खस्ताहाल सड़कों से शहरवासियों को निजात देने के लिए यूपी में 5 वर्षो के दौरान 58 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की दरकार होगी। इतनी अधिक धनराशि जुटाना फिलहाल नगरीय निकायों के लिए संभव नहीं है इसलिए सड़कों को दुरुस्त करने के मद्देनजर 12वीं पंचवर्षीय योजना में अन्य स्त्रोत से भी धन की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। दरअसल, सूबे के 5838 वर्ग किमी में फैले शहरों (630 नगरीय निकायों का कुल क्षेत्रफल) में तकरीबन 74315 किमी कच्चे-पक्के रास्ते हैं। खास बात यह है कि इसमें से 48 हजार किमी ही पक्की सड़कें हैं जबकि 15852 किमी खडं़जा व अर्द्धपक्की व 10 हजार किमी आज भी कच्ची सड़कें हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 2012 से 2017 तक के दौरान शहरी क्षेत्र की सड़कों को दुरुस्त करने के लिए 58,329 करोड़ रुपये की बड़ी धनराशि की जरूरत आंकी गई है। इसमें 14,981 करोड़ रुपये तो सिर्फ 13 नगर निगमों की सड़कों को चमकाने के लिए ही चाहिए होंगे। 194 नगर पालिका परिषद की सड़कों के लिए 31,805 करोड़ रुपये व 423 नगर पंचायतों के रास्तों को ठीक रखने के लिए 11,747 करोड़ रुपये की दरकार होगी। सूबे की ज्यादातर निकाय वित्तीय संकट से जूझ रही हैं। ऐसे में शहरवासियों को चकाचक सड़कें मुहैया कराना फिलहाल निकायों के लिए संभव नहीं है। अगले पांच वर्षो के दौरान निकायों द्वारा बमुश्किल 10 हजार करोड़ रुपये सड़कों पर खर्च किए जाने का अनुमान लगाया गया है। विभागीय जानकारों का मानना है कि केंद्र की जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूवल मिशन के तहत सड़कों के लिए चार हजार करोड़ रुपये और हाथ लग सकते हैं। सड़कों पर निजी सहभागिता (पीपीपी) से भी 4655 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान लगाया गया है। शहरी सड़कों के लिए पांच हजार करोड़ रुपये राज्य सरकार से व 6760 करोड़ संबंधित विकास प्राधिकरणों से जुटने की भी उम्मीद जताई गई है।
Wednesday, March 14, 2012
अनदेखी से पिछड़ा ग्रामीण आजीविका मिशन
केंद्र व राज्य सरकारों की अनदेखी के चलते गरीबी उन्मूलन वाला राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बहुत पिछड़ गया है। यही वजह है कि गरीबी मिटाने वाले इस मिशन के बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च तक नहीं हो पाया है। चालू वित्त वर्ष के दौरान योजना के क्रियान्वयन में उत्तरी राज्यों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। उत्तरी राज्यों की अनदेखी ने आजीविका मिशन के पटरी से उतरने की आशंका है। इस बारे में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि आगामी वित्त वर्ष में इस मिशन को खास अहमियत दी जाएगी। उन्होंने माना कि चालू वर्ष में पूरा बजट खर्च नहीं हो पाया है। स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना में थोड़ी तब्दीली कर चालू वित्त वर्ष के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन राजस्थान के बांसवाड़ा में बडे़ जोरशोर से संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों से शुरू कराया गया था। उस दौरान बड़े-बड़े दावे भी किए गए थे। साल भर के भीतर एक लाख लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर कर दिया जाएगा। 4.5 करोड़ परिवारों के कम से कम एक सदस्य को हर हाल में अगले दो सालों के भीतर एसएचजी से जोड़ने की योजना है, लेकिन चालू साल में यह योजना बहुत पीछे चल रही है। आजीविका मिशन में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाकर गरीबी उन्मूलन की योजना है। इसके तहत सात करोड़ परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने का लक्ष्य है। इसमें सरकारी, गैर सरकारी संगठनों, एजेंसियों, शिक्षण संस्थानों के साथ सिविल सोसाइटियों और अन्य संगठनों के सहयोग से गरीबी हटाने वाली इस योजना को रफ्तार देनी है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को इन संस्थानों से विचार विमर्श कर राज्यों के मार्फत योजना पर अमल कराना है। योजना के तहत ग्रामीण युवाओं को मुफ्त प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें रोजगार शुरू करने के लिए बैंकों से कर्ज और तकनीकी सहयोग देने का प्रावधान है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से मदद मुहैया कराई जानी है। दक्षिणी राज्यों में स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना के समय से ही गरीबी उन्मूलन में काफी सफलता मिली है। केरल-आंध्र-तमिलनाडु जैसे राज्यों में स्वयं सहायता समूह बनाने की योजना सफल रही है, जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार शुरू करने में भी मदद मिली है।
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