Tuesday, January 24, 2012

राज्यों के बराबर हो मनरेगा की मजदूरी : सुप्रीम कोर्ट


उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि केंद्र को विभिन्न राज्यों में न्यूनतम प्रचलित मजदूरी के बराबर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत न्यूनतम मजदूरी दर तय करने के लिए विचार करना चाहिए। न्यायमूर्ति सी. जोसेफ और ज्ञान सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने सोमवार को सॉलिसिटर जनरल रोहिन्टन नरीमन से कहा कि राज्य सरकारों द्वारा न्यूनतम मजदूरी के बराबर केंद्र को नरेगा के तहत मजदूरी तय करने को कहें। खंडपीठ ने कहा, यह एक लाभार्थी का विधान है, फिर न्यूनतम मजदूरी और मनरेगाअधिनियम के अंतर्गत दी जाने वाली मजदूरी में यहां विरोधाभास क्यों है। कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को केंद्र के चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने 23 सितंबर 2011 के अपने आदेश में कहा था कि मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी, राज्य सरकारों द्वारा कृषि श्रमिकों के लिए निर्धारित की गई न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि जिन लोगों ने कम पैसे में काम किया है उन्हें केंद्र को एरियर देना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कहा, आप इसे खुद क्यों नहीं करते हैं। उच्चतम न्यायालय की पीठ ने विभिन्न श्रमिक संगठनों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि केंद्र की याचिका पर वे दो हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करें। केंद्रीय रोजगार योजना के तहत पारिश्रमिक अलग-अलग राज्यों में 118 रुपये से 181 रुपये के बीच है जो छह राज्यों में अधिसूचित न्यूनतम दैनिक मजदूरी से कम है, लेकिन 14 राज्यों में ग्रामीण रोजगार योजना के तहत पारिश्रमिक न्यूनतम मजदूरी से ज्यादा है।

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