमत थे। भारत (केवल वर्तमान भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि स्वतंत्रतापूर्व) का मूलाधार ही गांव है। जो राजनीतिक और आर्थिक पण्राली हमने अंगीकार की है उसमें स्वभाविक रूप से गांवों के प्रति विकर्षण एवं शहरों की ओर आकर्षण, गांवों के क्षरण एवं शहरों के उन्नयन.. का दानवी चरित्र हावी रहा। आजादी के दो-ढाई दशकों तक तो फिर भी पुराने शिक्षकों एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि के नेताओं के कारण शिक्षा में गांव, खेती, ग्रामीण संसाधनों से जुड़ी हस्तकलाएं, कताई, बुनाई, सिंचाई, पशुपालन आदि विद्यमान थे, ग्रामीण पृष्ठभूमि के परम्परागत खेलों तक को वरीयता मिलती थी, लेकिन 1980 का दशक आते-आते यह तेजी से ओझल होने लगा और 1990 के दशक तक पाठ्यक्रमों और अन्य गतिविधियों से ये पहलू समाप्त होते चले गए।
युवा आकांक्षा को जानने की जरूरत
हम जिस युवा आकांक्षा की बात करते हैं वह है क्या? पिछले दस सालों की युवा चाहत सम्बंधी सव्रेक्षण उठा लीजिए, शहरों में एक अदद ठीक नौकरी, अच्छा घर, भोग के साधन..यही तो उनका आदर्श है। यानी अधिकतर युवाओें की चाहतों और गांवों के संदर्भ में चुम्बक के समान ध्रुव की स्थिति है। अगर गांवों की मूल कल्पना के अनुरूप हमारी राजनीतिक, आर्थिक और इसको पोषित करने वाली शिक्षा पण्राली विकसित की जाती तो युवाओं के संस्कार उसी अनुरूप विकसित होते और उनकी आकांक्षाएं भी गांव केंद्रित हो सकती थीं। गांधी जी ने 7 नवम्बर 1929 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा ‘‘हम एक ऊंची ग्राम सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे देश की विशालता, आबादी की विशालता और हमारी भूमि की स्थिति तथा आब ओ-हवा ने, मेरी राय में, मानो यह तय कर दिया है कि उसकी सभ्यता ग्राम सभ्यता ही होगी। उसके दोष तो मशहूर हैं, लेकिन उनमें कोई ऐसा नहीं है जिसका इलाज न हो सकता हो। इस सभ्यता को मिटा कर उसकी जगह दूसरी सभ्यता को जमाना मुझे तो अशक्य मालूम होता है। ...यह मानकर कि हम लोगों को मौजूदा ग्राम सभ्यता ही कायम रखना है और उसके माने हुए दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना है, मैं उन दोषों के इलाज सुझा सकता हूं। लेकिन इन इलाजों का उपयोग तभी हो सकता है जबकि देश का युवक वर्ग ग्राम जीवन को अपना ले। और अगर वे ऐसा करना चाहते हों, तो उन्हें अपने जीवन का तौर-तरीका बदलना चाहिए और अपनी छुट्टियों का हर एक दिन अपने कॉलेज या हाईस्कूल के आसपास के गांवों में बिताना चाहिए, और जो लोग अपनी शिक्षा पूरी कर चुके हों या जो शिक्षा ले ही न रहे हों, उन्हें गांवों में बसने का इरादा कर लेना चाहिए।’
निर्माण में मुख्य भूमिका युवाओं
की गांधी जी की बातों को गहराई से देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि वे ब्रिटिशकालीन शिक्षा व्यवस्था में युवकों के गांवों से बिल्कुल बिछुड़ जाने का तत्व देख चुके थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षित युवाओें के लिए गांवों में बसने का आदर्श दिया। विनोबा भावे ने तो वर्षो पहले गांवों को ‘गोबर’ की संज्ञा दे दी थी। जयप्रकाश नारायण ने भी गांवों के पतन को महसूस किया था। लेकिन सबका मानना था कि आपसी सहकार और प्रेम के तत्व गांवों में अब भी मौजूद हैं जिनको केंद्र बनाकर ही सच्चे भारत का पुनर्निर्माण किया जा सकता है। निर्माण में मुख्य भूमिका तो युवाओं की ही हो सकती है।
पर छूमंतर हुई पंचायती राज की परिकल्पना
लेकिन पंचायतराज उस कल्पना की ग्राम व्यवस्था नहीं है। यह ऐसी राज व्यवस्था का अंग है जो अधिक से अधिक धन संग्रह, उपभोग सामग्रियों की संग्रह क्षमता.. आदि का आदर्श समाज के मनोविज्ञान में स्थापित कर चुका है। हमारे नीति-निर्माता जिस युवक वर्ग का महिमामंडन करते हैं वे कौन हैं? अगर एक सिनेमा का कलाकार या खिलाड़ी युवाओं का आदर्श होगा तो फिर कोई युवा किसान बनकर कठोर-परिश्रमी जीवन जीने की प्रेरणा कहां से पा सकता है। इसलिए सरकार या आम समाज किसी भी सूरत में वर्तमान व्यवस्था (जिसे व्ययवस्था कहना ही ठीक नहीं) में गांवों के माध्यम से खासकर पढ़े-लिखे युवाओं की चाहतों को पूरा नहीं कर सकता। हां, इसके नाम पर अनेक कार्यक्रम चलाकर सरकारें पाखंड अवश्य कर रहीं हैं।
विकेंद्रीकरण से मिली ताकत का हस्र
विकेंद्रीकरण के नाम पर पंचायतों को जितनी ताकत मिली उसका हस्र वही हुआ जैसे उसके ऊपर के सत्ता केंद्रों का हुआ है। जिस तरह संसद एवं राज्य विधायिकाएं सत्ता, शक्ति, संसाधन के स्रेत बने उसी तरह पंचायती राज के पद भी। जो लोग प्ांचायती राज को जनाकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करने वाली वास्तविक जन इकाई मानते हुए महिमामंडन करते नहीं थकते, उन्हें करीब डेढ़ महीने तक चलने वाले बिहार पंचायत चुनाव की तस्वीरें अवश्य देखनी चाहिए थीं। यकीन मानिए, पंचायत चुनाव की तस्वीर देखकर ऐसे लोग अपना सिर पकड़कर बैठ जाएंगे।
धन मारने की शुरू हो गई होड़
लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में बाहुबल का प्रभाव अवश्य कम हुआ है, चुनाव आयोग की अभूतपूर्व सख्ती से धनबल से मतदाताओं को प्रभावित करने की प्रत्यक्ष कोशिशें भी कम हुई हैं, पर पंचायतीराज चुनाव इन सारी विकृतियों के प्रचंड अंगीकरण का साक्षात् अवतार बना हुआ है। धनबल और बाहुबल का वर्चस्व कोई भी देख सकता है। कुछ अपवाद अवश्य हैं, पर सच यही है कि पंचायत में एक मुखिया का चुनाव जीतने के लिए कई-कई लाख खर्च हो रहे हैं। प्रखंड प्रमुख के लिए तो बाजाब्ता बोलियां लगतीं हैं। डंडे, तलवार और गोलियां चलती हैं। पंचायतीराज की संस्थाओं के हाथों धन आ गए हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा इस बात की है कि कौन उसमें से कितना हिस्सा मार सकता है। ग्राम केंद्रित व्यवस्था का अर्थ, स्थानीय संसाधन और आवश्यकता के आधार पर परस्पर सहकार से विकसित स्वावलम्बी आत्मसंयमी समाज, यह जितना बुजुगरे के लिए है उतना ही युवाओं के लिए भी। वर्तमान पंचायतीराज की तो कल्पना में भी यह आदर्श नहीं है। वर्तमान पंचायती व्यवस्था से ऐसी उम्मीद करना टंकी में एसिड भरकर नीचे नल से शुद्ध पानी लेने की कल्पना है। यह व्यवस्था तो ऐसे प्रयोग तक को खा जाती है। जयप्रकाश नारायण ने बिहार के मुसहरी में सवरेदयी सहयोगियों के साथ ग्रामसभा का प्रयोग किया जिससे हथियार लेकर विद्रोह करने वाले युवा अहिंसा के रास्ते आए, लेकिन वर्तमान पंचायती राज उसे लील गया। वस्तुत: इसके लिए तो युवाओं कस्था को ग्राम केंद्रित बनाना होगा।