Wednesday, December 14, 2011

शहरी गरीबों को घर देना चाहते हैं पीएम


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शहरी विकास योजनाओं में गरीबों के लिए घर बनाने पर बल दिया है और आर्थिक रूप से कमजोर व कम आय वर्ग के लोगों के आवास ऋण पर सरकारी गारंटी के लिए जल्दी ही 1,000 करोड़ रुपए का एक सरकारी गारंटी कोष स्थापित करने का भरोसा दिया है। प्रधानमंत्री मनामोहन सिंह ने मंगलवार को यहां जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनयूआरएम) पर राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, ‘शहरी विकास की किसी भी रणनीति में गरीबों के लिए आवासीय सुविधाओं का विकास बहुत जरूरी है।प्रधानमंत्री ने कहा कि नगर नियोजकों को सोच का पुराना ढर्रा छोड़ना होगा। पुरानी वृहद योजनाओं में गरीबों के आवास और रोजगार की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता था। उन्होंने कहा गरीबों के लिए आवासीय सुविधाओं के विकास को विकास शहरी विकास की किसी भी रणनीति का अहम हिस्सा बनाना होगा। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि इसी वित्त वर्ष में सरकार गरीबों को कर्ज की सुविधा दिलाने के लिए 1,000 करोड़ रुपए का एक क्रेडिट रिस्क गारंटी कोष स्थापित करेगी। उन्होंने शहरी गरीबों को खुद का आवास सुलभ कराने और शहरों को मलिन बस्तियों से मुक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा इसी साल शुरू की गई राजीव आवास योजना की सफलता के लिए गरीबों को बैंक ऋण की सुविधा दिलाना बहुत जरूरी है। सिंह ने कहा,‘बैंकों को आर्थिक रूप से कमजोर वगरे और निम्न आयवर्ग वाले समूह के लोगों को पर्याप्त मात्रा में ऋण सहायता देने को प्रोत्साहित करने के लिए हम चालू वित्त वर्ष में ही 1,000 करोड़ रुपए का एक क्रेडिट रिस्क गारंटी कोष स्थापित करने का विचार कर रहे हैं।एक दिन के इस सम्मेलन का आयोजन शहरी विकास और आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय ने मिल कर किया था। सिंह ने जानुरम के अगले चरण में क्षेत्रीय विकास का समन्वित और व्यापक दृष्टिकोण अपनाने पर भी बल दिया। हमें ऐसी स्थिति बनानी चहिए जिसमें शहरी भारत में निवेश बढ़े, विनिर्माण और मूल्यवर्धित सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढें़।उन्होंने यह भी कहा कि अगले चरण में नगर निकायों के राजस्व में वृद्धि करना एक बड़ी चुनौती होगी। इस सम्बंध में उन्होंने डा. ईशर अहलुवालिया समिति की सिफारिशों का उल्लेख किया जिसमें नगरपालिकाओं का अलग से कुछ कर लगाने का अधिकार देने के लिए संविधान में संशोधन का भी सुझाव दिया गया है। सिंह ने कहा कि इन सुझावों पर विस्तार से चर्चा की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने नगरपालिकाओं की व्यवस्था में सुधार पर जोर देते हुए कहा,‘यह साफ हो चुका है कि शहरों का कायाकल्प करने की जो भी महत्वपूर्ण कड़ियां हैं उनमें शासन प्रशासन की कड़ी सबसे कमजोर है।
प्रधानमंत्री ने नगरपालिकाओं के शासन प्रशासन में सुधार के लिए नगर नियोजन, प्रबंध तथा वित्त के क्षेत्र में प्रशिक्षण कार्यक्र म चलाने के साथ साथ इंजीनियर तथा चार्टड एकाउंटेंट्स जैसे पेशेवरों की सलाह लेने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि तीव नगरीकरण स्वाभाविक है। आर्थिक वृद्धि तेज होने से इसकी गति और बढेगी तथा शहरी आबादी मौजूदा 37.7 करोड़ से बढ़कर 2031 तक 60 करोड़ हो जाएगी। उन्होंने कहा,‘महानगरों की योजना पर ध्यान देना बहुत जरूरी हो गया है। इसमें सम्पर्क सुविधाओं का विस्तार, सड़कों, एक्सप्रेसवे- हाईवे और ऊर्जा की बचत करने वाली अच्छी सार्वजनिक परिवहन पण्राली तथा गरीबों के लिए आवास पर ध्यान देना होगा।
समारोह में शहरी आवास एवं शहरी विकास मंत्री कुमारी शैलजा ने कहा कि शहरों में गरीबों के लिए सस्ते आवास मुहैया कराने की योजना में मुकदमेबाजी से मुक्त जमीन और गरीबों के लिए बैंक ऋण की उपब्धता बड़ी चुनौती है। शहरी विकास मंत्री कमलनाथ ने कहा कि राज्यों के साथ चर्चा के बाद इस मिशन के अगले चरण की योजना 3-4 माह में तैयार कर ली जाएगी।

Friday, December 2, 2011

मनरेगा में एक करोड़ की रिकवरी का आदेश


गोंडा जिले में मनरेगा के तहत प्रतिबंधित इंटरलॉकिंग के मामले में एक करोड़ रुपये की रिकवरी का आदेश बुधवार को जारी हो गया। यह वसूली बभनजोत ब्लॉक के बीडीओ, एडीओ पंचायत, कार्यप्रभारी, तकनीकी सहायक व सहायक लेखाकार से की जानी है। इनके खिलाफ गबन की तहरीर खोड़ारे पुलिस को दी गई है। मनरेगा धन के गबन के आरोप में उक्त ब्लॉक के तकनीकी सहायक को बर्खास्त कर दिया गया। कार्यप्रभारी बोरिंग टेक्नीशियन को भी निलंबित कर दिया गया। सहायक लेखाकार के निलंबन की संस्तुति शासन को भेजी गई है। बभनजोत ब्लॉक को वर्ष 2011-12 में मनरेगा में एक करोड़ 93 लाख रुपये डीआरडीए ने दिए। बीडीओ ने प्रतिबंधित इंटरलॉकिंग का कार्य करा दिया। इस मामले में बीडीओ रामजीत प्रसाद व एडीओ पंचायत रंग बहादुर सिंह को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद संबंधित कार्यो की जांच तीन अधिशासी अभियंताओं की टीम से कराई गई। जांच में पाया गया कि पंद्रह परियोजनाओं पर बगैर कार्य कराये 40 लाख रुपये निकाल लिए गए। अन्य परियोजनाओं पर 57 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया। इंटरलॉकिंग की ईट की गुणवत्ता ठीक नहीं मिली। अन्य दो परियोजनाओं पर भी अधिक धन का भुगतान हुआ। बुधवार को डीएम राम बहादुर ने गबन की रिपोर्ट लिखाने व रिकवरी का आदेश परियोजना निदेशक डीआरडीए को दिया। सहायक लेखाकार चंद्रिका प्रसाद जायसवाल के निलंबन की संस्तुति शासन को भेज दी। परियोजना निदेशक विवेक त्रिपाठी ने तकनीकी सहायक हीरालाल को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया। कार्यप्रभारी बोरिंग टेक्नीशियन सुशील कुमार को निलंबित कर दिया गया है।

Friday, November 25, 2011

यूपी के मनरेगा कैलेंडर में 403 दिनों का साल!


साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के कैलेंडर में साल में 400 से अधिक दिन होते हैं। चौंकिए मत! यह सच है। तभी तो उत्तर प्रदेश के मनरेगा के एक मजदूर ने साल भर में 403 दिन की मजदूरी की और उसकी मजदूरी का भुगतान भी हुआ। जबकि मनरेगा में 100 दिनों से ज्यादा का रोजगार नहीं है। राज्य मनरेगा में इस तरह का गड़बड़झाला एक दो जिलों में नहीं बल्कि 30 जिलों में पाया गया है, जहां 400 दिनों तक कार्य दिखाया गया है। सीईजीसी ने मनरेगा के मजदूरों के नाम पर फर्जी मस्टर रोल की जांच की है। उन्होंने अपनी विस्तृत रिपोर्ट केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को सौंपी है। केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद (सीईजीसी) के सदस्य संजय दीक्षित ने अपनी जांच रिपोर्ट में राज्य के तीस जिलों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि 90 फीसदी जॉब कार्ड वाले मजदूरों को काम नहीं मिला है। अफसरों, ग्राम प्रधान और सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं की मिलीभगत से फर्जी भुगतान कराए गए हैं। दरअसल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के प्रावधानों के मुताबिक प्रत्येक जॉब कार्ड वाले परिवार को एक साल में अधिकतम 100 दिनों तक का काम दिया जा सकता है। दीक्षित ने उत्तर प्रदेश और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर जांच की है। दीक्षित के मुताबिक राज्य के 30 जिलों में फर्जी मस्टर रोल बनाकर भुगतान कराने के प्रमाण हैं। जांच रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले के बल्दीराय ब्लॉक में उस्कामऊ गांव के नौशाद ने 403 दिनों तक कार्य किया है। इसी गांव के केशव समेत कई लोगों ने सौ से अधिक दिनों तक कार्य किया है। गाजीपुर जिले के सैदपुर और सादात ब्लॉक में फर्जी मस्टर रोल बनाने का मामला सामने आया है। उल्लेखनीय है कि इसी जिले में कथित दागी सीडीओ राजबहादुर तैनात हैं। यहां पर अधिकतम 330 दिनों की मजदूरी का भुगतान कराया गया है। यहां सैदपुर ब्लॉक के इचवल गांव में 22 लोगों ने 102 से लेकर 330 दिनों तक कार्य किया है। जौनपुर में 231 दिन, महोबा में 150 दिन, मिर्जापुर में 241 दिन, सोनभद्र में 159 दिन, फैजाबाद में 233 दिन, आजमगढ़ जिले लालगंज और तरवां ब्लॉक में 151 दिनों से लेकर 301 दिनों तक कार्य कराए गए हैं। बलिया में 188 कार्य दिवस तक कार्य कराए गए हैं। राज्य मनरेगा में भ्रष्टाचार का यह अपने आप में अनूठा नमूना है। उत्तर प्रदेश मनरेगा में गड़बड़ी पर सवाल खड़ा करते हुए सीईजीसी सदस्य ने कार्रवाई की मांग की है।

Wednesday, November 23, 2011

चेतावनी के साथ यूपी को मिले 1200 करोड़


मनरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर केंद्र व राज्य सरकार में मची रार के बीच ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी चेतावनी के साथ 1200 करोड़ की एक और किश्त जारी कर दी। केंद्र ने सख्त लहजे में कहा है कि चालू वित्त वर्ष की अंतिम किश्त के लिए राज्य को दागी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करनी ही होगी। कार्रवाई की सूची हर हाल में 10 दिसंबर तक केंद्र को सौंपनी होगी। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने राज्य सरकार को लिखे पत्र के साथ यह चेतावनी जारी की है। उत्तर प्रदेश को चालू वर्ष के दौरान 1200 करोड़ रुपये की यह तीसरी किश्त है। जयराम ने राज्य सरकार को पूरे साल का ब्योरा देते हुए भ्रष्ट और अनियमितता करने वालों के खिलाफ अब तक कार्रवाई न करने पर जमकर कोसा भी है। मनरेगा में भ्रष्टाचार पर घुली कड़वाहट के बाद भी केंद्र योजना की किश्तें रोकने की हिम्मत नहीं जुटा सका है। जयराम ने मायावती को लिखे अपने पहले पत्र में भी कहा था कि मनरेगा के भ्रष्टाचार की सीबीआइ जांच ही एकमात्र विकल्प है। वह भ्रष्टाचार ग्रस्त जिलों के आवंटन को रोक भी सकते हैं, लेकिन इससे सिर्फ गरीबों का नुकसान होगा। हालांकि केंद्र सरकार के इस रुख को राज्य में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक मजबूरी से जोड़कर देखा जा रहा है। यही वजह है कि जयराम ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद को लिखे पत्र में उनसे कहा है कि सार्वजनिक धनराशि में घपला और घोटाला करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के मद्देनजर लंबित शिकायतों पर कार्रवाई होनी चाहिए। जयराम ने दद्दू प्रसाद को चेतावनी के लहजे में लिखा है कि मनरेगा कार्यक्रम के लिए केंद्रीय मदद की अगली किश्त लेने के पहले राज्य सरकार को अपने आश्वासनों को पूरा करना होगा। यानी पूरी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। तथ्य यह है कि पिछले वित्त वर्ष 2010-11 के दौरान उत्तर प्रदेश को मनरेगा के मद 5267 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद उपलब्ध कराई गई थी। जबकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान अब तक राज्य को पहली किश्त के रूप में 1000 करोड़, दूसरी किश्त 1349 करोड़ और तीसरी किश्त 1200 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

Saturday, October 15, 2011

पंजाब में गरीबों के प्लाट आवंटन में फर्जीवाड़ा


पंजाब अर्बन डवलपमेंट अथारिटी (पुडा) द्वारा बेघरों को 25-25 गज के प्लाट आवंटन में फर्जीवाड़ा हुआ है। पुडा ने खुद ही उजाड़े गए लोगों की सूची को नजरंदाज कर अज्ञात लोगों को प्लाट आवंटित कर दिए। इनमें सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो बठिंडा में नहीं बल्कि यूपी, बिहार, राजस्थान व मध्य प्रदेश में रह रहे हैं। उन्हें अलाट किए प्लाटों में दस साल से उजाड़े से प्रभावित दूसरे परिवार रह रहे हैं। आरटीआइ के तहत यह खुलासा हुआ है। 2001-02 में पुडा ने विकास के नाम पर माडल टाउन,शास्त्री नगर और बेअंत नहर में छह सौ मकान व छह सौ झुग्गियों को तोड़ा था। पीडि़तों ने आक्रोश जताया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2004, 05 06 में तीन बार पीडि़त परिवारों का सर्वे कराया और 1,296 परिवारों को चिन्हित किया, जिन्हें 25-25 गज के प्लाट आवंटित करने पर सहमति बनी। पुडा ने प्लाट काटकर प्रति परिवार से 250 रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ आवेदन मांगे। अकाली भाजपा गठबंधन सत्ता में आने के बाद भी गरीबों प्लाट नहीं मिल सके। जानकारी के अनुसार, 2000 से 2009 तक 25-25 गज की 502 साइटें अलाट की जा चुकी हैं। कुल 1,296 में से लगभग 1057 लोगों को अलोकेशन लेटर जारी हो चुके हैं। 239 को अलोकेशन लेटर जारी नहीं हुआ। इसमें भी कई गड़बड़ी है। पुडा के अनुसार 502 लोगों को प्लाट अलाट कर दिया है, लेकिन अलाटमेंट सूची व सर्वे सूची के हिसाब से महज 204 ही ऐसे लोग हैं, जो प्रभावितों की श्रेणी में आते हैं। उनमें से लगभग 50 परिवार इस वक्तउनके नाम से अलाट प्लाट पर काबिज नहीं है।

Friday, October 14, 2011

कब बहुरेंगे बुंदेलखंड के दिन


इसे बुंदेलखंड की बदकिस्मती कहें या कुछ और मगर यह सच है कि आज यह समूचा क्षेत्र इंसानों की मंडी में तब्दील होता जा रहा है। बेरोजगारी और सूखे की मार से बेहाल यहां के गरीब खुद ही अपनी बोली लगाने हेतु मजबूर हैं। सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी के चलते विशेष पैकेज और 100 दिन काम की गारंटी देने वाली मनरेगा भी यहां नाकाम साबित हो रही है। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के सात जिलों झांसी, जालौन, हमीरपुर, ललितपुर, बांदा, महोबा व चित्रकूट में कामगारों के हालात बेहद खराब हैं। कई वर्षो से पड़ रहे सूखे की वजह से यहां के गरीब कर्ज के बोझ तले दब गए हैं। करीब 60 हजार किसानों या कामगारों पर दो अरब से ज्यादा का सरकारी कर्ज लद गया है। जाहिर सी बात है यदि वे इसे चुकाने में असमर्थ होते हैं तो आत्महत्या करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं होगा। इसी वजह से विगत कई वर्षो से यहां के लोगों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यहां की गरीबी का अंदाजा तो इसी बात से हो जाता है कि सुबह होते ही यहां के कामगार फावड़ा-कुदाल हाथों में लिए इंसानों की मंडी में जुटने लगते हैंद्य। यदि कोई बड़ा ठेकेदार या सेठ मिल जाए तो दो जून की रोटी की व्यवस्था हो जाती है नहीं तो इन्हें सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा में काम पाने की आस होती है। मगर यहां भी इनके साथ छलावा होता है और कुछ दिनों तक मजदूरी करवाकर इन्हें निकाल दिया जाता है। मनरेगा के तहत मिलने वाले पारिश्रमिक में भी गरीबों का हक मारा जाता है। गर्मी के दिनों में जितना पलायन बुंदेलखंड से होता है शायद ही कहीं और से होता हो। पेट की आग बुझाने के लिए काम की तलाश में पूरे के पूरे गांव मैंने खुद खाली होते देखे हैं। कहीं-कहीं तो तन ढंकने को कपड़े तक मयस्सर नहीं हैं यहां गरीबी और भूख का ऐसा मेल आपको कहीं देखने को नहीं मिलेगा। कहते हैं- भूखे पेट भजन न होय गोपाला, लेकिन यहां भूखे पेट ही गोपाल की याद ज्यादा सताती है। बंधुआ मजदूरी यहां का आम चलन बन गया है। ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के सामने ये परिस्थितियां अचानक उत्पन्न हुई हैं। दरअसल, इनके पीछे 50 वर्षो से जारी शोषण और सत्ता का दंभ रहा है। वर्तमान में आर्थिक बदहाली के कगार पर खड़ा बुंदेलखंड नेताओं की नूरा-कुश्ती का अखाड़ा बन गया है। और हो भी क्यों न आखिर बुंदेलखंड क्षेत्र में विधानसभा की 21 और लोकसभा की 4 सीटें सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जहां बुंदेलखंड को सियासी रूप से विशेष महत्व देते हुए लगातार दौरे करते रहे हैं, वहीं मायावती सरकार के आधा दर्जन मंत्री इसी क्षेत्र से होने के बाद भी यहां की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया है। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, पलायन की मार और पानी की किल्लत झेलती यहां की पांच करोड़ जनता राजनीतिक दलों के हाथों का खिलौना बनने को मजबूर है। वहीं जाति विद्वेष के जहर में जकड़ा बुंदेलखंड आज भी संकीर्ण मानसिकता को पोषित कर रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां आज भी सामंतवाद अपनी जड़ों के साथ मौजूद है, जिसकी वजह से यह क्षेत्र अपने में ही सिमटकर रह गया है। पिछले 50 वर्षो से अलग बुंदेलखंड प्रांत की मांग जब तब उठती रही है। हालांकि अलग प्रांत की मांग में राजनीति ज्यादा हुई है, जिसने यहां के निवासियों का हक मारा ही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में बुंदेलखंड के विकास हेतु 7266 करोड़ के विशेष पैकेज को स्वीकृति दी थी। इसमें से 3506 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश के सात जिलों के लिए स्वीकृत था मगर आज वही सात जिले जस की तस वाली स्थिति में हैं। प्रति वर्ष केंद्र तथा राज्य सरकार सूखे की विकटता से निपटने हेतु करोड़ों रुपये की धन राशि स्वीकृत करती हैं मगर वह करोड़ों रुपये कहां जाते हैं और उनसे विकास के क्या कार्य होते हैं यह किसी को नहीं पता? बंजर एवं पथरीली भूमि को उपजाऊ बनाने और कृषि हेतु सिंचाई की समुचित व्यवस्था के लिए सरकारें प्रति वर्ष दावे तो बड़े-बड़े करती हैं किंतु सरकारी दावे कभी अंजाम तक नहीं पहुंच पाते। बुंदेलखंड में शिक्षा का स्तर भी काफी पिछड़ा हुआ है जिसकी वजह से यहां के निवासी अपने हक के लिए आवाज तक नहीं उठा पाते। ग्रामीण परिवेश की अधिकता से परिपूर्ण इस क्षेत्र में पिछड़ेपन का मूल कारण भी अशिक्षा ही है जिसके लिए सरकार का रवैया काफी उदासीन रहा है। इस वर्ष मई में अपनी पहली बुंदेलखंड यात्रा के दौरान मनमोहन ने विकास की घोषणाओं की झड़ी लगा दी। वह सूखे से निपटने के लिए 200 करोड रुपये के प्रस्ताव और बुंदेलखंड की सात लाख हेक्टेयर भूमि को उपजाऊ बनाने का वादा कर गए। हालांकि उन्होंने जो भी घोषणाएं कीं, वे क्षेत्र के विकास हेतु अवश्यंभावी हैं, पर उनका सही क्रियान्वयन संदेह के घेरे में है। चूंकि केंद्र और राज्य सरकार का टकराव जगजाहिर है, इसलिए विकास की नीति पर राजनीति का साया पड़ना लाजमी है। प्रधानमंत्री के साथ आए राहुल गांधी के निशाने पर हमेशा की तरह मायावती रहीं। मायावती ने भी केंद्र पर जमकर निशाना साधा। ताज्जुब होता है कि जो मायावती सीबीआइ जांच से बचने के लिए कांग्रेस को जब तब समर्थन देती रहती हैं वह प्रदेश के विकास की बात आते ही राजनीति पर उतर आती हैं। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी दल पुन: क्षेत्र को राजनीति का अखाड़ा बनाने पर आमादा हैं। राज्य सरकार से लेकर केंद्र तक सभी यहां की जनता से लुभावने वादे कर रहे हैं। कभी कांग्रेस तो वर्तमान में बसपा का गढ़ इस क्षेत्र में सभी राजनीतिक दलों की आंखें गड़ी हैं। भाजपा ने वोट बैंक की राजनीति के तहत उमा को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी है जो किसी भी वक्त बुंदेलखंड का रुख कर सकतीं हैं। चूंकि उमा लोध जाति से हैं और बुंदेलखंड से उनका पुराना नाता रहा है। इसलिए भी उनकी क्षेत्र में उपस्थिति से भाजपा अपना वोट बैंक मजबूत मान रही है। बसपा ने तो अपने कई दिग्गज मंत्रियों और विधायकों को पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंप दी है। सपा ने भी अपने खास सिपहसालारों से क्षेत्र में जनता के बीच उतरने का आवाहन किया है। कांग्रेस भी बुंदेलखंड में मजबूती से आगे बढ़ने हेतु प्रयासरत है। कुल मिलाकर यहां राजनीति चरम पर है और जनता को जमकर छला जा रहा है। बुंदेलखंड में प्रस्तावित तमाम विकास परियोजनाओं ने राजनीति की कुटिल चालों के चलते दम तोड़ दिया। अधिकांश बड़ी परियोजनाएं राजनीतिक विद्वेष और प्रतिद्वंद्विता के चलते दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दी गई। भेल से लेकर बीना रिफायनरी तक इसका उदाहरण हैं। राजनीति की प्रतिद्वंद्विता के कारण यहां विकास की तस्वीर लगातार धुंधली पड़ती गई। कहना न होगा कि राजनीति ने इस क्षेत्र को जो दीर्घकालीन नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में तो मुमकिन नहीं दिखती। बेशकीमती पत्थर की खदानों से लबरेज यह क्षेत्र राजनीतिक छलावे के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं कर पाया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, August 16, 2011

केंद्र के स्वयंसेवक करेंगे मनरेगा की निगरानी


नई दिल्ली ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश भारत निर्माण स्वयंसेवकों को अपनी आंख व कान बनाना चाहते हैं, ताकि उन्हें योजनाओं के बारे में जमीनी हकीकत का पता चलता रहे। यही वजह है कि मंत्रालय ने उनकी भर्ती में तेजी लाने के साथ उन्हें मानदेय देने पर भी विचार करना शुरु कर दिया है। इन स्वयं सेवकों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के सोशल ऑडिट का दायित्व सौंपा जा सकता है। मंत्रालय ने देश के सभी छह लाख गांवों में स्वयंसेवकों की नियुक्ति की योजना तैयार की है। प्रत्येक गांव में 20 से 25 स्वयंसेवकों नियुक्ति की जाएगी, जिन्हें मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाएगा। फिलहाल इन्हें कोई मानदेय नहीं मिलता है। योजना के मुताबिक देश के सभी छह लाख गांवों में स्वयंसेवकों की नियुक्ति की जानी है। शुरुआत में ही अब तक 20 हजार से अधिक स्वयं सेवकों की नियुक्ति की जा चुकी है। रमेश ने स्वयंसेवकों से सीधे संवाद करना शुरु कर दिया है। उन्हें एसएमएस भेजकर केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन के बारे में जानकारी मांगी गई है। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने इन कार्यकर्ताओं से मुफ्त कार्य कराने की बजाय उन्हें कुछ मानदेय देने का भरोसा दिया है। अब तक विभिन्न राज्यों में 20 हजार स्वयं सेवकों की भर्ती हो चुकी है। जबकि अगले चार महीनों में इतने ही स्वयं सेवकों की नियुक्ति कर जाएगी। स्वयं सेवकों की भर्ती में तेजी लाने के बारे में जयराम रमेश ने बताया कि देश के नक्सल प्रभावित 60 जिलों में इस योजना पर प्राथमिकता से अमल किया जाएगा। इन जिलों के शत प्रतिशत गांवों में जल्दी से जल्दी स्वयंसेवकों की नियुक्ति की जाएगी। लेकिन योजना के प्रथम चरण में नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में स्वयंसेवकों की भर्ती का हाल संतोषजनक नहीं है। साथ ही इन कार्यकर्ताओं का सहयोग स्वच्छ पेयजल और पूर्ण स्वच्छता अभियान में ज्यादा से ज्यादा लिया जाएगा। इनमें गांव के बेरोजगार युवकों की भर्ती की जाएगी। मनरेगा के प्रशासनिक मद से इनके लिए कुछ मानदेय देने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए उनसे सोशल ऑडिट कराया जा सकता है।


Saturday, July 16, 2011

अब गांवों में सिर्फ 68.8 फीसदी भारत


गांव में अब भारत की सिर्फ 68.8 फीसदी आबादी बसती है। जनगणना के ताजा आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में जहां 83.3 करोड़ की आबादी रहती है, वहीं शहरी इलाकों में 37.7 करोड़। यह पहला मौका है, जब गांवों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार घटी है। ताजा जनगणना के मुताबिक देश की शहरी आबादी पिछले दस साल में 27.81 फीसदी से बढ़ कर 31.36 फीसदी तक पहुंच गई है। दूसरी तरफ गांवों की आबादी इस दौरान 72.19 फीसदी से घट कर 68.84 फीसदी रह गई है। यह जानकारी भारत के महापंजीयक की ओर से तैयार की गई शहरी-ग्रामीण जनसंख्या वितरण रिपोर्ट से सामने आई है। महापंजीयक सी. चंद्रमौलि के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या वृद्धि में आई गिरावट भी गांवों की वजह से ही संभव हुई है। इस दौरान शहरों की जनसंख्या वृद्धि में कोई कमी नहीं आई है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इसकी बड़ी वजह गांवों से लोगों का शहरों की ओर पलायन है। सबसे ज्यादा ग्रामीण आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां 15.5 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। जबकि महाराष्ट्र पांच करोड़ शहरी बाबुओं के साथ सबसे ज्यादा शहरी आबादी वाला राज्य है। इस तरह देश की 18.62 फीसदी ग्रामीण आबादी सिर्फ उत्तर प्रदेश में रहती है, जबकि 13.48 फीसदी शहरी आबादी महाराष्ट्र में। ग्रामीण इलाकों में साक्षरता हासिल करने की दर भी शहरी इलाकों के मुकाबले तेजी से सुधरी है। शहरों के मुकाबले साक्षरता वृद्धि दर में यहां दुगना इजाफा आया है। इसी तरह बच्चों में लड़के और लड़कियों के अनुपात के मामले में भी शहरों की स्थिति गांवों के मुकाबले बिगड़ी है।

121 में से 83 करोड़ लोग गांवों में

ठ्ठ ग्रामीण-शहरी जनगणना के अस्थायी आंकड़े जारी
ठ्ठ आजादी के बाद पहली बार शहरों में तेजी से बढ़ी आबादी
ठ्ठ शहरों में 9.10 करोड़, गांवों में 9.04 करोड़ लोग बढ़े



डीएनए नेटवर्क & नई दिल्ली

जनगणना के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश की तकरीबन ६९ प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। 121 करोड़ भारतीयों में से 83.3 करोड़ ग्रामीण इलाकों में जबकि 37.7 करोड़ शहरों में निवास करते हैं। पिछली जनगणना के मुकाबले ३.५ फीसदी लोग गांव छोड़कर शहरों में बस गए हैं।

महाराष्ट्र सबसे ज्यादा शहरी आबादी (पांच करोड़) के साथ शीर्ष पर रहा, जबकि सबसे ज्यादा ग्रामीण आबादी 15.5 करोड़ उत्तरप्रदेश में दर्ज की गई। 2001 से 2011 के दस सालों में देश की आबादी में 18.14 करोड़ की बढ़ोतरी हुई, जिसमें ग्रामीण इलाकों में 9.04 करोड़ और शहरी इलाकों में 9.10 करोड़ की वृद्धि हुई।

केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने शुक्रवार को यहां ग्रामीण-शहरी आबादी के प्रारंभिक तुलनात्मक आंकड़े पेश किए। रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त सी. चंद्रमौलि ने बताया कि आजादी के बाद पहली बार ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरों में आबादी तेजी से बढ़ी है।

मोदी सरकार असंगठित मजदूरों का पंजीकरण करे – कोर्ट

अहमदाबाद, एजेंसी : गुजरात हाई कोर्ट ने नरेंद्र मोदी सरकार को राज्य के सभी असंगठित मजदूरों के पंजीकरण करने और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा बोर्ड (एसएसबी) गठित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सरकार को मामले की 26 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई तक निर्देशों के अनुपालन की एक रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है। अदालत ने राज्य सरकार को असंगठित मजदूर सामाजिक सुरक्षा (यूडब्ल्यूएसएस) अधिनियम, 2008 के तहत योजनाओं को अधिसूचित करने का भी आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर पिछले हफ्ते यह आदेश जारी किए। याचिका असंगठित मजदूरों के लिए काम कर रहे गैरसरकारी संगठन (एनजीओ) वृहद अहमदाबाद आदिवासी भील शिक्षित युवक मित्र मंडल ने दायर की थी। अदालत ने कहा कि लगता है कि यूडब्ल्यूएसएस अधिनियम की धारा (6) के अंतर्गत राज्य सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन नहीं किया गया है। एसएसबी की अनुपस्थिति में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के मुद्दे और पंजीकरण की प्रक्रिया की प्रगति पर नजर करने के लिए कोई नहीं है। इस स्थिति में हम प्रतिवादी राज्य और इसके अधिकारियों को राज्य सरकार द्वारा तैयार सात योजनाओं को अधिसूचित करने, असंगठित मजूदरों के लिए राज्य सामाजिक सुरक्षा बोर्ड तुरंत गठित करने और गुजरात में कार्यरत सभी असंगठित मजदूरों के पंजीकरण के लिए तुरंत कदम उठाने के निर्देश देते हैं। अदालत ने कहा कि एसएसबी का कार्य राज्य सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए योजनाएं बनाने, उनकी निगरानी करने और जिला स्तर पर कार्यों की समीक्षा करने का होता है। उन्होंने कहा कि एसएसबी मजदूरों के पंजीकरण की प्रगति और कोष संबंधी मामलों पर ही ध्यान देता है। गौरतलब है कि गैरसरकारी संगठन ने 2008 में जनहित याचिका दायर करके गुजरात में मजदूर संबंधी कानून को असरदार तरीके से लागू करने के लिए राज्य सरकार पर निष्कि्रय का आरोप लगाया था।

ग्रामीण भारत

अब गांव में भारत की सिर्फ 68.8 फीसदी
ठ्ठजागरण ब्यूरो, नई दिल्ली गांव में अब भारत की सिर्फ 68.8 फीसदी आबादी बसती है। जनगणना के ताजा आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में जहां 83.3 करोड़ की आबादी रहती है, वहीं शहरी इलाकों में 37.7 करोड़। यह पहला मौका है, जब गांवों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार घटी है। ताजा जनगणना के मुताबिक देश की शहरी आबादी पिछले दस साल में 27.81 फीसदी से बढ़ कर 31.36 फीसदी तक पहुंच गई है। दूसरी तरफ गांवों की आबादी इस दौरान 72.19 फीसदी से घट कर 68.84 फीसदी रह गई है। यह जानकारी भारत के महापंजीयक की ओर से तैयार की गई शहरी-ग्रामीण जनसंख्या वितरण रिपोर्ट से सामने आई है। महापंजीयक सी. चंद्रमौलि के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या वृद्धि में आई गिरावट भी गांवों की वजह से ही संभव हुई है। इस दौरान शहरों की जनसंख्या वृद्धि में कोई कमी नहीं आई है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इसकी बड़ी वजह गांवों से लोगों का शहरों की ओर पलायन है। सबसे ज्यादा ग्रामीण आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां 15.5 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। जबकि महाराष्ट्र पांच करोड़ शहरी बाबुओं के साथ सबसे ज्यादा शहरी आबादी वाला राज्य है। इस तरह देश की 18.62 फीसदी ग्रामीण आबादी सिर्फ उत्तर प्रदेश में रहती है, जबकि 13.48 फीसदी शहरी आबादी महाराष्ट्र में। ग्रामीण इलाकों में साक्षरता हासिल करने की दर भी शहरी इलाकों के मुकाबले तेजी से सुधरी है। शहरों के मुकाबले साक्षरता वृद्धि दर में यहां दुगना इजाफा आया है। इसी तरह बच्चों में लड़के और लड़कियों के अनुपात के मामले में भी शहरों की स्थिति गांवों के मुकाबले बिगड़ी है।