मनरेगा का मौसम अफसरों की फाइलों में भले गुलाबी हो, मगर हकीकत में पतझड़ ही दिखता है। निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना में 2009 में हर विकास खंड के लिए 120 हेक्टेयर में काम कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया और दो साल में अधिकारी सिर्फ एक लाभार्थी खोज सके। गरीबों की जमीन पर मनरेगा के खर्च से खेती कराकर घर बैठे रोजगार मुहैया कराकर उनकी आर्थिक दशा संवारने की गरज से निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना शुरू हुई थी। इसके तहत उनकी जमीन पर मटर, केला, पपीता, फ्रांसबीन, लोबिया, कद्दूवर्गीय सब्जियां, मूली-गाजर, पालक, धनिया, मेथी, परवल, प्याज, देशी गुलाब, गुल्दावरी, गेंदा, मैंथा के अलावा टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, भिंडी, बैंगन की शंकर प्रजातियों की खेती कराई जानी थी। खेत की तैयारी, निराई-गुड़ाई, सिंचाई आदि कामों का भुगतान फौरी तौर पर लाभार्थी को करना होता है, बाद में दो किश्तों में ग्राम पंचायत से उसे खर्च राशि के भुगतान की व्यवस्था है। बीज और पौधे की सप्लाई उद्यान विभाग को करना था और उसी के पर्यवेक्षण में फसलों की बुवाई-पौधरोपण होना था। पट्टाधारक, बीपीएल, इंदिरा आवास के लाभार्थी और अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को इसका लाभ दिया जाना था। इस बार इसमें लघु एवं सीमांत कृषक को भी शामिल किया गया है। उक्त चार श्रेणियों के लाभार्थी न मिलने पर ही इन किसानों को लाभ मिलेगा। तत्कालीन प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने 09 में हर ब्लाक में 125 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित करते हुए परियोजना पर काम कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दो साल में लखावटी ब्लाक के नगला करन में सिर्फ एक लाभार्थी के यहां पपीते के 4500 पौधों की सप्लाई उद्यान विभाग के राजकीय पौधशाला ऊंचागांव से हुई। यह रकबा सिर्फ एक हेक्टेयर के आसपास बैठता है। बाकी कोई काम ही नहीं हुआ। कम से कम उद्यान विभाग ने कोई सप्लाई नहीं दी। इस वित्तीय वर्ष से यह परियोजना स्वतंत्र रूप से उद्यान विभाग को सौंप दी गई है.
Wednesday, June 1, 2011
मनरेगा का सच : दो साल में एक लाभार्थी
मनरेगा का मौसम अफसरों की फाइलों में भले गुलाबी हो, मगर हकीकत में पतझड़ ही दिखता है। निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना में 2009 में हर विकास खंड के लिए 120 हेक्टेयर में काम कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया और दो साल में अधिकारी सिर्फ एक लाभार्थी खोज सके। गरीबों की जमीन पर मनरेगा के खर्च से खेती कराकर घर बैठे रोजगार मुहैया कराकर उनकी आर्थिक दशा संवारने की गरज से निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना शुरू हुई थी। इसके तहत उनकी जमीन पर मटर, केला, पपीता, फ्रांसबीन, लोबिया, कद्दूवर्गीय सब्जियां, मूली-गाजर, पालक, धनिया, मेथी, परवल, प्याज, देशी गुलाब, गुल्दावरी, गेंदा, मैंथा के अलावा टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, भिंडी, बैंगन की शंकर प्रजातियों की खेती कराई जानी थी। खेत की तैयारी, निराई-गुड़ाई, सिंचाई आदि कामों का भुगतान फौरी तौर पर लाभार्थी को करना होता है, बाद में दो किश्तों में ग्राम पंचायत से उसे खर्च राशि के भुगतान की व्यवस्था है। बीज और पौधे की सप्लाई उद्यान विभाग को करना था और उसी के पर्यवेक्षण में फसलों की बुवाई-पौधरोपण होना था। पट्टाधारक, बीपीएल, इंदिरा आवास के लाभार्थी और अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को इसका लाभ दिया जाना था। इस बार इसमें लघु एवं सीमांत कृषक को भी शामिल किया गया है। उक्त चार श्रेणियों के लाभार्थी न मिलने पर ही इन किसानों को लाभ मिलेगा। तत्कालीन प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने 09 में हर ब्लाक में 125 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित करते हुए परियोजना पर काम कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दो साल में लखावटी ब्लाक के नगला करन में सिर्फ एक लाभार्थी के यहां पपीते के 4500 पौधों की सप्लाई उद्यान विभाग के राजकीय पौधशाला ऊंचागांव से हुई। यह रकबा सिर्फ एक हेक्टेयर के आसपास बैठता है। बाकी कोई काम ही नहीं हुआ। कम से कम उद्यान विभाग ने कोई सप्लाई नहीं दी। इस वित्तीय वर्ष से यह परियोजना स्वतंत्र रूप से उद्यान विभाग को सौंप दी गई है.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment