Saturday, September 22, 2012

विकास-ढांचे पर उठते सवाल





विश्लेषण अवधेश कुमार
पिछले दो दशकों में विकास ढांचों की भेंट चढ़ते या भेंट चढ़ने से भयभीत समुदायों ने न जाने कितने आंदोलन किए। अनेक आंदोलन अब भी चल रहे हैं। पर सरकारें प्राय: उन्हें विकास विरोधी बताकर दबाने या नजरअंदाज करने की कोशिश करती हैं क्या अब समय नहीं आ गया है जब हम ठहरकर इस विकास ढांचे पर पुनर्विचार करें? दुनिया के अन्य देशों में भी इस पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं और इसकी भयानक परिणतियां सामने आने लगी हैं
मध्यप्रदेश में पानी के बीच रहते हुए किया जाने वाला आंदोलन, जिसे जल सत्याग्रहकहा जा रहा है, इन दिनों सुर्खियों में है तो वह अस्वाभाविक नहीं है। एक जगह तो सरकार ने आंदोलनकारियों की मांगें मान ली पर अन्य जगह जल में खड़े-बैठे लोगों को पुलिस ने हटा दिया और सरकार ने मांग मानने से साफ इंकार कर दिया। यकीनन खंडवा जिले के घोघलगांव सहित आसपास के गांवों ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया है। हालांकि सरकार का अपना तर्क है, किंतु कहा जा रहा है कि आंदोलनकारियों की दुनिया में यह गर्व से सिर ऊंचा करने का प्रसंग बन गया है। लेकिन यह प्रसंग ऐसा नहीं है जिससे एक देश के रूप में भारत का सिर गर्व से उठ सके। इसके विपरीत यह भारतीय राजव्यवस्था से निकली नीतियों पर गहरे प्रश्न खड़ा करने वाला है। 16 दिनों तक जल के अंदर सत्याग्रह का यह पहला उदाहरण बना। जल सत्याग्रह करने वालों के शरीर गलने लगे थे। निस्संदेह, इसमें समाप्त दिख रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं की भूमिका थी, जिन्होंने लोगों को तैयार किया। किंतु लोगों के समक्ष बांध में पानी की ऊंचाई बढ़ाए जाने से उत्पन्न परिस्थितियों में आंदोलन के कारण निहित थे। जब उनके परंपरागत तरीके से जीवन यापन के चक्र को ही रोक दिया जाए और उनको आंदोलन के लिए कोई समझाए तो उनमें से एक वर्ग अवश्य इसके लिए तैयार हो जाएगा, क्योंकि उम्मीद का यही एक रास्ता नजर आ सकता है। इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि सरकार की ओर से उनके साथ न्याय न किए जाने के कारण वे आंदोलन की राह पर निकले। किंतु न्याय किया जाना जितना सुनने में आसान लगता है उतना है नहीं। घोघलगांव के संदर्भ में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रशंसा की जा सकती है, क्योंकि उन्होंने आंदोलनकारियों की सारी मांगें मान लीं। प्रभावितों का अब न केवल उचित पुनर्वास होगा, बल्कि ओंकारेश्वर बांध का जल स्तर 189 मीटर ही रहेगा। सरकार के पास जो भूमि बैंक है, उससे उन्हें खेती के लिए जमीन मिलेगी बशत्रे प्राप्त मुआवजे की आधा रकम तथा विशेष पुनर्वास अनुदान वे 90 दिनों में लौटा दें। प्रश्न उठ सकता है कि सरकार ने मांग मानने में इतनी देरी क्यों की? किंतु ध्यान दीजिए, मुख्यमंत्री चौहान ने मांग मानने के बाद कहा कि इससे 20 हजार हेक्टेयर कम सिंचाई हो पाएगी तथा 120 मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं होगा। विकास का जो मौजूदा ढांचा है उसमें यह सामान्य बात नहीं है। कोई सरकार कुछ सौ ग्रामीणों की मांग के एवज में ऐसी योजनाओं की आसानी से बलि चढ़ाने को तैयार नहीं हो सकती। शिवराज सिंह के लिए निर्णय करना आसान नहीं रहा होगा। न केवल इस विकास नीति के समर्थक नौकरशाह-विशेषज्ञ उन्हें इसके विरुद्ध आगाह कर रहे होंगे; बल्कि उन परियोजनाओं में जिनका स्वार्थ संलग्न है, वे भी कई प्रभावी तरीकों से मुख्यमंत्री पर ऐसा न करने के लिए दबाव बना रहे होंगे। देश भर में पिछले दो दशकों के अंदर इन विकास ढांचों की भेंट चढ़ते या भेंट चढ़ने से भयभीत समुदायों ने न जाने कितने आंदोलन किए और इस समय भी अनेक आंदोलन चल रहे हैं, पर सरकारें प्राय: उन्हें विकास विरोधी बताकर दबाने या नजरअंदाज करने की कोशिश करती हैं। उसके स्वरूप में अंतर होता है, पर मूल बातें वही होती हैं। कहीं सड़कों के नाम पर बस्तियां उजड़ती हैं तो कहीं उद्योगों, कारोबारों, विशेष आर्थिक क्षेत्र और बाजार आदि के नाम पर सदियों से बनी और विकसित बस्तियां नष्ट होती हैं। इसे विकास मानते हुए राज्य और विकास नीति के समर्थक उचित करार देते हैं। इस तरह देखें तो मध्यप्रदेश सरकार का ग्रामीणों की मांग मानना धारा के विपरीत नजर आएगा। देख सकते हैं कि खंडवा जिले में ही हरदा के खरदाना में सरकार ने किस तरह का व्यवहार किया। पुलिस ने बेशक आंदोलनकारियों को चोट नहीं पहुंचाई, पर वहां से हटने के लिए मजबूर कर दिया। साफ है कि घोघलगांव सहित कुछ गांवों की मांग कतिपय कारणों से भले मान ली गई, लेकिन सब जगह ऐसा नहीं हो सकता। वर्तमान विकास का ढांचा इसकी अनुमति नहीं दे सकता, क्योंकि इसमें सारे आंकड़े उल्टी दिशा में जाएंगे और आपको विकास विरोधी भी मान लिया जाएगा। आंदोलन की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो स्थिति को समझना आसान हो जाएगा। नर्मदा घाटी के खंडवा जिले में दो बांध हैं, इंदिरा सांगर एवं ओंकारेश्वर। सिंचाई का क्षेत्र एवं बिजली उत्पादन बढ़ाने के घोषित लक्ष्य से इंदिरा सागर में पानी का स्तर लगभग 2 मीटर तथा ओंकारेश्वर में 4 मीटर से ज्यादा उठाने का फैसला किया गया। इसके विरुद्ध नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोग न्यायालय गए। उच्चतम न्यायालय ने उनके दावों को खारिज करते हुए इंदिरा सागर बांध को 260 से 262.13 मीटर तथा ओंकारेश्वर को 189 मीटर से 196 मीटर तक भरने की अनुमति दे दी थी। सरकार ने एहतियात बरतते हुए एक साथ भरने की जगह हर महीने एक मीटर जलस्तर बढ़ाने का फैसला किया। इस तरह विचार करें तो लगेगा कि पानी को पूर्व स्तर पर रखने तथा जमीन के बदले जमीन की मांग विकास के इस सिद्धांत और न्यायालय के आदेश दोनों के विपरीत थी। लेकिन न्यायालय सरकार की विकास नीतियों के अनुरूप ही आर्थिक ढांचों पर फैसला देता है। विस्थापितों के पुनर्वास एवं मुआवजे पर उसका रवैया अवश्य प्रभावितों के पक्ष में रहा है, पर मूल विकास ढांचे या योजनाओं के विरुद्ध आम तौर पर वह निर्णय नहीं देता। किंतु जो प्रभावित होते हैं, उनके लिए उन स्थानों को छोड़ने का निर्णय कठिन होता है जहां वे पैदा हुए, पले-बढ़े। अपनी माटी और लोगों से लगाव उन्हें अंतत: हिला देता है। जहां आप होते हैं वहां जीवनयापन से लेकर आवश्यक चीजों, तकनीकों के परंपरागत ढांचे विकसित रहते हैं। स्थानीय सभ्यता एवं संस्कृतियां स्थानों से जुड़ी होती हैं। उन सबसे अलग होना कितना कठिन होता है, इसकी हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। विस्थापितों का जहां भी पुनर्वास हुआ, वहां लोगों की व्यावहारिक कठिनाइयां तथा नई जगह के साथ एकाकार न होने की सचाई साफ दिखाई देगी। विकास की नीतियां बनाने वाले यह नहीं सोचते कि ऐसा करके वे जगह-जगह विघटनकारी सामाजिक बम का निर्माण कर रहे हैं। इंदिरा सागर बांध का जल स्तर बढ़ाने के खिलाफ खरदाना में आंदोलन अब दूसरे रूप में चलेगा। सरकार का नोटिस मिलने के बाद ग्रामीण आम तौर पर मान लेते हैं कि उन्हें जाना ही होगा, लेकिन वे दिल से कभी नहीं जाना चाहते। इसलिए अगर कोई आकर उनके लिए लड़ने की बात कहता है तो काफी लोग साथ आ जाते हैं। किंतु मध्यप्रदेश अकेला नहीं है। दूसरे राज्यों में इसकी तरह और इससे अलग विकास के नाम पर उजाड़ और पुनर्वास का भयानक दौर चल रहा है। क्या यह समय नहीं आ गया जब हम ठहरकर इस विकास ढांचे पर पुनर्विचार करें? दुनिया के अन्य देशों में भी इन ढांचों पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं और इनकी भयानक परिणतियां भी सामने आने लगी हैं। अगर विचार हो तो ऐसी विकास नीतियां अवश्य बन सकती हैं जिनमें इतने भीमकाय ढांचों और इनकी वेदी पर गांवों, कस्बों की बलि चढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी। वस्तुत: विस्थापन एवं वंशगत स्थानों के अपने मूल पेशे से अलग होने के बाद की मानसिक पीड़ा, जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयां, समूह से अलगाव आदि का सम्मिलित असर जिस तरह का असंतोष और क्षोभ का संयोग पैदा कर रहा है, वह जितना ज्यादा फैलेगा, आगे देश के लिए उतना ही नुकसानदेह साबित होगा।
राष्ट्रीय  सहारा  दिल्ली संस्करण पेज-10,  21-9-2012   xzkefodkl