ताकि तेजी से घूमे विकास का पहिया
अंग्रेजी शासनकाल से मुक्ति के 65 वर्षो बाद भी देश में उनके क्रिया-कलापों के रूप में ऐसा काफी कुछ दिखता है जो बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। उदाहरण के तौर पर पूरे देश में अंग्रेजों द्वारा बड़ी संख्या में बनवाये गये भवन व पुल इत्यादि आज भी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और अंग्रेजी शासनकान की याद दिला जाते हैं जबकि आजादी के बाद बने अनेक भवन और ब्रिज महज कुछ ही सालों में जमींदोज हो गये, ध्वस्त हो गये। नि:संदेह ऐसा इसीलिए है कि किसी भी योजना को बनाने में अंग्रेजों की सोच का दायरा विस्तृत था। कई मौकों पर आसानी से यह कह दिया जाता है कि अंग्रेजों ने यहां से जाने के बारे में सोचा ही नहीं था इसलिए वह हर भवन, इमारत या पुल इत्यादि को मजबूत बनाते थे। लेकिन यह तर्क किसी भी कसौटी पर खरा नहीं उतरता। असल सवाल यह है कि आखिर अंग्रेजी शासन काल के दौर की योजनाओं में जो टिकाऊपन दिखता है, वह हमारी आज की योजनाओं में क्यों नहीं है? क्या इसलिए कि हम योजना बनाते समय कुछ क्षणिक व सीमित लाभों में ही सिमट जाते हैं और योजनाओं का आधार महज चुनावी होता है या किसी व्यक्ति विशेष की सोच को साकार करने की खातिर भारी भरकम योजनाओं को हम देश पर थोपते देते हैं। उदाहरणस्वरूप केन्द्र सरकार की दो योजनाओं को देखें तो कुछ ऐसे ही प्रश्न मन में उठते हैं। अपने पिछले कार्यकाल के दौरान यूपीए सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना यानी (मनरेगा) लागू की थी। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों को साल में सौ दिन का रोजगार मुहैया कराने का लक्ष्य है। पिछले वर्ष इस योजना पर सरकार का करीब 40,100 रुपये खर्च हुआ। सरकार का दावा है कि इस समय देश के एक करोड़ अस्सी लाख परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार दिया जा रहा है। लेकिन ग्रामीणों की क्रयशक्ति बढ़ाने के उद्देश्य से बनायी गई इस योजना के लागू होने के छह साल बाद भी असल तस्वीर में ग्रामीणों को सौ दिन का रोजगार दे पाना दूर की कौड़ी लगता है। आश्चर्य है कि अब तक औसत कार्य दिवस भी महज 48 दिन ही है। जहां तक क्रय शक्ति बढ़ने की बात है तो महंगाई उससे कई गुना बढ़ गई है। बहुत से विशेषज्ञ मनरेगा को भी महंगाई का एक कारक मानते हैं। यानी साफ है कि दुनिया में अपनी तरह की यह बड़ी योजना जरूरतमंतों को अपेक्षित लाभ नहीं दे सकी। हां, इसके नाम पर यूपीए को दोबारा सत्ता जरूर मिल गई। अलबत्ता यह जरूर है कि देश के हर कोने से मनरेगा में हुए घोटाले सामने आ चुके हैं। ऐसी ही एक दूसरी बड़ी योजना संसद की दहलीज पर है। शीतकालीन सत्र में संसद में रखे गये खाद्य सुरक्षा बिल का भी ऐसा ही हाल है। हाल ही में देश के वित्त मंत्री और कृषि मंत्री ने एक साथ कहा कि खाद्य सुरक्षा बिल लागू करना संभव नहीं है। कृषि मंत्री शरद पवार ने वर्तमान वितरण पण्राली को और प्रणब मुखर्जी ने अपनी दूरदर्शिता वाली कमी को छिपाते हुए बढ़ते हुए सब्सिडी बिल को इसके लिए जिम्मेदार बताया। लेकिन सौ टके का सवाल यह है कि विधेयक को सदन में रखने के पहले सरकार ने इन बिन्दुओं पर विचार क्यों नहीं किया? यह क्यों नहीं सोचा गया कि उक्त कानून के लागू होने के बाद जितने अनाज की खपत होगी उसका स्रेत कैसे बढ़ेगा! जब खुद योजना आयोग का यह मानना है कि पीडीएस के तहत जारी होने वाला अनाज 57 फीसद जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता है तो यह क्यों नहीं सोचा गया कि सार्वजनिक वितरण पण्राली की खामियों को दूर किये बिना इतनी खर्चीली योजना को लागू करना कितना उचित होगा? आश्चर्य है कि विशाल जनसंख्या वाले अपने देश में ऐसी किसी योजना को लाने से पहले आवश्यक होमवर्क करना भी जरूरी नहीं समझा जाता। मसलन कृषि संसाधनों में लगातार कमी हो रही है, जमीन की उर्वरता घटती जा रही है, जल स्तर नीचे होता जा रहा है और उत्तम खाद-बीज जैसी समस्याएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। अफसोस कि कृषि संबंधी महत्वाकांक्षी योजनाओं बनाते या लागू करते समय उक्त समस्याओं पर सम्यक विचार नहीं होता। गौरतलब है कि खाद्य सुरक्षा का कानून आने के बाद देश में साढ़े छह करोड़ टन अनाज की आवश्यकता होगी जबकि सरकारी खरीद लगभग पांच करोड़ टन औसत है। कई राज्यों में राशन कार्ड के सिस्टम में भी भारी फर्जीवाड़ा बताया जाता है। इस मुद्दे पर सही लाभार्थियों की पहचान एक बड़ी चुनौती है जिसे प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार देश में पानी की समस्या के निहितार्थ नदियों को जोड़ने वाली योजना लागू करना चाहती थी। उस समय इस मामले में एक कमेटी भी बनाई गई जो सालों तक यह यही आकलन नहीं कर सकी कि इस परियोजना पर कितना खर्च आएगा! यहां एनआरएचएम की चर्चा भी प्रासंगिक होगी जिसके तहत उत्तर प्रदेश में अथाह घोटाला हुआ है। निस्संदेह योजना में मौजूद खामियों ने ही घोटालेबाजों की राह आसान की होगी। सवाल किसी विशेष योजना का नहीं है बल्कि बड़े बजट से लागू होने वाली हर उस योजना के संबंध में है जो जन कल्याण के नाम पर लागू होती है। लेकिन अपनी खामियों की वजह से धराशाही हो जाती है। केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी ऐसे ही छिद्रयुक्त योजनाएं बनाती हैं। जब से क्षेत्रीय राजनीति ने पांव पसारा है, तब से देखा जाय तो हर राज्य में स्थानीय नफा-नुकसान की परवाह न करते हुए एक साथ सैकड़ों योजनाएं थोप दी जाती हैं। उप्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, झारखंड आदि ऐसे ही राज्य हैं जहां सियासत के आगे कोई गणित नहीं चलती। सरकारें आती जाती हैं और हजारों करोड़ की योजनाएं ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। इस बीच उप्र में हो रहे चुनावों के मद्देनजर सभी पार्टयिों ने ऐसी ही घोषणाएं की हैं जिनके लिए संसाधनों का स्रेत किसी को नहीं पता। किसी भी योजना को सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए देश पर थोपना बड़ी विडम्बना और खिलवाड़ है। यह किसी जुगनू को बैसाखी के सहारे चंद्रमा के समान चांदनी बिखेरने का सपना दिखाना है। दुनिया में बड़े कद के लिए आर्थिक रूप से मजबूत बने रहना अनिवार्य है। यह तभी मुमकिन है जब देश का आर्थिक ढांचा सुनियोजित हो। किसी भी योजना को अमली जामा पहनाने में जरूरी तथ्यों का अध्ययन नितांत जरूरी है ताकि देश में विकास का पहिया तेजी से और अनवरत घूमता रहे।
No comments:
Post a Comment