Thursday, April 28, 2011
Friday, April 22, 2011
ग्रामीण विकास के सुनहरे सपने
देश के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री विलासराव देशमुख ग्रामीण विकास के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का सुनहरा सपना देख रहे हैं। देखा जाए तो उनका सपना दो हिस्सों में बंटा है, एक पंचायती राज को मजबूत बनाना और दूसरा गांवों में वे बुनियादी जरूरतें उपलब्ध कराना जिनके अभाव में अब तक गांवों का विकास संभव नहीं हो सका है। ग्रामीण विकास के निमित्त दोनों बिंदु एक-दूसरे के पूरक हैं। पंचायती राज को मजबूती तभी मिल सकती है जब गांवों का समग्र विकास हो। इस दिशा में पंचायती राजमंत्री की कार्ययोजना सराहनीय है और अगर यह परवान चढ़ती है तो नि:संदेह गांवों की तकदीर और तदवीर बदलते देर नहीं लगेगी। कार्ययोजना के मुताबिक देश की ढाई लाख से अधिक पंचायतों को सक्रिय कर उन्हें विकासोन्मुख बनाने का लक्ष्य है। गांवों के चतुर्दिक व सम्यक विकास के लिए जिस रोडमैप को अमली जामा पहनाया जाना है उसके मुताबिक प्रत्येक गांव का अपना लघु सचिवालय होगा और वहां ग्रामीणों की मदद के लिए अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त होंगे। ग्रामवासियों को जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र, राशन कार्ड, बिजली-पानी कनेक्शन, मनरेगा जॉब कार्ड और बिजली बिल भुगतान के लिए अन्यत्र नहीं भटकना पड़ेगा बल्कि समस्त सुविधाएं गांव में स्थित लघु सचिवालय से ही प्राप्त होती रहेंगी। आमतौर पर लोगों को इन सभी कायरें के लिए तहसील, ब्लॉक और संबधित विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं लेकिन यदि सारी सुविधाएं एक स्थान पर मिलनी शुरू हो जाएं तो समय की बचत तो होगी ही, काफी हद तक उनका आर्थिक शोषण भी रुकेगा। योजना के मुताबिक सरकार द्वारा नियुक्त सरकारी बाबू गांव के लघु सचिवालय पर उपस्थित मिलेंगे और वे ग्रामवासियों के जमीन-जायदाद संबधी विवादों का निस्तारण करने में भी सहायक सिद्ध होंगे। मंत्रालय की मंशा पर विश्वास किया जाए तो प्रत्येक गांव में एक पंचायत विकास अधिकारी के अलावा जूनियर इंजीनियर की भी नियुक्ति की जाएगी ताकि वह गांवों के समग्र व सुनिश्चित विकास में योगदान दे सके। अक्सर सरकारी योजनाओं के लिए सरकार की ओर से पर्याप्त धनराशि तो आवंटित की जाती है लेकिन उचित प्लान और तकनीकी ज्ञान के अभाव में योजनाओं को पलीता लग जाता है। मसला चाहे गांव की गलियों में खडंजा बिछाने का हो अथवा पंचायत घरों के निर्माण का- आवंटित पैसा खर्च तो होता है लेकिन निर्माण कायरे में गुणवत्ता न के बराबर होती है। गांवों में जूनियर इंजीनियरों की मदद से गांवों को आधुनिक स्वरूप दिया जा सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इन नियुक्तियों से बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलने की संभावना प्रबल होगी। आज भी देखा जा रहा है कि इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर चुके लाखों युवा रोजगार की तलाश में दर-ब-दर ठोकरें खा रहे हैं। इनका ज्ञान गांव के विकास से जोड़ने पर सरकारी योजनाओं को पंख लग सकते हैं। विकास के निमित्त गांवों में सरकार की अनगिनत योजनाएं चल रही है। इनमें मनरेगा सबसे महत्वपूर्ण है। मनरेगा के अंतर्गत ही गांव की सड़कें, गली, संपर्क मार्ग, पोखरों की खुदाई इत्यादि का कार्य संपन्न हो रहा है और लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिल रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत जितना लाभ मिलना चाहिए उतना मिल नहीं पा रहा है। इसका मूल कारण योजना में पारदर्शिता का अभाव है। लुटेरे किस्म के ग्राम प्रधान और गांवों में नियुक्त भ्रष्ट सरकारी मुलाजिमों की मिलीभगत से मनरेगा भ्रष्टाचार के घेरे में है। निरक्षर या कम पढ़े लिखे मजदूरों की मजदूरी तक हड़पने की बातें हर रोज अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। अगर इन सभी कायरें पर गांव स्थिति लघु सचिवालय की निगरानी हो और उसी के माध्यम से योजनाएं संपादित हों तो तमाम दुश्वारियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा गांवों के विकास से जुड़े तमाम ऐसे और भी कार्य हैं, जिन्हें पूरा करके गांवों की तस्वीर बदली जा सकती है। मसलन आज भी जल संरक्षण, बांध, मृदा संरक्षण और बागवानी के संबंध में ग्रामवासियों को कुछ भी जानकारी नहीं है और न इस दिशा में सरकार द्वारा खास कोशिश की जा रही है। अगर सरकार गांवों में पेशेवर लोगों को नियुक्त कर पहल करे तो अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। आज भी गांवों में बागवानी और पशुपालन के बनिस्बत कृषि कार्य को ही वरीयता दी जाती है। लेकिन अगर ग्रामवासियों को कृषि के साथ-साथ बागवानी और पशुपालन से होने वाले लाभों से भी परिचित कराया जाए तो बेहतर नतीजे देखने का मिल सकते हैं और उनकी माली हालत सुधर सकती है। मंत्रालय लघु सचिवालय के माध्यम से गांवों में पेशेवर कृषि विषेशज्ञों की नियुक्ति करके इस दिशा में सार्थक पहल कर सकता है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री के सपने कब पूरे होते हैं। आखिर गांवों के विकास की बुनियाद भी तो इन्ही सपनों पर ही टिकी है।
Tuesday, April 5, 2011
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