Sunday, December 26, 2010

अफसरों के आदेश पड़ रहे ग्राम सभाओं पर भारी

सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली वर्ष 2010 को ग्राम सभा वर्ष घोषित करने के बावजूद देश में ग्राम सभाओं की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हो पाया है। उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति तो और ज्यादा खराब है। उल्टे कुछ राज्यों में पंचायतें पहले से भी कमजोर हो गई हैं। पंचायतों के अधिकार नहीं बढ़ाने के मामले में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब सबसे आगे हैं। पिछले साल दो अक्तूबर 2009 को आयोजित पंचायती राज प्रतिनिधियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की मौजूदगी में केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने 2010 को ग्राम सभा वर्ष घोषित किया था। राज्यों के प्रतिनिधियों ने इस मौके पर ग्राम सभाओं और पंचायतों को और अधिकार सौंपकर उसे मजबूत बनाने का संकल्प लिया था। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय सचिव एएनपी सिन्हा ने बताया कि ग्राम सभा वर्ष के दौरान राज्यों की पहल की समीक्षा की गई, जिसमें दक्षिणी राज्यों का प्रदर्शन संतोषजनक रहा, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में हालत ठीक नहीं है। उत्तरी राज्यों में लोकतंत्र के इस निचले पायदान की हालत और बिगड़ी है। इन राज्यों में ग्राम सभा के प्रस्तावों की जगह अफसरों के आदेश ज्यादा मायने रखते हैं। उत्तर प्रदेश में तो ग्राम पंचायतों के अधिकार बढ़ाने के बजाए घटा दिए गए हैं। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के पंचायती राज विभाग के सचिव आलोक कुमार ने बताया कि राज्य में वन, सरकारी ट्यूबवेल, प्राइमरी शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित अधिकारों से पंचायतों को लैस किया गया था, लेकिन बाद में कर्मचारी यूनियनों के दबाव में ये अधिकार वापस ले लिए गए। पंजाब और हरियाणा में पंचायतों के मौजूदा अधिकारों में कटौती तो नहीं की गई है, लेकिन ग्राम सभा वर्ष के दौरान उनके अधिकारों में बढ़ोतरी की कोशिश भी राज्यों ने नहीं की है। ग्राम सभाओं को अपने प्रस्ताव पारित कराने के लिए आज भी इन राज्यों में अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्राम सभाओं के लिए पंचायत भवन बनाने के मामले में भी उत्तर भारत के राज्य काफी पीछे रहे हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और झारखंड समेत आधा दर्जन राज्यों में तो इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। इसके उलट महाराष्ट्र व बिहार जैसे देश के नौ राज्यों में न सिर्फ ग्राम पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की गयी है, बल्कि पंचायत भवनों के निर्माण में भी प्रगति हुई है। ग्राम सभा वर्ष की घोषणा के समय राज्यों के प्रतिनिधियों ने ग्राम सभा में कोष, पंचायत का संचालन और उसके अमल के लिए स्टाफ मुहैया कराने का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे दूर ही रही। अभी तक पंचायतों को इस तरह के अधिकार कई राज्यों में नहीं मिले हैं।

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