Wednesday, June 29, 2011

पंचायतों में तैनात होंगे एमबीए-बीटेक धारक


पैसा पानी की तरह बहाने के बावजूद गांवों और गांववालों की शक्ल-सूरत बदलने की कोशिश नाकाम होने के बाद केंद्र सरकार का भरोसा अब सरपंचों या ग्राम प्रधानों से उठ गया है। गांव को शहरों की सुविधा से लैस करने का जिम्मा अब केंद्र सरकार पेशेवर एमबीए और बी.टेक इंजीनियरों से कराएगी। ग्रामीण विकास कार्यों में सरपंचों की भूमिका सलाह देने तक ही सीमित की जाएगी। ग्रामीण बुनियादी ढांचे के प्रबंधन के लिए एमबीए और तकनीकी जरूरतें पूरी करने के लिए बी.टेक इंजीनियरों की नियुक्ति की योजना पर केंद्र सरकार तेजी से चल पड़ी है। मनरेगा, वाटरशेड, प्रोग्राम और स्वच्छता राष्ट्रीय आजीविका मिशन, इंदिरा आवास और अन्य केंद्रीय योजनाओं के संचालन का दायित्व अब इन्हीं के हाथों में होगी। एमबीए और बी.टेक की डिग्री वाले इन युवाओं की नियुक्ति की जरूरत तब महसूस की गई, जब हजारों करोड़ की ग्रामीण योजनाएं फ्लॉप हो गईं। ग्राम प्रधान, सरपंच और विकास खंडों पर तैनात कर्मचारियों व अधिकारियों की गैर पेशेवर कार्यप्रणाली से केंद्रीय योजनाओं का बंटाधार हो गया। केंद्र की वित्तीय मदद से संचालित एक दर्जन से अधिक योजनाओं में जमकर धन की बर्बादी हुई। मनरेगा जैसी भारी भरकम योजना अनियमितता की भेंट चढ़ गई। जो काम कराए गए, उनमें नियम कानून की धज्जियां तो उड़ी ही, तकनीकी गड़बडि़यां भी जगजाहिर हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने देश की सभी ग्राम पंचायतों में मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन(एमबीए) की डिग्री वाले प्रबंधक और बी.टेक वाले इंजीनियर की नियुक्ति का फैसला लिया है। अनुबंध के आधार पर होने वाली इन नियुक्तियों में एमबीए को मासिक तौर पर जहां 12 हजार रुपये वहीं बी.टेक डिग्री धारक इंजीनियर को मासिक 10 हजार रुपये मिलेंगे। राज्य सरकारें अपना योगदान देकर, इस वेतन को बढ़ा सकती हैं। केंद्र ने राज्यों से आग्रह भी किया है कि वे अपना भी हिस्सा जोड़कर नियुक्तियां करें। देश की कुल ढाई लाख ग्राम पंचायतों में ये नियुक्तियां किए जाने की योजना है। राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने इस दिशा में पहल भी कर दी है। यानी कुल पांच लाख से अधिक एमबीए और इंजीनियरों की नियुक्ति के नए अवसर भी खुल गए हैं। ग्रामीण विकास मंत्री विलास राव देशमुख ने बताया कि सरकार की इस पहल से ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण में तेजी आएगी। बगैर योजना और बिना किसी तकनीकी सलाह के कराए गए विकास कार्यो में भी सुधार किया जाएगा। युवा प्रबंधकों और इंजीनियरों के वेतन व अन्य व्यय को मनरेगा समेत अन्य योजनाओं के प्रशासनिक खर्च से समायोजित किया जाएगा.

Saturday, June 4, 2011

कैसे मिले लाभ, गांव पहले ही अधिग्रहीत



नोएडा व ग्रेटर नोएडा के अधिकांश गांवों में जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई पूरी हो चुकी है। कुछ ही गांव ऐसे बचे हैं, जिनमें अधिग्रहण होना शेष है। जिन गांवों में अधिग्रहण हो चुका है, उनमें नई नीति का लाभ नहीं मिलेगा। इसका लाभ ग्रेटर नोएडा फेस-दो व यमुना एक्सप्रेस वे के किसानों को अधिक होगा। ग्रेटर नोएडा के जिन एक दर्जन गांवों में गत माह धारा-4 की कार्रवाई की गई थी, उन्हें नीति का लाभ मिलेगा। सरकार ने नई अधिग्रहण नीति को 2 जून से लागू किया है। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण 113 गांवों में से लगभग 80 गांवों की जमीन अधिग्रहित कर चुका है। यहीं स्थिति नोएडा प्राधिकरण क्षेत्र की है। प्राधिकरण अब ग्रेटर नोएडा फेस-दो में 177 गांवों की जमीन अधिग्रहित करेगा। यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में भी भट्टा पारसौल, मुतैना, आछ़ेपुरा, ठसराना, निलौनी-मिर्जापुर, शाहपुर, मूंज खेड़ा, ऊंची दनकौर, रुस्तमपुर, जगनपुर-अफजलपुर आदि एक दर्जन गांवों में जमीन अधिग्रहित हो चुकी है। इन गांवों के किसानों को नई नीति का लाभ नहीं मिलेगा। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने गत माह वैदपुरा, रोजा जलालपुर, जान समाना व चिपियाना बुजुर्ग में धारा-4 की कार्रवाई की थी। इनमें अभी धारा-6 की कार्रवाई नहीं हुई है। प्राधिकरण सादुल्लापुर, जलपुरा, मिलक, खोदना कला, सुनपुरा, खेड़ी-भनौता, हल्दोनी व भूड़ा रावल में धारा-4 की कार्रवाई करने जा रहा है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार इन सब गांवों में नई नीति का किसानों को लाभ मिलेगा। भट्टा पारसौल के ग्रामीणों में नई नीति को लेकर उत्साह नहीं भूमि अधिग्रहण को लेकर भट्टा पारसौल के किसानों में पनपे असंतोष के कारण पूरे प्रदेश में नई जमीन अधिग्रहण की नीति लागू हो गई। इसका फायदा जमीन अधिग्रहण से प्रभावित प्रदेश भर के किसानों को मिलेगा। वहीं नई नीति को लेकर भट्टा पारसौल के किसानों में कोई उत्साह नहीं है। किसान अभी नीति को लेकर असंमजस की स्थिति में है। इन गांवों के ज्यादातर किसानों ने मुआवजा उठा लिया है। इसलिए वे नई नीति का लाभ नहीं उठा सकेंगे। लखनऊ की पंचायत से लौटने के बाद भी उनमें खुशी देखने को नहीं मिल रही है। वेद प्रकाश शर्मा का कहना है कि नई नीति में किसान खेतिहर मजदूरों के लिए कोई योजना नहीं है। उनके सामने जीविका का संकट पैदा हो गया है। जय प्रकाश का कहना है कि जमीन अधिग्रहण को लेकर आंदोलन किया गया लेकिन इसका लाभ आसपास के ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। नई नीति कई ऐसे बात है जिनको लेकर लेकर संशय बना हुआ है। सत्यवीर का कहना है कि नई नीति उन किसानों को भी शामिल किया जाना चाहिए था जिनकी जमीन का अधिग्रहण हो चुका है, जमीन छीन जाने पर उनके बच्चे बेरोजगार हो गए है, उनके रोजगार के लिए कोई प्रावधान होना चाहिए। श्रीपाल का कहना है कि गांव के गरीब परिवार को दो जून की रोटी कास्तकारों के कार्यो से मिलती थी। ऐसे परिवारों को नई व पुरानी नीति के साथ आवास, रोजगार, पीडि़तों को मदद मिले।

Wednesday, June 1, 2011

मनरेगा का सच : दो साल में एक लाभार्थी


मनरेगा का मौसम अफसरों की फाइलों में भले गुलाबी हो, मगर हकीकत में पतझड़ ही दिखता है। निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना में 2009 में हर विकास खंड के लिए 120 हेक्टेयर में काम कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया और दो साल में अधिकारी सिर्फ एक लाभार्थी खोज सके। गरीबों की जमीन पर मनरेगा के खर्च से खेती कराकर घर बैठे रोजगार मुहैया कराकर उनकी आर्थिक दशा संवारने की गरज से निजी भूमि पर उद्यानीकरण परियोजना शुरू हुई थी। इसके तहत उनकी जमीन पर मटर, केला, पपीता, फ्रांसबीन, लोबिया, कद्दूवर्गीय सब्जियां, मूली-गाजर, पालक, धनिया, मेथी, परवल, प्याज, देशी गुलाब, गुल्दावरी, गेंदा, मैंथा के अलावा टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, भिंडी, बैंगन की शंकर प्रजातियों की खेती कराई जानी थी। खेत की तैयारी, निराई-गुड़ाई, सिंचाई आदि कामों का भुगतान फौरी तौर पर लाभार्थी को करना होता है, बाद में दो किश्तों में ग्राम पंचायत से उसे खर्च राशि के भुगतान की व्यवस्था है। बीज और पौधे की सप्लाई उद्यान विभाग को करना था और उसी के पर्यवेक्षण में फसलों की बुवाई-पौधरोपण होना था। पट्टाधारक, बीपीएल, इंदिरा आवास के लाभार्थी और अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को इसका लाभ दिया जाना था। इस बार इसमें लघु एवं सीमांत कृषक को भी शामिल किया गया है। उक्त चार श्रेणियों के लाभार्थी न मिलने पर ही इन किसानों को लाभ मिलेगा। तत्कालीन प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने 09 में हर ब्लाक में 125 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित करते हुए परियोजना पर काम कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दो साल में लखावटी ब्लाक के नगला करन में सिर्फ एक लाभार्थी के यहां पपीते के 4500 पौधों की सप्लाई उद्यान विभाग के राजकीय पौधशाला ऊंचागांव से हुई। यह रकबा सिर्फ एक हेक्टेयर के आसपास बैठता है। बाकी कोई काम ही नहीं हुआ। कम से कम उद्यान विभाग ने कोई सप्लाई नहीं दी। इस वित्तीय वर्ष से यह परियोजना स्वतंत्र रूप से उद्यान विभाग को सौंप दी गई है.