Thursday, December 30, 2010

एसबीआइ का ग्रामीणों का तोहफा

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) ने ग्रामीणों और किसानों को नए साल का तोहफा देते हुए सस्ती कर्ज योजना शुरू करने की घोषणा की है। बैंक के मुताबिक डेयरी, मुर्गी पालन और बागवानी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए 10 प्रतिशत सालाना ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध कराया जाएगा। बैंक की यह योजना 31 मार्च 2011 तक लागू रहेगी। बैंक ने बड़ी डेयरी लगाने, मुर्गी पालन शुरू करने या बागवानी परियोजनाओं के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में बनाए जाने वाले भंडारगृहों और शीतगृहों के लिए भी यह योजना शुरू की है। इन परियोजनाओं के लिए रियायती ब्याज योजना 31 मार्च 2011 तक लिए जाने वाले नए कर्ज पर लागू रहेगी। योजना के तहत ब्याज की दर हर साल फिर से तय की जाएगी। बैंक के अनुसार रियायती कर्ज योजना के तहत बड़ी डेयरी परियोजना के अलावा छोटी डेयरी परियोजना को भी 10 प्रतिशत की रियायती दर पर कर्ज दिया जाएगा। नई मुर्गीपालन इकाइयों के लिए पांच लाख रुपये या इससे अधिक का कर्ज 10.5 प्रतिशत सालाना ब्याज पर उपलब्ध कराया जाएगा। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से आशय पत्र प्राप्त बागवानी गतिविधियों के लिए भी नया कर्ज 10.5 प्रतिशत की सालाना दर पर उपलब्ध होगा। बैंक बागवानी उत्पादों के भंडारण के लिए शीतगृहों के निर्माण में सहयोग करता रहा है। बैंक ने देश में नए गोदाम, भंडार गृह और शीतगृहों के निर्माण के लिए 31 मार्च 2011 तक 10.5 प्रतिशत सालाना की रियायती ब्याज दर पर कर्ज देने का फैसला किया है। बैंक ने स्पष्ट किया है कि रियायती ब्याज दर की उसकी यह योजना 8.5 प्रतिशत ब्याज दर वाली योजना से अलग है। इसमें 31 मार्च 2011 तक किसानों को गोदामों या शीतगृहों में रखे अनाज या उत्पादों के एवज में 10 लाख रुपये तक का कर्ज रियायती ब्याज पर उपलब्ध कराया जाता है। कृषि क्षेत्र की कर्ज जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक ने तीन-25 लाख रुपये तक का फसली कर्ज भी 10 प्रतिशत सालाना ब्याज दर पर दे रहा है। यह योजना भी 31 मार्च 2011 तक खुली है। तीन लाख रुपये तक का फसली कर्ज रिजर्व बैंक की विशेष सब्सिडी योजना के तहत सात प्रतिशत ब्याज पर उपलब्ध कराया जाता है। बैंक ने कहा कि वह किसानों को छोटी सिंचाई परियोजनाओं के लिए भी रियायती दर पर कर्ज उपलब्ध करा रहा है। कृषि क्षेत्र में दिए जाने वाले इन सभी वर्गो में ब्याज की दर 12.10 प्रतिशत से लेकर 14.85 प्रतिशत के दायरे में है, लेकिन बैंक ने कृषि क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए तीन महीने की विशेष रियायती योजना शुरू की है।

विकास कार्यो में जनसहभागिता

ग्रामीण जीवन में खेती से लेकर सामूहिक कामों और सार्वजनिक स्थानों का निर्माण जनसहयोग से करने की परंपरा रही है।। विद्यालय, पुस्तकालय, सड़क और जलाशय जैसे सार्वजनिक स्थान गांव की ही संपत्ति होते हंै,। क्योंकि यह पूरे गांव के सामूहिक योगदान से बनता था। इसमें कुछ लोग श्रमदान करते थे तो कुछ लोग देखरेख का काम करते हैं। आज भी सुदूर पहाड़ों या जंगलों में निवास करने वाले लोगों द्वारा सामूहिक श्रम से व्यक्तिगत खेती और घर बनाने के दृष्टांत देखने-सुनने को मिल जाते हैं। किसी के घर पर छत पड़ रही हो तो पूरा गांव इकट्ठा हो जाता है। खेतों में फसल की बुआई, धान की रोपाई हो या फसल की कटाई सारा काम सामूहिक होता है। आज ये परंपराएं समाप्त हो गई हैं। फिर भी गांव से लेकर मेट्रो शहरों में भी घर की छत पड़ते समय मिठाई बांटे जाने की परंपरा कायम है। किसी व्यक्ति या परिवार के लिए घर बनाना एक महत्वपूर्ण घटना होती है। व्यक्तिगत घर की छत के लिए सामूहिक प्रयास होते थे और परिवार के सुख-दु:ख की चिंता करना गांव-समाज का भी दायित्व होता था। आज गांव की सामूहिकता क्रमश: समाप्त होती जा रही है। धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज और गांव की जिम्मेदारी न के बराबर रह गई है। गांव वालों का काम सरकार के आगे हाथ फैलाकर या आंखें दिखाकर अपने लिए मांग करना रह गया है। यहां तक कि कुछ बनाने की बजाय निर्मित स्थानों का तोड़-फोड़ किया जाना हमारे स्वभाव में शामिल होता जा रहा है। इस कारण उन भवनों या सड़क-जलाशयों से अपनापन का भाव समाप्त हो रहा है। कभी भाव हुआ करता था सबै भूमि गोपाल की और अब सब धन सरकार का भाव आ गया है। इससे हमारी भागीदारी की भावना नदारद हो रही है। सार्वजनिक स्थानों से सार्वजनिक लाभ का भाव ही समाप्त हो गया है। अपने घर के आगे गड्ढा भी है तो स्वयं अपने प्रयास से नहीं भरेंगे। सरकार का मुखापेक्षी हो गया है व्यक्ति, समाज और हमारा गांव। यह सिलसिला दीर्घकाल तक चलते रहने के कारण यह हमारे व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार में शुमार हो गया है। परंतु लोकतंत्र में यह तो गलत सिलसिला है। आज इन गलत परंपराओं को समाप्त करने की जरूरत है। लोगों को सरकारी योजनाओं के लागू होने में जनभागीदारी का महत्व समझाने की जरूरत भी है। सरकारी योजनाओं में जनता के साथ साझेदारी हुए बिना योजनाओं का कार्यान्वयन कारगर नहीं हो सकता। इस चिंतन क्रम में एक और बात हाथ लगी कि देशभर के लिए योजनाएं बनाते हुए भिन्न-भिन्न स्थानों की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। सही बात तो यह है कि अलग-अलग राज्य, क्षेत्र, गांव और हर गांव की अपनी अलग-अलग समस्याएं व जरूरतें हैं। इसलिए योजनाएं बनाते समय गांव नहीं तो कम से कम क्षेत्र का तो ध्यान रखना ही चाहिए और गांव वालों से उनकी आवश्यकताओं की जानकारी भी लेते रहना चाहिए। दरअसल गांव वालों या शहरी लोगों की उन्हीं के लिए बनी योजनाओं में भागीदारी तब आरंभ होती है, जब वे समूह में बैठकर अपनी प्राथमिकताएं तय करते हैं। उनकी प्राथमिकताओं के अनुकूल यदि सरकारी योजनाएं बनती हैं और उनमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है तो उनके कार्यान्वयन और निर्माण से लेकर सुरक्षा तक में उनकी रुचि दिखती है। प्रसन्नता की बात है कि इन दिनों विभिन्न राज्य सरकारें, योजना आयोग और केंद्र योजनाएं बनाते समय जनभागीदारी को महत्व दे रही हैं। कई योजनाएं ऐसी हैं जिनमें स्थानीय लोगों के द्वारा निर्धारित की गई राशि खर्च करने के उपरांत ही सरकारी राशि मिलती है। दूसरी ओर ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि बिना सरकारी सहायता के लोगों द्वारा जलाशय-पुस्तकालय या विवाह भवनों का निर्माण हो रहा है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च तो ऐसे ही जनभागीदारी के आधार पर बनते आ रहे हैं और अब भी बन रहे हैं। सरकारी योजनाओं के नियमों के निर्माण के समय स्थानीय जनता को सूचित करने तथा समय-समय पर उनका सहयोग शामिल कराना ही जनतंत्र का तकाजा होता है। परंतु स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आई सरकारों ने लोकतंत्रीय प्रणाली को छोड़कर विकास के कार्य राजसत्ता द्वारा ही करने का मन बना लिया। जनतांत्रिक प्रणाली में जनता भी हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। एक समय तो उसे मतदान के लिए भी मतदान केंद्र पर जाना नहीं पड़ता था। उनका मत पड़ जाता था। इस प्रकार जनतंत्र में जनता निष्कि्रय हो गई थी और सरकारें चल रही थीं। इस तरह निठल्ली बैठी जनता और भ्रष्टाचार में डूबे सरकारी कर्मचारियों के गले से जनभागीदारी की अपेक्षा गले नहीं उतरना बहुत स्वाभाविक है। गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने हर सरकारी योजना में जनता की भागीदारी कागजों पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा। इससे वहां विकास के परिणाम भी अच्छे आ रहे हैं और योजनाओं से लोग लाभान्वित भी हो रहे हैं। जनता में भी अपने विकास के प्रति लगाव बढ़ा है और उनके बीच छिन्न-भिन्न हुई सामूहिकता बढ़ी है। वह अपना गांव, अपना हाथ के भाव से प्रेरित हुए हैं। जनभागीदारी का भाव जन-जन में भरने से लेकर उन्हें सचमुच सरकार के साथ भागीदार बनाने का लक्ष्य अभी दूर के ढोल के समान है, क्योंकि कई दशकों से यह अभ्यास छूट गया है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी को इस भाव और कार्य के लिए प्रेरित किया जाए। उनके मन में अपना हाथ-अपना गांव का भाव पाठ्यक्रम के द्वारा भी भरा जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न निर्माण कार्यो जैसे कोसी बांध अथवा आपदा नियंत्रण कार्यो में विद्यार्थियों की सहभागिता होती थी। इससे युवाओं में शारीरिक क्षमता ही नहीं, जीवन मूल्य संवारने व संभालने की मानसिक ऊर्जा भी भरती है। अपने गांव और अपने देश को सुंदर और संपन्न बनाना है तो जन-जन की शक्ति चाहिए। एक अरब बीस करोड़ की आबादी में युवाओं की संख्या पचास प्रतिशत है। यह बहुत बड़ी शक्ति है। उन्हें जाग्रत करने भर की जरूरत है। रोजगार की तलाश में कंप्यूटर पर बैठे या डिग्रियां हाथों में थामे युवा पीढ़ी, अपनी शक्ति का सही उपयोग नहीं कर रही है। लोगों को अपनी नौकरी के सिवा अपने आस-पड़ोस और गांव का भी ध्यान नहीं। आज परिवार के लिए भी समय निकालना मुश्किल पड़ रहा है। योजनाओं में स्थानीय लोगों द्वारा एक घंटे के श्रमदान को आवश्यक बनाना चाहिए। ऋग्वेद के मुताबिक हर पिता की कामना होती है कि उसकी संतान काम करने वाली, अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने वाली, मुहल्ले के सामाजिक और धार्मिक कार्यो में योगदान देने वाली तथा सभा में बैठने योग्य हो। वह अपना नागरिक क‌र्त्तव्य पूरा करने में सक्षम हो। क्या आज की युवा पीढ़ी में ये गुण हैं? नहीं तो गलती किसकी है? परिवार के संस्कार और सीख का बीजारोपण जब तक पाठ्यक्रमों द्वारा युवाओं में नहीं होगा तब तक नीरस शिक्षा जनोपयोगी नहीं बन पाएगी। आज सुसंस्कृत युवाओं की देश को जरूरत है। कंप्यूटर पर बैठे युवाओं से उनके ही लिए बनी योजनाओं में जनभागीदारी की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इस दिशा में हमें तत्काल सोचने की जरूरत है।

Sunday, December 26, 2010

अफसरों के आदेश पड़ रहे ग्राम सभाओं पर भारी

सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली वर्ष 2010 को ग्राम सभा वर्ष घोषित करने के बावजूद देश में ग्राम सभाओं की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हो पाया है। उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति तो और ज्यादा खराब है। उल्टे कुछ राज्यों में पंचायतें पहले से भी कमजोर हो गई हैं। पंचायतों के अधिकार नहीं बढ़ाने के मामले में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब सबसे आगे हैं। पिछले साल दो अक्तूबर 2009 को आयोजित पंचायती राज प्रतिनिधियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की मौजूदगी में केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने 2010 को ग्राम सभा वर्ष घोषित किया था। राज्यों के प्रतिनिधियों ने इस मौके पर ग्राम सभाओं और पंचायतों को और अधिकार सौंपकर उसे मजबूत बनाने का संकल्प लिया था। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय सचिव एएनपी सिन्हा ने बताया कि ग्राम सभा वर्ष के दौरान राज्यों की पहल की समीक्षा की गई, जिसमें दक्षिणी राज्यों का प्रदर्शन संतोषजनक रहा, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में हालत ठीक नहीं है। उत्तरी राज्यों में लोकतंत्र के इस निचले पायदान की हालत और बिगड़ी है। इन राज्यों में ग्राम सभा के प्रस्तावों की जगह अफसरों के आदेश ज्यादा मायने रखते हैं। उत्तर प्रदेश में तो ग्राम पंचायतों के अधिकार बढ़ाने के बजाए घटा दिए गए हैं। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के पंचायती राज विभाग के सचिव आलोक कुमार ने बताया कि राज्य में वन, सरकारी ट्यूबवेल, प्राइमरी शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित अधिकारों से पंचायतों को लैस किया गया था, लेकिन बाद में कर्मचारी यूनियनों के दबाव में ये अधिकार वापस ले लिए गए। पंजाब और हरियाणा में पंचायतों के मौजूदा अधिकारों में कटौती तो नहीं की गई है, लेकिन ग्राम सभा वर्ष के दौरान उनके अधिकारों में बढ़ोतरी की कोशिश भी राज्यों ने नहीं की है। ग्राम सभाओं को अपने प्रस्ताव पारित कराने के लिए आज भी इन राज्यों में अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्राम सभाओं के लिए पंचायत भवन बनाने के मामले में भी उत्तर भारत के राज्य काफी पीछे रहे हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और झारखंड समेत आधा दर्जन राज्यों में तो इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। इसके उलट महाराष्ट्र व बिहार जैसे देश के नौ राज्यों में न सिर्फ ग्राम पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की गयी है, बल्कि पंचायत भवनों के निर्माण में भी प्रगति हुई है। ग्राम सभा वर्ष की घोषणा के समय राज्यों के प्रतिनिधियों ने ग्राम सभा में कोष, पंचायत का संचालन और उसके अमल के लिए स्टाफ मुहैया कराने का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे दूर ही रही। अभी तक पंचायतों को इस तरह के अधिकार कई राज्यों में नहीं मिले हैं।

Saturday, December 25, 2010

ऐसे कैसे मिल पाएगा गरीबों को रोजगार

दिखावा बनी ग्राम स्वरोजगार योजना
धनराशि होने के बावजूद यूपी में गांवों के गरीबों को स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना का पूरा लाभ नहीं मिल रहा। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में जितने समूहों का गठन करके रोजगार मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है, उसकी तुलना में नवंबर तक के 8 माह में आधे समूह भी गठित नहीं हो सके हैं। जब 8 महीने में 50 प्रतिशत काम भी नहीं हो सका तो शेष काम चार माह में कैसे पूरा होगा, अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
चालू वित्त वर्ष में 75 हजार स्वयं सहायता समूह गठित करने का लक्ष्य है। इसमें अभी तक करीब 32 हजार ही स्वयं सहायता समूह गठित कर रोजगार दिया जा सका है। परिवारों के आधार पर रोजगार देने की स्थिति जरूर संतोषजनक है। चालू वित्त वर्ष में 4 लाख परिवारों को रोजगार देने का लक्ष्य था उसमें से 60 प्रतिशत परिवारों को नवंबर तक रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से रोजगार देने की उपलब्धि 42 प्रतिशत है। निजी परिवारों को रोजगार दिलाने में भी जो अच्छी स्थिति है वह उन तीन दर्जन जिलों के कारण है जिन्होंने 60 से लेकर शतप्रतिशत काम किया है। कई जिले ऐसे हैं जो न तो लक्ष्य की तुलना में चौथाई समूह गठित कर पाए हैं और न ही उपलब्ध धन का आधा हिस्सा खर्च। राज्य सरकार ने चालू वित्त वर्ष में स्वयं सहायता समूहों व परिवारों को स्वरोजगार मुहैया कराने के लिए करीब 573 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है।
इसमें 505 करोड़ रुपये उपलब्ध भी हैं, लेकिन 288 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके हैं।
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(बॉक्स) योजना का सूरतेहाल
इन जिलों में चौथाई समूह भी गठित नहीं: उन्नाव, सीतापुर, प्रतापगढ़, बिजनौर, हाथरस, जालौन, लखीपुरखीरी, मेरठ, बस्ती व बाराबंकी
लक्ष्य का 40 प्रतिशत ऋण नहीं बांट सके : रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, कुशीनगर, संत रविदास नगर, उन्नाव, बिजनौर, सीतापुर और मुरादाबाद
परिवारों को रोजगार देने में फिसड्डी: रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, कुशीनगर, संत रविदास नगर, महोबा, झांसी, बलरामपुर, बस्ती व बदायूं
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एक नजर में योजना
बीपीएल परिवारों को रोजगार में मदद के लिए योजना शुरू की गई है। खर्च का 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र व 25 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करती है। सामान्य वर्ग के लाभार्थियों (परिवारों) को लागत का 30 प्रतिशत या अधिकतम 7500 रुपये अनुदान तथा अजा व अजजा वर्ग के लाभार्थी को 50 प्रतिशत या अधिकतम 10 हजार रुपये अनुदान मिलता है।
समूहों की दशा में लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 1.25 लाख रुपये अनुदान मिलता है। संचालन ग्राम्य विकास विभाग करता है।