Thursday, December 30, 2010

विकास कार्यो में जनसहभागिता

ग्रामीण जीवन में खेती से लेकर सामूहिक कामों और सार्वजनिक स्थानों का निर्माण जनसहयोग से करने की परंपरा रही है।। विद्यालय, पुस्तकालय, सड़क और जलाशय जैसे सार्वजनिक स्थान गांव की ही संपत्ति होते हंै,। क्योंकि यह पूरे गांव के सामूहिक योगदान से बनता था। इसमें कुछ लोग श्रमदान करते थे तो कुछ लोग देखरेख का काम करते हैं। आज भी सुदूर पहाड़ों या जंगलों में निवास करने वाले लोगों द्वारा सामूहिक श्रम से व्यक्तिगत खेती और घर बनाने के दृष्टांत देखने-सुनने को मिल जाते हैं। किसी के घर पर छत पड़ रही हो तो पूरा गांव इकट्ठा हो जाता है। खेतों में फसल की बुआई, धान की रोपाई हो या फसल की कटाई सारा काम सामूहिक होता है। आज ये परंपराएं समाप्त हो गई हैं। फिर भी गांव से लेकर मेट्रो शहरों में भी घर की छत पड़ते समय मिठाई बांटे जाने की परंपरा कायम है। किसी व्यक्ति या परिवार के लिए घर बनाना एक महत्वपूर्ण घटना होती है। व्यक्तिगत घर की छत के लिए सामूहिक प्रयास होते थे और परिवार के सुख-दु:ख की चिंता करना गांव-समाज का भी दायित्व होता था। आज गांव की सामूहिकता क्रमश: समाप्त होती जा रही है। धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज और गांव की जिम्मेदारी न के बराबर रह गई है। गांव वालों का काम सरकार के आगे हाथ फैलाकर या आंखें दिखाकर अपने लिए मांग करना रह गया है। यहां तक कि कुछ बनाने की बजाय निर्मित स्थानों का तोड़-फोड़ किया जाना हमारे स्वभाव में शामिल होता जा रहा है। इस कारण उन भवनों या सड़क-जलाशयों से अपनापन का भाव समाप्त हो रहा है। कभी भाव हुआ करता था सबै भूमि गोपाल की और अब सब धन सरकार का भाव आ गया है। इससे हमारी भागीदारी की भावना नदारद हो रही है। सार्वजनिक स्थानों से सार्वजनिक लाभ का भाव ही समाप्त हो गया है। अपने घर के आगे गड्ढा भी है तो स्वयं अपने प्रयास से नहीं भरेंगे। सरकार का मुखापेक्षी हो गया है व्यक्ति, समाज और हमारा गांव। यह सिलसिला दीर्घकाल तक चलते रहने के कारण यह हमारे व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार में शुमार हो गया है। परंतु लोकतंत्र में यह तो गलत सिलसिला है। आज इन गलत परंपराओं को समाप्त करने की जरूरत है। लोगों को सरकारी योजनाओं के लागू होने में जनभागीदारी का महत्व समझाने की जरूरत भी है। सरकारी योजनाओं में जनता के साथ साझेदारी हुए बिना योजनाओं का कार्यान्वयन कारगर नहीं हो सकता। इस चिंतन क्रम में एक और बात हाथ लगी कि देशभर के लिए योजनाएं बनाते हुए भिन्न-भिन्न स्थानों की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। सही बात तो यह है कि अलग-अलग राज्य, क्षेत्र, गांव और हर गांव की अपनी अलग-अलग समस्याएं व जरूरतें हैं। इसलिए योजनाएं बनाते समय गांव नहीं तो कम से कम क्षेत्र का तो ध्यान रखना ही चाहिए और गांव वालों से उनकी आवश्यकताओं की जानकारी भी लेते रहना चाहिए। दरअसल गांव वालों या शहरी लोगों की उन्हीं के लिए बनी योजनाओं में भागीदारी तब आरंभ होती है, जब वे समूह में बैठकर अपनी प्राथमिकताएं तय करते हैं। उनकी प्राथमिकताओं के अनुकूल यदि सरकारी योजनाएं बनती हैं और उनमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है तो उनके कार्यान्वयन और निर्माण से लेकर सुरक्षा तक में उनकी रुचि दिखती है। प्रसन्नता की बात है कि इन दिनों विभिन्न राज्य सरकारें, योजना आयोग और केंद्र योजनाएं बनाते समय जनभागीदारी को महत्व दे रही हैं। कई योजनाएं ऐसी हैं जिनमें स्थानीय लोगों के द्वारा निर्धारित की गई राशि खर्च करने के उपरांत ही सरकारी राशि मिलती है। दूसरी ओर ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि बिना सरकारी सहायता के लोगों द्वारा जलाशय-पुस्तकालय या विवाह भवनों का निर्माण हो रहा है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च तो ऐसे ही जनभागीदारी के आधार पर बनते आ रहे हैं और अब भी बन रहे हैं। सरकारी योजनाओं के नियमों के निर्माण के समय स्थानीय जनता को सूचित करने तथा समय-समय पर उनका सहयोग शामिल कराना ही जनतंत्र का तकाजा होता है। परंतु स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आई सरकारों ने लोकतंत्रीय प्रणाली को छोड़कर विकास के कार्य राजसत्ता द्वारा ही करने का मन बना लिया। जनतांत्रिक प्रणाली में जनता भी हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। एक समय तो उसे मतदान के लिए भी मतदान केंद्र पर जाना नहीं पड़ता था। उनका मत पड़ जाता था। इस प्रकार जनतंत्र में जनता निष्कि्रय हो गई थी और सरकारें चल रही थीं। इस तरह निठल्ली बैठी जनता और भ्रष्टाचार में डूबे सरकारी कर्मचारियों के गले से जनभागीदारी की अपेक्षा गले नहीं उतरना बहुत स्वाभाविक है। गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने हर सरकारी योजना में जनता की भागीदारी कागजों पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा। इससे वहां विकास के परिणाम भी अच्छे आ रहे हैं और योजनाओं से लोग लाभान्वित भी हो रहे हैं। जनता में भी अपने विकास के प्रति लगाव बढ़ा है और उनके बीच छिन्न-भिन्न हुई सामूहिकता बढ़ी है। वह अपना गांव, अपना हाथ के भाव से प्रेरित हुए हैं। जनभागीदारी का भाव जन-जन में भरने से लेकर उन्हें सचमुच सरकार के साथ भागीदार बनाने का लक्ष्य अभी दूर के ढोल के समान है, क्योंकि कई दशकों से यह अभ्यास छूट गया है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी को इस भाव और कार्य के लिए प्रेरित किया जाए। उनके मन में अपना हाथ-अपना गांव का भाव पाठ्यक्रम के द्वारा भी भरा जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न निर्माण कार्यो जैसे कोसी बांध अथवा आपदा नियंत्रण कार्यो में विद्यार्थियों की सहभागिता होती थी। इससे युवाओं में शारीरिक क्षमता ही नहीं, जीवन मूल्य संवारने व संभालने की मानसिक ऊर्जा भी भरती है। अपने गांव और अपने देश को सुंदर और संपन्न बनाना है तो जन-जन की शक्ति चाहिए। एक अरब बीस करोड़ की आबादी में युवाओं की संख्या पचास प्रतिशत है। यह बहुत बड़ी शक्ति है। उन्हें जाग्रत करने भर की जरूरत है। रोजगार की तलाश में कंप्यूटर पर बैठे या डिग्रियां हाथों में थामे युवा पीढ़ी, अपनी शक्ति का सही उपयोग नहीं कर रही है। लोगों को अपनी नौकरी के सिवा अपने आस-पड़ोस और गांव का भी ध्यान नहीं। आज परिवार के लिए भी समय निकालना मुश्किल पड़ रहा है। योजनाओं में स्थानीय लोगों द्वारा एक घंटे के श्रमदान को आवश्यक बनाना चाहिए। ऋग्वेद के मुताबिक हर पिता की कामना होती है कि उसकी संतान काम करने वाली, अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने वाली, मुहल्ले के सामाजिक और धार्मिक कार्यो में योगदान देने वाली तथा सभा में बैठने योग्य हो। वह अपना नागरिक क‌र्त्तव्य पूरा करने में सक्षम हो। क्या आज की युवा पीढ़ी में ये गुण हैं? नहीं तो गलती किसकी है? परिवार के संस्कार और सीख का बीजारोपण जब तक पाठ्यक्रमों द्वारा युवाओं में नहीं होगा तब तक नीरस शिक्षा जनोपयोगी नहीं बन पाएगी। आज सुसंस्कृत युवाओं की देश को जरूरत है। कंप्यूटर पर बैठे युवाओं से उनके ही लिए बनी योजनाओं में जनभागीदारी की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इस दिशा में हमें तत्काल सोचने की जरूरत है।

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