मनरेगा के तहत दी जाने वाली मजदूरी को लेकर चल रही रस्साकशी की पृष्ठभूमि में आखिरकार सुप्रीमकोर्ट को केंद्र सरकार से कहना पड़ा कि वह मनरेगा के तहत काम करने वालों की दैनिक मजदूरी तय करते समय विभिन्न राज्यों में तय न्यूनतम मजदूरी का भी ध्यान रखे। बीते महीने सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत दिए जाने वाले मजदूरी को विभिन्न राज्यों में दिए जाने वाले न्यूनतम पारिश्रमिक के समकक्ष लाया जाए। न्यायमूर्ति सिरियक जोसेफ और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने सॉलीसिटर जनरल रोहिंगटन नरीमन से कहा कि राज्य सरकारों के न्यूनतम पारिश्रमिक को ध्यान में रखकर मजदूरी तय की जाए। पीठ ने कहा, यह लाभार्थी विधान है तो फिर न्यूनतम मजदूरी और मनरेगा कानून के तहत दिए जाने वाले पारिश्रमिक के बीच भेदभाव क्यों? केंद्र सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी जिसने 23 सितंबर को कहा था कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत पारिश्रमिक राज्य सरकारों द्वारा कृषि श्रमिकों के लिए तय न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं हो सकती। इसने यह भी कहा था कि केंद्र सरकार को उन मजदूरों को बकाया भुगतान करना चाहिए जिन्हें कम भुगतान किया गया। साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि जिन मजदूरों को कम पैसा मिला है, केंद्र को चाहिए कि वह उन्हें एरियर दे। सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग करते हुए दलील दी है कि इस फैसले से हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। साथ ही सरकार ने अपनी दलील में यह भी तर्क दिया कि मनरेगा की शुरुआत ही इसलिए की गई थी कि जिन लोगों को कहीं और काम न मिलता हो, उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध हो सकें। इसलिए यह प्रावधान न्यूनतम मजदूरी तय करने के तर्क से एकदम भिन्न है। हालांकि केंद्र सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत दी जाने वाले मजदूरी को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ने की बात मान ली है। फिर भी वह इस मामले में संविधानप्रदत्त न्यूनतम मजदूरी देने में संकोच कर रही है, जबकि देश के कई राज्यों में अब भी मनरेगा के तहत दी जाने वाली मजदूरी न्यूतम मजदूरी से भी कम है। गौरतलब है कि मनरेगा के तहत दैनिक मजदूरी विभिन्न राज्यों में 118 रुपये से लेकर 181 रुपये तक अलग- अलग है। देश के 14 राज्यों में मनरेगा का मेहनताना न्यूनतम मजदूरी से कम है जिसमें कर्नाटक भी शामिल है। राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी 2011 से 115 रुपये है। किसी राज्य में इससे कम मजदूरी नहीं तय हो सकती। पर हैरान करने वाली बात यह है कि 14 राज्यों में आज भी मनरेगा के तहत दी जा रही मजदूरी इससे कम थी। आज उसे 100 रुपये पर स्थाई कर दिया गया है। मूल्य सूचकांक के अनुसार इसमें परिवर्तन होगा पर क्या यह काफी होगा? यह ठीक है कि दो साल पहले ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मनरेगा के लिए 100 रुपये की न्यूनतम मजदूरी सीमित कर दी थी और उसने खेतिहर मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर इसमें सालाना संशोधन करने के बारे में कुछ नहीं किया। न्यूनतम मजदूरी में संशोधन की बात ज्यां द्रेज की अगुआई वाली कमेटी ने की थी जिसकी सरकार अब तक अनदेखी करती आ रही है। अटार्नी जनरल ने भी सवाल उठाया है कि क्या न्यूनतम वेतन से कम वेतन देना इस कानून में निहित सामाजिक व जनहित को तिलांजलि देने का काम नहीं करेगा? रोजगार गारंटी कानून का न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के साथ विवाद की मूल वजह यह है कि जहां मनरेगा कामगारों की मजदूरी केंद्र सरकार तय करती है, वहीं न्यूनतम मजदूरी तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। पर ज्यादातर राज्यों में न्यूनतम मजदूरी इसके मुकाबले ज्यादा है। चूंकि केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत 100 रुपये मजदूरी तय की है, इसलिए इससे ज्यादा भुगतान नहीं किया जा रहा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सिफारिशों को लागू करने का मतलब होगा कि या तो राज्य के कानून लागू हों या फिर केंद्र मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी में संशोधन करे। मौजूदा समय में दोनों दरों में किसी तरह की समानता नहीं है। अगर राजस्थान में मनरेगा के तहत मजदूरी 100 रुपये है तो राज्य में न्यूनतम मजदूरी 135 रुपये है। केरल में न्यूनतम मजदूरी 175 रुपये है, वहीं मनरेगा के तहत 120 रुपये का भुगतान किया जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के सेक्शन 6 (1) में कहा गया है कि केंद्र इस अधिनियम के लिए मजदूरी की दर विशिष्ट रूप से निर्देशित कर सकता है। विभिन्न राज्य इसमें थोड़ा बहुत फेरबदल कर सकते हैं, लेकिन केंद्र द्वारा निर्देशित न्यूनतम मजदूरी से नीचे नहीं जा सकते। इसका मतलब है कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का उल्लंघन फिलहाल हो रहा है। सेक्शन 6(2) कहता है कि जब तक एक अलग दर तय नहीं की जाती खेतिहर मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए। न्यूनतम मजदूरी कानून, 1948 राज्य सरकारों व केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वे अधिसूचित रोजगारों में न्यूनतम मजदूरी तय करे। कानून यह भी कहता है कि हर 5 साल में न्यूनतम मजदूरी में बदलाव होना चाहिए। 15वें राष्ट्रीय श्रमिक सम्मेलन, 1957 में न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए जरूरत आधारित फार्मूला इजाद किया गया, जो न्यूनतम भोजन, कपड़ा व ईधन के खर्चे को ध्यान में रखकर दिया गया। इन सिफारिशों को सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन बनाम केरल सरकार 1961 के मामले में बाध्यकारी बनाया और कामगार बनाम मैनेजमेंट ऑफ रेप्टोकोस बेट 2005 कंपनी लिमिटेड (1992) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यूनतम मजदूरी के आधार को और व्यापक व बाध्यकारी बनाया। इससे भी आगे बढ़कर सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि न्यूनतम मजदूरी न देगा बेगार व जबरन श्रम की श्रेणी में आता हैं जो संविधान की धारा 23 में प्रतिबंधित है। इससे भी आगे सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जबरन श्रम कई तरीकों से माना जा सकता है जिसमें गरीबी व जरूरतों का पूरा न होना शामिल है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि एक जनवरी 2009 के सरकारी नोटीफिकेशन को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया, लेकिन भारत सरकार इसे पूरे देश में न मानने पर अड़ी हुई है। अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह के मुताबिक न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना बंधुआ मजदूरी है। ऐसे में रोजगार सृजन की बड़ी योजना के तहत सरकार खुद अपने कानून का उल्लंघन कर रही है। यहां एक अहम सवाल और है कि आज गरीब व अमीर के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में एक मात्र मनरेगा ही ऐसा कानून है जो समाज में सबसे नीचे बैठे लोगों को मूलभूत अधिकार देता है। न्यूनतम मजदूरी को न मानना पूरी तरह असंवैधानिक है। यह भारत के मानवीय अधिकारों का खुला उल्लंघन है। अत: सरकार को चाहिए कि वह मेहनताना के विवाद को ज्यादा तूल न देकर योजना के कार्यान्वयन की खामियों को दूर करने पर ध्यान दे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, February 29, 2012
Monday, February 27, 2012
ताकि तेजी से घूमे विकास का पहिया
Saturday, February 18, 2012
भ्रष्टाचार में फंसी मनरेगा के बजट में कटौती के आसार
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की अति महत्वाकांक्षी मनरेगा भ्रष्टाचार पर केंद्र व राज्यों की खींचतान का शिकार हो गई है। चालू साल के लिए आम बजट में योजना को आवंटित धन का आधा भी खर्च नहीं हो पाया है, जिसका सीधा असर गरीबों की रोजी-रोटी पर पड़ा है। यही वजह है कि राज्यों के रवैये से नाखुश केंद्र सरकार आगामी आम बजट में इसके आवंटन में भारी कटौती कर सकती है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत संचालित यह योजना चौतरफा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। योजना के क्रियान्वयन में हुए घपलों को देखते हुए लगभग एक दर्जन बड़े राज्यों में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से जांच कराई जा रही है। जांच के डर से भी तमाम राज्यों में योजना के तहत अंधाधुंध होने वाले खर्च पर लगाम लगी है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अब तक 22 हजार करोड़ रुपये जारी किए हैं, लेकिन इसके विपरीत 20 हजार करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हो पाए हैं। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मार्च के आखिर तक थोड़ा बहुत खर्च और बढ़ सकता है। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल जहां 5.4 करोड़ लोगों को रोजगार मिला था, वहीं चालू साल में केवल 3.7 करोड़ लोगों को रोजगार मिल पाया है। दरअसल मनरेगा में भारी गड़बडि़यों की शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। योजना के पहले दो वर्षो में राज्यों की मांग के आधार पर केंद्र से धन जारी किया जाता था, लेकिन सत्ता में लौटने के बाद से संप्रग सरकार ने योजना की निगरानी पर ध्यान केंद्रित किया है। यही वजह है कि चौतरफा गड़बडि़यों की शिकायतें मिलीं, जिनकी जांच शुरू करा दी गई। लिहाजा अंधाधुंध खर्च पर पाबंदी लगी है।
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