केंद्र व राज्य सरकारों की अनदेखी के चलते गरीबी उन्मूलन वाला राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बहुत पिछड़ गया है। यही वजह है कि गरीबी मिटाने वाले इस मिशन के बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च तक नहीं हो पाया है। चालू वित्त वर्ष के दौरान योजना के क्रियान्वयन में उत्तरी राज्यों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। उत्तरी राज्यों की अनदेखी ने आजीविका मिशन के पटरी से उतरने की आशंका है। इस बारे में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि आगामी वित्त वर्ष में इस मिशन को खास अहमियत दी जाएगी। उन्होंने माना कि चालू वर्ष में पूरा बजट खर्च नहीं हो पाया है। स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना में थोड़ी तब्दीली कर चालू वित्त वर्ष के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन राजस्थान के बांसवाड़ा में बडे़ जोरशोर से संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों से शुरू कराया गया था। उस दौरान बड़े-बड़े दावे भी किए गए थे। साल भर के भीतर एक लाख लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर कर दिया जाएगा। 4.5 करोड़ परिवारों के कम से कम एक सदस्य को हर हाल में अगले दो सालों के भीतर एसएचजी से जोड़ने की योजना है, लेकिन चालू साल में यह योजना बहुत पीछे चल रही है। आजीविका मिशन में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाकर गरीबी उन्मूलन की योजना है। इसके तहत सात करोड़ परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने का लक्ष्य है। इसमें सरकारी, गैर सरकारी संगठनों, एजेंसियों, शिक्षण संस्थानों के साथ सिविल सोसाइटियों और अन्य संगठनों के सहयोग से गरीबी हटाने वाली इस योजना को रफ्तार देनी है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को इन संस्थानों से विचार विमर्श कर राज्यों के मार्फत योजना पर अमल कराना है। योजना के तहत ग्रामीण युवाओं को मुफ्त प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें रोजगार शुरू करने के लिए बैंकों से कर्ज और तकनीकी सहयोग देने का प्रावधान है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से मदद मुहैया कराई जानी है। दक्षिणी राज्यों में स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना के समय से ही गरीबी उन्मूलन में काफी सफलता मिली है। केरल-आंध्र-तमिलनाडु जैसे राज्यों में स्वयं सहायता समूह बनाने की योजना सफल रही है, जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार शुरू करने में भी मदद मिली है।
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