महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में जॉब कार्ड धारकों में आधे परिवारों ने काम ही मांगा। हिमाचल में अब तक 11 लाख परिवारों को जारी जॉब कार्ड के मुकाबले सिर्फ 5.26 लाख लोग ही काम मांगने आए। उनमें भी 4.82 लाख परिवारों को काम दिया गया। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में 6.8 लाख जॉब कार्ड के मुकाबले 3.16 लाख परिवार ही काम मांगने आए। उनमें से 3.08 लाख परिवारों को काम मुहैया भी करवाया गया है। बताते चलें कि देश में अब तक मनरेगा के तहत 12 करोड़ से अधिक जॉब कार्ड जारी किए जा चुके हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक हिमाचल में मनरेगा के तहत जॉब कार्ड बनवाने वालों में 47.87 फीसदी ही काम मांगने आए। इनमें सबसे ज्यादा संख्या चंबा जिले की रही। यहां के 98 हजार जॉब कार्ड धारक परिवारों में 63 हजार लोगों ने रोजगार मांगा जिनमें 55 हजार को वास्तव में रोजगार मिल पाया। बिलासपुर इस लिहाज से फिसड्डी रहा। यहां 53 हजार जॉब कार्ड धारकों में सिर्फ 14 हजार ने ही काम की मांग की और इनमें से 12 हजार को रोजगार मुहैया करवाया गया। इसी तरह हमीरपुर में 79 हजार जॉब कार्ड धारकों में सरकार के मुताबिक सिर्फ 25 हजार ने ही काम की मांग की और उनमें 23 हजार को रोजगार मिला। सरकारी दस्तावेजों को सही मानें तो ऊना में 68 हजार जॉब कार्ड धारकों में से रोजगार मांगने वालों में सिर्फ 17 हजार थे। उनमें 16 हजार को ही रोजगार दिया गया। सरकार के मुताबिक राज्य में 11 लाख परिवारों के जॉब कार्ड बनाए जा चुके हैं। राज्य के 12 जिलों में सबसे ज्यादा कांगड़ा में 2.26 लाख जाब कार्ड बनाए गए हैं। मंडी में 2.06 लाख परिवारों को यह कार्ड मिला है। चंबा में अब तक 98 हजार, सिरमौर में 73 हजार, बिलासपुर में 53 हजार, हमीरपुर में 79 हजार, किन्नौर में 13 हजार, कुल्लू में 86 हजार, शिमला 1.10 लाख, सोलन में 77 हजार और ऊना में 68 हजार जॉब कार्ड दिए गए हैं। सबसे कम लाहौल स्पीति में 5,754 जॉब कार्ड जारी हुए हैं। वर्ष 2010-11 के दौरान हिमाचल में कुल 2.19 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ। इसी तरह 2009-10 के दौरान 2.84 करोड़ मानव दिवस और 2008-09 के दौरान 2.05 करोड़ मानव दिवस का रोजगार मिल सका। हिमाचल की 90 फीसदी आबादी गांवों में रहती है। गांवों में रहने वाली आबादी के लिहाज से राज्य का औसत देश में सबसे ज्यादा है। ताजा जनगणना के मुताबिक राज्य की कुल आबादी 68.56 लाख है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक अब तक जम्मू-कश्मीर में6,81,500 जॉब कार्ड बने हैं। वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान मनरेगा के तहत जॉब कार्ड वालों में सिर्फ 46.37 फीसदी ही काम मांगने आए। सरकार का दावा है कि इनमें 3,16,052 लोग पिछले वित्त वर्ष में काम मांगने पहुंचे। इनमें 3,08,184 लोगों को काम मिला। अनंतनाग में जारी 25,140 जॉब कार्ड के मुकाबले 20,092 लोग काम मांगने पहुंचे। जम्मू में 40,336 में से पिछले वित्त वर्ष के दौरान 12,319 लोग काम मांगने पहुंचे और उनमें से 11,970 लोगों को काम मिला। इस लिहाज से सबसे खराब स्थिति कारगिल की रही। यहां 3,727 लोगों के जॉब कार्ड होने के बावजूद एक भी आदमी को काम नहीं मिला। शोपियां में जारी 6,158 जॉब कार्ड के मुकाबले यहां सिर्फ 1,967 लोग ही काम के लिए पहुंचे। उनमें से 1,944 लोगों को काम दिया गया। कुपवाड़ा में 30,574 लोगों के जॉब कार्ड जारी किए जा चुके हैं, इसके बावजूद पिछले साल सिर्फ 7,655 लोग काम के लिए पहुंचे और उनमें से 7,358 लोगों को काम मिला। किश्तवार में 36,608 जॉब कार्ड के मुकाबले 13,288 लोग काम के लिए पहुंचे और 13,156 लोगों को काम दिया गया। सांबा के 19,964 जॉब कार्ड धारकों में 9,922 लोग मजदूरी करने पहुंचे। उनमें से 9,756 लोगों को काम मिला। पंजाब में मजदूरी मांगने आए सिर्फ 2.37 लाख जॉब कार्ड वाले मनरेगा के तहत पंजाब में अब तक 8.61 लाख जॉब कार्ड जारी किए जा चुके हैं। सरकार के मुताबिक बीते वित्त वर्ष के दौरान इनमें से सिर्फ 2.37 लाख परिवार ही मनरेगा के तहत काम मांगने आए और उनमें अधिकांश को काम मुहैया करवाया गया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक पंजाब में वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान मनरेगा के तहत जॉब कार्ड बनवाने वालों में से सिर्फ 27.6 फीसदी ही वास्तव में काम मांगने आए। आंकड़ों के मुताबिक मनरेगा के शुरू होने से अब तक राज्य में 8,61,834 जॉब कार्ड बन चुके हैं।
Monday, April 9, 2012
Tuesday, April 3, 2012
यूपी-बिहार पेयजल पर खर्च करने में फिसड्डी निकले
पेयजल की किल्लत से जूझ रहे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड जैसे राज्य केंद्र से आवंटित धन का इस्तेमाल करने में भी फिसड्डी निकले। ये राज्य 2011-12 में दिसंबर तक पेयजल के लिए केंद्र से मिली राशि का 60 फीसदी खर्च नहीं कर पाए। इस खराब प्रदर्शन का इन राज्यों को दोहरा नुकसान हुआ है। एक तो इससे पेयजल परियोजनाएं पूरी नहीं हो पाई और दूसरे ग्रामीण विकास मंत्रालय से मिलने वाली बोनस राशि (अतिरिक्त मदद) से भी इन्हें वंचित होना पड़ा। इसके विपरीत पंजाब, हरियाणा और गुजरात समेत आधा दर्जन से अधिक राज्यों ने पेयजल आपूर्ति में बेहतर प्रदर्शन करके बोनस का लाभ लिया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर बधाई के साथ बोनस तोहफा भी दिया है। दरअसल जयराम रमेश ने दिसंबर 11 तक पेयजल आपूर्ति के लिए आवंटित धन का 60 फीसदी हिस्सा खर्च कर देने वाले राज्यों को बोनस राशि देने का एलान किया था। बोनस के रूप में मिलने वाली अतिरिक्त राशि कुल आवंटन का लगभग 25 फीसद है। जयराम रमेश ने कहा कि चालू वित्त वर्ष में पूर्ण स्वच्छता और पेयजल आपूर्ति में अच्छा कार्य करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए धन की कोई कमी नहीं आने पाएगी। हरियाणा को स्वच्छता व पेयजल आपूर्ति में बेहतर प्रदर्शन करने पर 35 करोड़ रुपये और पंजाब को 46.82 करोड़ रुपये को बोनस दिया गया है। गुजरात ने पेयजल के मद में आवंटित 423 करोड़ रुपये में से 300 करोड़ से अधिक दिसंबर 11 तक खर्च कर लिए थे। इसके एवज में गुजरात को 100 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मदद मुहैया कराई गई है। इसके अलावा तमिलनाडु को 98 करोड़ रुपये और असम को 100 करोड़ रुपये बोनस के तौर पर दिए गए हैं। इसके अलावा त्रिपुरा को 30 करोड़, मेघालय को 31 करोड़ और अरुणाचल प्रदेश को 61 करोड़ रुपये बोनस के रूप में मिले हैं।
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