Saturday, February 18, 2012

भ्रष्टाचार में फंसी मनरेगा के बजट में कटौती के आसार


संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की अति महत्वाकांक्षी मनरेगा भ्रष्टाचार पर केंद्र व राज्यों की खींचतान का शिकार हो गई है। चालू साल के लिए आम बजट में योजना को आवंटित धन का आधा भी खर्च नहीं हो पाया है, जिसका सीधा असर गरीबों की रोजी-रोटी पर पड़ा है। यही वजह है कि राज्यों के रवैये से नाखुश केंद्र सरकार आगामी आम बजट में इसके आवंटन में भारी कटौती कर सकती है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत संचालित यह योजना चौतरफा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। योजना के क्रियान्वयन में हुए घपलों को देखते हुए लगभग एक दर्जन बड़े राज्यों में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से जांच कराई जा रही है। जांच के डर से भी तमाम राज्यों में योजना के तहत अंधाधुंध होने वाले खर्च पर लगाम लगी है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अब तक 22 हजार करोड़ रुपये जारी किए हैं, लेकिन इसके विपरीत 20 हजार करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हो पाए हैं। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मार्च के आखिर तक थोड़ा बहुत खर्च और बढ़ सकता है। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल जहां 5.4 करोड़ लोगों को रोजगार मिला था, वहीं चालू साल में केवल 3.7 करोड़ लोगों को रोजगार मिल पाया है। दरअसल मनरेगा में भारी गड़बडि़यों की शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। योजना के पहले दो वर्षो में राज्यों की मांग के आधार पर केंद्र से धन जारी किया जाता था, लेकिन सत्ता में लौटने के बाद से संप्रग सरकार ने योजना की निगरानी पर ध्यान केंद्रित किया है। यही वजह है कि चौतरफा गड़बडि़यों की शिकायतें मिलीं, जिनकी जांच शुरू करा दी गई। लिहाजा अंधाधुंध खर्च पर पाबंदी लगी है।

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